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पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुडी सम्पूर्ण जानकारी

जीव एवं उसके वातावरण जैविक (अन्य जातियों) तथा अजैविक (भौतिक व रासायनिक कारक)  के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन परिस्थितिकी कहलाता है

स्वपारिस्थितिकी

किसी एक प्राणी, किसी एक जाति के प्राणियों के जीवन विकास पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन स्वपारिस्थितिकी कहलाता है.

समुदाय पारिस्थितिकी

इसमें किसी स्थान पर पाए जाने वाले समस्त जीव समूह पौधे और जंतु एवं वहां के पर्यावरण के पारस्परिक संबंध का अध्ययन किया जाता है.

परिस्थिति की निर्भरता एवं पारस्परिक क्रियाएँ

एक ही वातावरण में रहने वाले सभी पौधों, जंतुओं और सूक्ष्मजीवो के समूह को जैविक समुदाय कहते हैं.  उपलब्ध संसाधनों और ऊर्जा का उपयोग करने के लिए वातावरणीय जीव आपस में पारस्परिक क्रियाएं करते रहते हैं.

परिस्थितिकी के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु  

  • जीव मंडल- पृथ्वी का वह भाग है जिसमें जीवधारी रहते हैं.  
  • पर्यावरणी कारक-ये कारक (मिट्टी,  पानी, तापमान, आर्द्रता,) वनस्पतियों के वितरण को निर्धारित करते हैं. 
  • लिथोफाइटस-  चट्टानों पर उगने वाले पौधे.
  • सेमोफाइटस –  बजरी रेत में उगने वाले पौधे.
  • कंरसोफाइटस- ऊसर सख्त भूमि में उगने वाले पौधे
  • साइलोफाइटस – सवान पौधे  
  • स्क्लेरोफाइटस- झाड़ियाँ  वाले पौधे

परिस्थितिकी तंत्र   

पारिस्थितिक तंत्र  शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम एजी टैन्सले ने किया,उनके अनुसार परिस्थितिक तंत्र वह तंत्र है, जो वातावरण के जैविक तथा अजैविक सभी कारकों के परस्पर संबंधों तथा प्रक्रियाओं द्वारा प्रकट होता है. परिस्थितिक तंत्र प्रकृति की एक क्रियात्मक इकाई है,  

परिस्थितिक तंत्र (जैव भू-रासायनिक प्रणाली) के अजैवीय घटक ताप, जल, वायु, कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थ है. पारिस्थिति तंत्र के जैविय  घटक, उत्पादक(हरे पौधे), उपभोक्ता (प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी) एवं अपघटक (जीवाणु एवं कवक) होते हैं.  

सूर्य किसी भी परिस्थितिक तंत्र  में ऊर्जा का मूल स्रोत है. परिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवेश, रूपांतरण, विसरण, उष्मागतिकी के नियमानुसार होता है एवं ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है.उत्पादक-  प्राथमिक उपभोक्ता- द्वितीयक उपभोक्ता- तृतीयक उपभोक्ता- सर्वोच्च उपभोक्ता प्रत्येक पोषण स्तर पर स्थांतरण में केवल 10% ऊर्जा ही एक पोषी स्तर पहुंचती है. बाकि 90% ऊर्जा प्रत्येक स्तर पर ऊष्मा के रूप में वातावरण में विमुक्त हो जाती है.  

खाद्य श्रृंखला एवं खाद्य जाल  

उत्पादकों से प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक उपभोक्ताओं तक जीवधारियों की श्रेणी के द्वारा ऊर्जा के स्थानांतरण की प्रक्रिया खाद्य श्रृखला कहलाती है. घास- उत्पादक , गाय- प्राथमिक उपभोक्ता, भेड़िया- द्वितीयक उपभोक्ता , शेर- तृतीयक उपभोक्ता

खाद्य श्रृखला में उत्पादक से उपभोक्ता तथा अपघटक तक ऊर्जा का स्थानांतरण सीधी कड़ी के रुप में होता है, परंतु प्रकृति में विभिन्न खाद्य श्रृखंलाएँ आपस में जुड़कर तंत्र बनाती है, इसे खाद्य जाल कहते हैं. इस प्रकार प्रकृति में खाद्य के अनेक वैकल्पिक रास्ते होते हैं, जो परिस्थितिक  साम्यावस्था के लिए महत्वपूर्ण है.

पारिस्थितिकी पिरामिड   

परिस्थितिक  तंत्र में पोषक संरचना की  संख्या, जीवभार एवं ऊर्जा का ग्राफीय या आलेखी प्रदर्शन है. इसमें प्रत्येक पोषक स्तर पर व्यक्तिगत संख्या दर्शाई जाती है. संख्या का पिरामिड घास तथा तलाब परिस्थितिक तंत्र मैं सीधा तथा वृक्ष परिस्थितिक तंत्र में उल्टा होता है.जीवभार के पिरामिड में प्रत्येक पोषक स्तर पर उभार दर्शाया जाता है. जीवभार का पिरामिड घांस परिस्थितिकी तथा वन परिस्थितिक  तंत्र में सीधा, जबकि तालाब परिस्थितिको तंत्र में उल्टा होता है.

ऊर्जा के पिरामिड के द्वारा इसमें निहित उर्जा या विभिन्न पोषक स्तरों पर उत्पादकता दर्शाई जाती है . ऊर्जा का पिरामिड सभी परिस्थितिक मैं सदैव सीधा होता है.पोषक तत्वों ( लघु एवं दीर्घ)  का जैविक से अजैविक तथा अजैविक से पुन: जैविक घटकों में प्रवाह जैव-भू रासायनिक चक्रों द्वारा होता है. परिस्थितिक तंत्र में नाइट्रोजन का परिसंचरण जीवाणुओं द्वारा होता है.

कुछ सूक्ष्मजीव ( जैसे- राइजोबियम) लिग्यूम पौधों की जड़ों तथा ग्र्न्थिकाओ में पाए जाते हैं. यह वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिरीकृत कर देते हैं,जिससे मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होती है. फसल, एकवेरियम, मत्स्य पालन टंकी मानव निर्मित कृत्रिम परिस्थितिकी  तंत्र है.

वातावरणीय प्रदूषण  

वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, रेडियोधर्मी प्रदूषण, वायु जल, मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में अवांछनीय परिवर्तन द्वारा होता है. 

सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटित प्रदूषक जैव-निम्नीकरणीय प्रदूषक ( जैसे- ऊन, मल मूत्र आदि) तथा अपघटित नहीं होने वाले प्रदूषक अनिम्नीकरणीय प्रदूषक है ( जैसे- , कीटनाशक, पारा, आदि) कहलाते हैं. पेयजल में मल संदूषण या दूषित पदार्थों की मात्रा की गणना जल में उपस्थित  केलिफार्म जीवाणुओं की गणना करके की जाती है. जलीय जीवो को जीवित रहने के लिए जल में अपेक्षित मात्रा में ऑक्सीजन की उपस्थिति अनिवार्य होती है. इस अपेक्षित अनुकूलतम घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा 4 – 6 मिग्रा/मीटर से कम नहीं होनी चाहिए. बड़े शहरों में वायु को प्रदूषित करने वाला तत्व सीसी ( वाहनों से) है.  

सल्फर डाई- ऑक्साइड

यह कोशिका की कला या झिल्ली तंत्र को नुकसान पहुंचाती है.  

लाइकेन वायु प्रदूषण

  यह सल्फर डाई- ऑक्साइ) के अच्छे सूचक होते हैं. प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें, CO2 H2O, ch4 होती है.  

सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा BOD कहलाती है. मिनामाटा एवं इटाई-इटाई (वृक्को पर प्रभाव ) रोग क्रमशः पारा एवं कैडमियम के प्रदूषण के कारण होते हैं. नाइट्रेट संदूषित भोजन तथा जल के उपयोग द्वारा ब्लू बेबी सिंड्रोम रोग होता है.यूशो रोग रसायन पाँली क्लोरीनेटेड  बाइफिनाइल के कारण होता है. रेडियोसक्रिय, स्ट्रान्शियम-90 के कारण अस्थि कैंसर होता है.

जैव- विविधता   

जैव-विविधता का अर्थ है-  किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने वाले सभी पौधों, जंतुओं और सूक्ष्म जीवों की विभिन्न प्रजातियां. जैव-विविधता  अभियान पर कन्वेंशन का सचिवालय मॉन्ट्रियल ( कनाडा) में स्थित है.

जैव-विविधता के संरक्षण के उद्देश्य से जैव मंडल आरक्षित ( रिजर्व) क्षेत्र बनाए गए हैं. जैसे- सुंदर वन, ( पश्चिम बंग) जैव- विविधता स्व स्थाने ( प्राकृतिक परिस्थितियों में ही सरंक्षण) तथा ब्राहा स्थाने (कुत्रिम संरक्षण विधि द्वारा प्राकृतिक परिस्थितियों का निर्माण)  विधियों द्वारा संरक्षण होता है. रेड डाटा पुस्तक वह पुस्तक है, जिसमें सभी संकटापन्न स्पीशीज का रिकॉर्ड रखा जाता है. अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ के अनुसार, प्रमुख संकटग्रस्त जीवो को 6 श्रेणियों में बांटा गया है.

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