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भौतिक विज्ञान – प्रकाश, तरंग, उष्मा, ताप और विद्युत

आज इसआर्टिकल में हम आपको भौतिक विज्ञान – प्रकाश, तरंग, उष्मा, ताप और विद्युत से जुडी जानकरी दे रहे है.


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प्रकाश

सभी प्रकाश स्रोत एक प्रकार का विकिरण उत्सर्जित करते हैं यह विकिरण वस्तुओं पर पड़ता है, इसके बाद वस्तुओं से परावर्तित होकर हमारी आंख पर पड़ता है, तो हमें वस्तुए दिखाई देने लगती है. इसी विकिरण को प्रकाश कहते हैं.

प्रकाश की चाल

प्रकाश निर्वात में भी गमन करता है. इसकी चाल निर्वात में अन्य माध्यमों की तुलना में सर्वाधिक होती है.

प्रकाश का परावर्तन

प्रकाश के किसी चिकने पृष्ठ से टकराकर पुन: उसी माध्यम में लौटने की घटना को प्रकाश का परिवर्तन कहते हैं.

परावर्तन के नियम

प्रयोगों द्वारा यह ज्ञात हुआ है कि प्रकाश का परिवर्तन 2 नियमों के अनुसार होता है जिन्हें परावर्तन के नियम कहते हैं. यह नियम हैसदैव आपतन कोण, सदैव परावर्तन कोण के बराबर होता है, आपतित किरण, आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण एक समतल में होते हैं.

समतल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब बनाना

समतल दर्पण द्वारा सी बिंदी वस्तु का प्रतिबिंब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है, कितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने रखी होती है. यह प्रतिबिंब आभासी होता है तथा वस्तु के बराबर होता है. दर्पण में यदि कोई मनुष्य अपना पूर्ण प्रतिबंध देखना चाहता है तो दर्पण की न्यूनतम ऊंचाई मनुष्य की ऊंचाई क आधी  होनी चाहिए.. यदि कोई व्यक्ति v चाल से दर्पण की ओर चलता है, तो उसे दर्पण में अपना प्रतिबिंब 2v ताल से अपनी ओर आता हुआ दिखाई देगा. समतल दर्पण 0 कोण पर झुके हो, तो उनके द्वारा उनके बीच में रखी वस्तु के बनने कुल प्रतिबिंब की संख्या 360 \ 0 * 1 होती है. यदि यह पूर्णांक नहीं है तो इसका अगला पूर्णांक मान लिया जाता है.

गोलीय दर्पण से परावर्तन

किसी कांच के खोखले गोले को काटकर गोलीय दर्पण बनाया जाता है. बोलिए खंड के एक तल पर पारा एवं लाल ऑक्साइड का लेपन किया जाता है तथा दूसरा तला वर्ष की भांति कार्य करता है. यह दर्पण दो प्रकार के होते हैं –  अवतल दर्पण तथा उत्तल दर्पण.

मुख्य फोकस

गोलीय दर्पण के मुख्य अक्ष के समांतर आपतित किरण दर्पण से परावर्तन के पश्चात मुख्य अक्ष पर स्थित जिस बिंदु से होकर जाती है ( अवतल दर्पण) अप्सारित होती हुई प्रतीत होती है. (उत्तल दर्पण )इस बिंदु को दर्पण का मुख्य फोकस कहते हैं.

प्रकाश का अपवर्तन

किसी शाम जी पारदर्शी माध्यम में प्रकाश की किरणें बिना किसी दिशा को बदल ले, एक सरल रेखा में चलती है परंतु द्रव्य एक पारदर्शी माध्यम से दूसरी पारदर्शी माध्यम में प्रवेश करती है, तो वह दोनों माध्यमों को अलग करने वाले तल पर अभिलंबवत होने पर बिना मुंडे  सीधी निकल जाती है, प्रदीप जी आपकी तो होने पर वह अपनी मूल दिशा से विचलित हो जाती है. यह घटना प्रकाश का अपवर्तन कहलाती है.

अपवर्तन के नियम

प्रयोगों द्वारा यह निष्कर्ष निकला है कि प्रकाश का अपवर्तन के नियमों के अनुसार होता है जिन्हें अपवर्तन के नियम कहते हैं.

स्नेल का नियम

आपतीत  कि किरण,अभिलंब तथा परावर्तित किरण तीनों एक ही समतल में स्थित होते हैं.. किन्ही दो पारदर्शी माध्यमों के लिए आपतन कोण की ज्या (sine)  तथा अपवर्तन कोण की ज्या (sine)( का अनुपात एक नियंताक होता है. इस नियम को स्नेल का नियम भी कहा जाता है.

क्रांतिक कोण

क्रांतिक कोण सघन माध्यम से बना हुआ  वह आपतन कोण है , जिसके लिए रेल माध्यम में अपवर्तन कोण 90 डिग्री होता है.

प्रकाश का पूर्ण आंतरिक परावर्तन

प्रकाश का पूर्ण परावर्तन केवल तभी संभव है जबकि 2 शर्तें पूरी हो.-  प्रकाश संघन माध्यम से विरल माध्यम में जा रही हो. आपतन कोण क्रांतिक कोण से बड़ा हो. पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण ही जल में पड़ी हुई परखनली दिखाई देती है, कांच में आई दरार चमकती है, कालिक कुत्ता हुआ गोल जल में चमकता है.

प्रकाशिक तंतु

प्रकाशिक तंतु, पूर्ण आंतरिक परावर्तन के सिद्धांत पर आधारित एक ऐसी युक्ति है जिसके द्वारा प्रकाश सिग्नल को, इसकी तीव्रता में बिना क्षय  हुए, एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया जा सकता है. इनके उपयोग निम्न प्रकार है – प्रकाश सिग्नलों के दूर संचार में, विद्युत सिंगल को प्रकाश जिंदल में बदल कर प्रेषित करने का अभीग्रहण करने में , मनुष्य के शरीर के आंतरिक भागों का परीक्षण करने तथा शरीर के भीतर लेजर किरणों को भेजने में.

लेंस द्वारा प्रकाश का अपवर्तन

समानता:  दो गोलीय पृष्ठों से गिरे हुए किसी अपवर्तक माध्यम को लेस कहा जाता है.  ले दो प्रकार के होते हैं उत्तल लेंस तथा अवतल लेंस.

मानव नेत्र

मानव नेत्र से संबंधित प्रमुख बिंदु है –   नेत्र का गोला बाहर से एक फीडबैक पारदर्शी श्वेत परत में ढका रहता है,  जिसे दृढ पटल कहते हैं. गोले का सामने का भाग पारदर्शिता तथा उभरा हुआ होता है.  इसे कार्निया कहते हैं.कार्निया इसके पीछे एक रंगीन अपारदर्शी झिल्ली का पर्दा होता  है. जिसे आयरिश कहते हैं. इस पर्दे के बीच में एक छोटा सा छिद्र होता है. जिसे पुतली कहते हैं.

तितली की एक विशेषता यह होती है कि वह अधिक प्रकाश में अपने आप छोटी तथा अंधकार में बड़ी हो जाती है. जिससे प्रकाश की समिति मात्रा ही नेत्र में आ पाती है.आइरिश के ठीक पीछे नेत्र लेंस होता है.कार्निया  तथा नेत्र लेंस के बीच में एक नमकीन पारदर्शी द्रव भरा जाता है. जिसे जलीय द्रव कहते हैं. इसका अपवर्तनांक 1336 होता है. नेत्र लेंस के पीछे एक अन्य फादर सिद्ध होता है जिसे काँच द्रव कहते हैं.

दृढ़ पटल के नीचे काले रंग की एक झिल्ली होती है जिसे कोरोइद्ड  कहते हैं . यह प्रकाश को शोषित करके प्रकाश के आंतरिक परावर्तन को रोकती है. इमली के नीचे नेत्र के सबसे भीतर एक पारदर्शी झिल्ली होती है जिसे रेटिना कहते हैं. किसी वस्तु से चली प्रकाश की किरणें कार्निया पर गिरती है तथा उपस्थित होकर नेत्र में प्रवेश करती है तथा यह कर्मश  जलीय द्रव काँच द्रव से होती है.रेटिना पर गिरती है जहां वस्तु का उल्टा प्रतिबिंब बनता है. प्रतिबिंब बनने का संदेश प्रकाश शीरा के द्वारा मस्तिष्क में पहुंचता है जिसे यह प्रतिदिन अनुभव के आधार पर सीधा दिखाई देता है.

मानव नेत्र के मुख्य रूप से दो प्रकार के दोष पाए जाते हैं

  1. निकट दृष्टि दोष
  2. दूर दृष्टि दोष

निकट दृष्टि दोष

यदि नेत्र संदीप की वस्तु को देख लेता है परंतु एक निश्चित दूरी से अधिक दूर की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख सकता है तो उस नेतृत्व में निकट दृष्टि का दोष होता है. निकट दृष्टि दोष के निवारण के लिए उपयुक्त दूरी के अवतल लेंस का प्रयोग किया जाता है.

दूर दृष्टि दोष

इस देश में नेत्र को दूर की वस्तु तो  स्पष्ट दिखाई देती है प्र परंतु पास की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है.दूर दृष्टि दोष के निवारण के लिए उपयुक्त दूरी के उत्तल लेंस का प्रयोग किया जाता है.

प्रिज्म द्वारा प्रकाश का वर्ण- विक्षेपण

जब कोई प्रकाश –  किरण प्रिज्म से गुजरती है, तो वह अपने मार्ग से विचलित होकर परीक्षण के आधार की ओर झुक जाती है तथा यदि यह प्रकाश किरण सूर्य की स्वेत प्रकाश की है, तो यह विभिन्न रंगों की किरणों में विभाजित हो जाती है.

यह लाल, नारगी,  पीला, हरा, नीला, जामुनी, बैंगनी के क्रम में होते हैं. इसमें लाल रंग का अपवर्तनांक सबसे कम तथा बैंगनी रंग का अपवर्तनांक सबसे अधिक होता है. इस प्रकार श्वेत प्रकाश के अपनी अव्ययी रंगों में विभक्त होने की क्रिया को वरण-   विक्षेपण कहते हैं. उत्पन्न विभिन्न रंगों के समूह को वर्ण क्रम या स्पेक्ट्रम कहते हैं.

प्राथमिक, द्वितीयक,  तथा पुराक रंग

प्रकाश के सात रंगों में से लाल, हरा, नीला रंग प्राथमिक रंग  कहलाते हैं. चूँकि उन्हें विभिन्न अनुपात में मिलाने से अन्य रंगों का निर्माण किया जा सकता है तथा इस प्रकार प्राप्त लोगों को द्वितीयक रंग कहा जाता है.  

लाल+ नीला = बैंगनी, नीला+ हरा = आसमानी नीला , लाल+ हरा = पीला, जब दो रंग पुरस्कार मिलने परश्वेत रंग उत्पन्न करते हैं, उन्हें पूरक रंग कहते हैं.

वस्तुओं के रंग

कोई वस्तु जिस रंग की दिखाई देती है वह वास्तव में केवल उसी गम का परिवर्तित करती है, यह सभी लोगों को अवशोषित कर लेती है. जो वस्तु सभी लोगों का परावर्तित कर देती है, वह सफ़ेद दिखाई देती है.  इस प्रकार जो वस्तु सभी रंगों को अवशोषित कर लेती है तथा किसी भी रंग को परावर्तित नहीं करती है वह काली दिखाई देती है.

तरंग गति एवं ध्वनि – सरल आवर्त गति

यदि कोई वस्तु एक सरल रेखा पर मध्यमान सतीश के इधर उधर इस प्रकार व्यतीत करें कि वस्तु का त्वरण मध्यमान स्थिति से वस्तु की दूरी के अनुक्रमानुपाती खोरठा पवन की दिशा मध्यमान स्थिति की ओर हो, तो उसकी गति सरल आवर्त गति कहलाती है,

तरंग गति

यदि किसी  तालाब में एक पत्थर फेंका जाए, तो पत्थर के गिरने के स्थान से, जल की सतह पर, वृत्ताकार रंगे बनती हुई दिखाई देती है. इसे विक्षोभ कहते हैं.  विक्षोभ के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को तरंग गति कहते हैं. यह दो प्रकार की होती है

अनुप्रस्थ तरंग गति

अनुप्रस्थ तरंग गति के माध्यम के कारण अपनी माध्यम स्थिति  के ऊपर नीचे तरंग गति की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं. जैसे-  पानी की सतह पर उत्पन्न तरंग, प्रकाश तरंग, आदि.

अनुदैधर्य तरंग गति

अनुदैधर्य तरंग गति में माध्यम के कारण अपनी मध्य स्थिति के आगे- पीछे, तरंग गति की दिशा में कंपन करते हैं. जैसे-  ध्वनि तरंग, आदि

कंपन की कला

आवर्त गति में कंपन करते हुए किसी कण  कि किसी क्षण पर स्थिति तथा गति की दिशा को जिस राशि द्वारा निरूपित किया जाता है. उसे उस क्षण कंपन की कला कहते हैं .

विस्थापन

दोलन करने वाली वस्तु जिस बिंदु के इधर उधर गति करती है इस बिंदु को वस्तु किस समय सही कहते हैं. दोलन करते समय वस्तुओं की सूची समय समय स्थिति से दूरी की विस्थापना कहते हैं.

आयाम

दोलन करने वाली वस्तु अपनी समय स्थिति के किसी भी और जितनी अधिक से अधिक दूरी तक जाती है उस दूरी को दोलन का आयाम कहते हैं.

आवृति

करण द्वारा एक सेकंड में किए गए दोलनों की संख्या उसकी आवृत्ति कहलाती है.

आवर्तकॉल

 कण द्वारा  एक कंपन में लगा समय उसका आवर्तकाल कहलाता  है.

तरंगदैध्र्य

तरंग गति में समान कला में कंपन करने वाले दो क्रमागत कणों के बीच की दूरी को तरंगदैध्र्य कहते हैं. इसे ग्रीक अक्षर( लेम्डा)  से व्यक्त किया जाता है.

यांत्रिक तरंगें

वितरण के जो किसी पदार्थ के माध्यम (ठोस ,  द्रव तथा गैस) मैं संचरित होती है, यांत्रिक तरंगें कहलाती है. यांत्रिक( ध्वनि) तरंगों को आरोपियों के एक बहुत बड़े प्राप्त तक उत्पन्न किया जा सकता है. इस आधार पर इन्हें निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है –

श्रव्य तरंगे

स्तनों को हमारा  कान सुन सकता है. इन तरंगों की आवृत्ति 20 से लेकर 20000 हर्ट्ज  तक होती है.. सर्वे तरंगों के स्रोत है – वाक तंतु क्मिप्त डोरिया.(  सितार आदि) कमीप्त प्लेटें व jझिलियाँ (बंटी, डॉल, तबला आदि) तथा वायु  स्तम्भ ( माउथ ऑर्गन) आदि.

अप श्रव्य तरंगे

अनुदैधर्य यांत्रिक तरंगें जिनकी  आवृतियाँ निम्नतम श्रव्य आवृत्ति ( 20008 हर्ट्ज )  से ऊंची होती है,, पराश्रव्य तरंगें कहलाती है. इन तरंगों को गाल्टन की सीटी द्वारा तथा दाब-  वैद्युत प्रभाव की विधि द्वारा क्वार्टर के क्रिस्टलों के कंपनों से उत्पन्न करते हैं.

सुस्वर ध्वनि

वह ध्वनि जो सुनने पर कानों को प्रिय तथा  सुखद लगती है, तू स्वर ध्वनि कहलाती है. जैसे – वायालिन ,  सितार, आदि की ध्वनि. इसके विपरीत जो ध्वनि सुनने में अप्रिय तथा कूट लगती है, शोर  कहलाती है. सूस्वर ध्वनि के तीन लक्षण हैं –

प्रबलता

इस लक्षण से ध्वनि कान को मन्द  अथवा तीव्र प्रतीत होती है यह दो कारकों पर निर्भर करती है –  ध्वनि की तीव्रता पर तथा, स्रोतों के कान की संवेदिता पर. यदि ध्वनि की प्रबलता l  हत्था ध्वनि की तीव्रता1 है तो L = Kk long 10 I

तारकत्व या पिच

तारकत्व ,  ध्वनि का वह लक्षण है जिसमें  ध्वनि को मोटा या तीक्षण कहा जाता है.

गुणता

ध्वनि काव्य लक्षण जिसके कारण हमें समान प्रबलता तथा सम्मान तारकत्व की ध्वनियों  में अंतर प्रतीत होता है, गुणता कहलाता है.

ऊष्मा एवं उष्मागतिकी- उष्मा

उष्मा ऊर्जा का ही एक रूप है, उर्दू यह वह ऊर्जा है जो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में केवल तापांतर के कारण स्थांतरित होती है. इसका मात्रक SI पद्धति में कैलोरी है.

ताप

टॉप वह भौतिक कारक है जो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में ऊर्जा के प्रवाह की दिशा निश्चित करता है. उसमिय  ऊर्जा सदैव उच्च ताप की वस्तु पर निम्न ताप की वस्तु में जाती है.ताप वस्तु की गर्महॉट का भी बौद्ध करता है.इस प्रकार तो किसी वस्तु के गर्म हॉट अथवा ठंडेपन की माप है.

तापमापी

ताप मापने वाले यंत्र को तापमापी कहते हैं. तापमान के लिए पदार्थ के किसी ऐसे गुण का प्रयोग किया जाता है जो ताप पर निर्भर करता है. तापमापी कई प्रकार के होते हैं-  जैसे द्रव्य तापमापी, गैस तापमापी, प्लैटिनम प्रतिरोध, अधिक प्रचलित है. यह पारे के उष्मीय प्रसार पर आधारित है.ताप मापने के लिए कई प्रकार के ताप पैमाने प्रचलित हो रहे हैं. जैसे-  सेल्सियस, फारेनहाइट, रिमर , कैलिवन, रेकाइन ताप पैमाना आदि. इनमें निमन तीन मुख्य है-

सेल्सियस पैमाना

इसमें हिमाक  को 0C तथा भाप बिंदु को 100C अभी किया जाता है. इसे 100 बराबर खानों में बांट दिया जाता है तथा प्रत्येक भाग को 1 C  कहते हैं.

फेरनहाइट पैमाना

इसमें हिमा को 32F  तथा भाप – बिंदु को 212 F  अंकित किया जाता है तथा इन्हें 180 बराबर खानों में बांट दिया जाता है.  इस प्रकार एक भाग का मान 1F होता है.

केल्विन  पैमाना

.इसमें हिमाक  को 273 K तथा भाप –  बिंदु को 373 K अंकित किया जाता है. और इन्हें100  बराबर खानों में बांट दिया जाता है .इस प्रकार एक भाग का  मान 1 K होता है.

परम शून्य

सैद्धांतिक रूप से अधिकतम ताप की कोई सीमा नहीं है परंतु निम्न ताप की सीमा है. किसी भी वस्तु का ताप – 273.15 C से कम नहीं हो सकती है. इसे केल्विन पैमाने पर OK  लिखते हैं.

विशिष्ट ऊष्मा धारिता

किसी पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा धारिता ऊष्मा की वह मात्रा है, जो उस पदार्थ के एकांक द्रव्यमान पर एन्कांक ताप वृद्धि उत्पन्न करती है.इसे  प्राय.C द्वारा व्यक्त किया जाता है. विशिष्ट ऊष्मा धारिता का SI मात्रक जूल किलोग्राम केल्विन होता है.

गुप्त ऊष्मा

स्थिर ताप  पर किसी पदार्थ के एकांक द्रव्यमान के अवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस पदार्थ की गुप्त ऊष्मा कहते हैं-

गलन की गुप्त ऊष्मा

एककाक द्रव्यमान, के ठोस को द्रव में बदलने के लिए आवश्यक  ऊष्मा की मात्रा को उस पदार्थ के गलन की गुप्त ऊष्मा कहते हैं.जैसे –  बर्फ की गुप्त ऊष्मा 80 किलो – कैलोरी\ किलोग्राम है.

वाष्पन की गुप्त उष्मा.

एकांक  द्रव्यमान के द्रव्य को उसके क्वथनांक पर बिना ताप परिवर्तन किए वाष्प में बदलने के लिए आवश्यक ऊष्मा को वाष्पन की गुप्त ऊष्मा कहते हैं.  जैसे- भाप की गुप्त ऊष्मा 540 किलो- कैलोरी\ किलोग्राम है. कैलोरीमिति के सिद्धांतनुसार दी गई ऊष्मा = ली गई ऊष्मा

ऊष्मा का संचरण – ऊष्मा का संचरण तीन विधियों में है- चालन  

 इसमें उसमा माध्यम के गर्म भागों से ठंडे भागों की और प्रत्येक कण के समीपवर्ती अन्य गुणों में होती हुई संचरित होती है.

संवहन

इसमें तरल  के कण गर्म भाग से ऊष्मा लेकर स्वयं हल्के होकर ऊपर उठते हैं तथा ठंडे भाग की ओर जाते हैं.के लिए पुन: ठंडे भाग से कंण नीचे आते हैं.

विकिरण

इसमें ऊष्मा गर्म वस्तु से ठंडी वस्तु की और बिना किसी माध्यम की सहायता के बिना माध्यम की सहायता के बिना माध्यम को गर्म किए प्रकाश की साल से सीधी रेखा में  संचरित होती है.

कृष्ण पिंड

जो वस्तु अपने पृष्ठ पर आपतित संपूर्ण विकिरण को पूर्णत: अवशोषित कर लेती है,उसे कृष्ण पिंड कहते हैं. काली  वस्तु ऊष्मा का अच्छा अवशोषक होती है. इसीलिए सर्दियों में काले व गहरे रंग के कपड़े पहने जाते हैं. सफेद कपड़े ऊष्मा  के बुरे अवशोषक होते हैं.इसीलिए इन्हें गर्मियों में पहना जाता है.

विद्युत

वह ऊर्जा जिसके कारण किसी पदार्थ में हल्की वस्तुओं को आकर्षित करने का गुण उत्पन्न हो जाता है,विद्युत कहलाती है. दो वस्तुओं को परस्पर रगड़ने से उत्पन्न विद्युत को घर्षण विद्युत कहते हैं. यदि पदार्थ में उत्पन्न हुई किसी विद्युत को स्थिर रखा जाए तो इस स्थिर विद्युत कहते हैं. विद्युत ऊर्जा का महत्व यह है कि इसका रूपांतरण प्रकाश है, उष्मा तथा ध्वनि आदि में सुविधापूर्वक हो जाता है.

चालक अचालक( विद्युत रोधी) तथा अर्धचालक

धातुओं ( जैसे-  तांबा, चांदी, एलुमिनियम, आदि)  में अपेक्षाकृत मुक्त इलेक्ट्रॉन की संख्या बहुत अधिक होती है. अंत इनमें  वेद्युत चालन संभव होता है. ,यह पदार्थ चालक कहलाते हैं.पदार्थ ( जैसे- लकड़ी,  काँच , आदि) जिनमें अपेक्षाकृत बहुत कम इलेक्ट्रॉन होते हैं अचालक कहलाते हैं वे पदार्थ जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन में बहुत अधिक होते हैं और मैं बहुत कम वह अर्धचालक कहलाते हैं. जैसे – कार्बन, सिलिकॉन, धर्मे नियम, आदि. इनमें केवल  उंच ताप पर ही विद्युत चालन संभव होता है.

विद्युत शक्ति

विद्युत परिपथ में ऊर्जा की क्षय होने की  दर को शक्ति कहते हैं. इस का SI मात्रक वाट (w) है.

किलो वाट= घंटा मात्रक

1 किलोवाट घंटा मात्रक , विद्युत ऊर्जा की वह मात्रा है जो किसी परिपथ में 1 घंटे में व्यय होती है/ जबकि परिपथ में 1 किलो वाट की शक्ति हो.

घरेलू विद्युत सप्लाई

घरों में सप्लाई की जाने वाली विद्युत 220 v  की AC ( प्रत्यावर्ती धारा) होती है जिसकी देवता प्रति सेकंड 100 बार बदलती है.अर्थार्थ उसकी आवृत्ति 50 हर्ट्ज  होती है. मेंस द्वारा प्राइस दो विभिन्न एंपियर पर सप्लाई दी जाती है जो 5A तथा 15A होती है. पहले को घरेलू तथा दूसरे को पावर लाइन कहते हैं.

घरेलू वायरिंग

घरों में विद्युत का मुख्य सप्लाई 3 कोर वाली तारों द्वारा की जाती है जिन्हें विद्युत में उदासीन तथा भू काल भी कहते हैं.

विद्युत में तार सामान्यतः लाल रंग का होता है तथा मेंस धारा इसके द्वारा प्रवाहित होती है. उदासीन तार और समानयत काले रंग का होता है. तथा यह धारा को वापस ले जाता है. भूत और सामान्यतः हरे रंग का होता है. भू  तार घर के निकट पृथ्वी में दबी एक धातु की प्लेट से जोड़ी जाती है. यह सुरक्षा का एक साधन है तथा सप्लाई को किसी प्रकार प्रभावित नहीं करता.

विद्युत फ्यूज तार

परिपथ में प्रवाहित होने वाली धारा का  परिमाण स्वकृत सीमा से अधिक निम्न कारणों से होता है – अतिभारण ,  लघुपथन , विद्युत परिपथों की सुरक्षा के लिए सबसे आवश्यक युक्ति फ्यूज है ऐसे तार का टुकड़ा होता है जिसके पदार्थ है  गलनांक बहुत कम होता है. जब परिपथ में अतिभारण या लघुपथन के कारण बहुत अधिक है धारा प्रवाहित हो जाती है तब फ्यूज का तार गरम होकर पिघल जाता है. जिसके फलस्वरूप परिपथ  टूट जाता है तथा धारा प्रवाह रुक जाती है. 15 एंपियर के परिपथ में फ्यूज का तार मोटा होता है तथा यह 15 एंपियर की क्षमता का होता है5 एंपियर के परिपथ में फ्यूज का तार पतला होता है और उसकी क्षमता 5 एंपियर होती है. इसका उपयोग विद्युत चलित उपकरणों की सुरक्षा के लिए किया जाता है.

विद्युत शॉक

विद्युत के कारण जब शरीर में शोक लगता है तो संवेदी अंग उस संकेत को विद्युत संपन्नदन के रूप में न्यूरॉन (तंत्र कोशिका) की सहायता से मस्तिष्क में भेजता है. इसकी चाल लगभग 25 मीटर प्रति सेकंड होती है. मस्तिषक उसका विश्लेषण करके इतनी ही चाल से विद्युत संकेत को संबंधित को आवश्यक अनुप्रिया करने के लिए भेजता है, फलस्वरूप प्रभावित अंग की मांसपेशी सिकुड़ती है या अनुक्रीया करती है. इस प्रकार  शरीर में न्यूरॉन ( तंत्र कोशिका) एक प्रकार के जैव – वैधुत रासायनिक सेल का कार्य करता है.

विद्युत बल्ब

विद्युत बल्ब कांच का एक गोला होता है, जिसके अंदर आर्गन नाइट्रोजन भर दी जाती है, इसके अंदर टंगस्टन का तार लगाया जाता है इसका प्रतिरोध एवं द्रवणांक होते हैं. जब बल विद्युत धारा प्रवाहित  की जाती है, तो यह दीप्त होकर प्रकाश देने लगता है . टंगस्टन के अलावा नाइक्रोम का प्रतिरोध भी बहुत उंच होता है जिसका उपयोग हिटर, स्त्री तथा विकीरक , आदि उपकरणों में होता है.

सेल

सेल एक ऐसी युक्ति है जिसमें रासायनिक ऊर्जा का रूपांतरण विद्युत ऊर्जा के रूप में होता है. यह कई प्रकार के होते हैं.  जैसे – सरल सेल, लेक्लांशी सेल, , शुष्क सेल, आदि.

ओम का नियम

नियत ताप पर किसी चालक के सिरों के बीच का विभवांतर उसमें प्रभावित धारा के अनुक्रमानुपाती होता है.

प्रतिरोधों का संयोजन  यह दो प्रकार का होता है- श्रेणी क्रम

श्रेणी क्रम में जुड़े सभी प्रतिरोधों का तुल्य प्रतिरोध इन सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है.

समांतर क्रम में

समांतर क्रम में जुड़े सभी प्रतिरोधों के तुल्य प्रतिरोध का व्युत्क्रम इन सभी प्रतिरोधों के अलग – अलग व्युत्क्रर्मों के योग के बराबर होता है.

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