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द्रव्य एवं परमाणु संरचना

द्रव्य वह है, जिसमें भार होता है तथा जो स्थान घेरता है. पदार्थ एक विशेष प्रकार का द्रव्य है, जो निश्चित गुण एवं संगठन वाला होता है. जैसे- कागज , लकड़ी, मिट्टी, लोहा, मॉम, जल, दूध, वायु, ऑक्सीजन, संगमरमर, चुना आदि.

ठोस, द्रव तथा गैस

ठोस की आकृति, आकार एवं आयतन निश्चित होते हैं, जैसे- किताब, लकड़ी आदि.

द्रवों का आकार एवं आयतन निश्चित होता है, परंतु आकृति अनिश्चित होती है, जैसे- पानी,  दूध , तेल इत्यादि.

गैसों का आकार, आयतन एवं आकृति सभी अनिश्चित होते हैं. जैसे- भाप, वायु आदि.

द्रव्य की दो और अवस्थाएं

आजकल द्रव्य की दो और अवस्थाओं पर चर्चा हो रही है, लेकिन यह दोनों अवस्थाएं ताप और दाब की तरह दशाओं में ही पाई जाती है.

प्लाज्मा

यह अत्यधिक ऊर्जा वाले और अधिक उत्तेजित कणों से बना होता है. इस अवस्था में कण आयनीकृत गैस के रूप में होते हैं. फ्लोरोसेंट ट्यूब और नियोन बल्ब में प्लाज्मा होता है. विद्युत प्रवाहित होने पर इनके अंदर उपस्थित गैसे आयनीकृत हो जाती है, जिसके कारण बल्ब या ट्यूब  में चमकीला प्लाज्मा बनता है जिसके कारण इनमें चमक होती है.

बॉस आइंस्टीन कंडेनसेट

इस अवस्था का नाम वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस (भारत) और अल्बर्ट आइंस्टीन के नाम पर रखा गया.

शुद्ध पदार्थ

वे पदार्थ जल का रासायनिक संगठन निश्चित होता है, शुद्ध पदार्थ कहलाते हैं.

तत्व

किसी द्रव का वह आधारभूत रूप है जिसे रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा सरल पदार्थों में नहीं तोड़ा जा सकता है. एक तत्व केवल एक ही प्रकार के परमाणु और से मिलकर बना होता है. उदहारण- आयरन, सोना, चांदी, आदि.

यौगिक

यौगिक वह शुद्ध पदार्थ है जो दो या दो से अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में हुए रासायनिक सहयोग से बनता है.

मिश्रण

यह एक अशुद्ध पदार्थ है, जो दो या दो से अधिक शुद्ध पदार्थों के रासायनिक संयोग से बनता है.

मिश्रण का पृथक्करण

मिश्रण में उपस्थित विभिन्न अवयवों को विभिन्न विधियों द्वारा पृथक किया जा सकता है. मिश्रण को पृथक करने के लिए निबंध विधियां प्रयुक्त की जाती है.  

अपकेंद्रण

यह विधि इस सिद्धांत पर आधारित है, तेजी से घुमाने पर सघन कण नीचे बैठ जाते हैं. इनका प्रयोग मक्खन से क्रीम निकालने के लिए किया जाता है.

क्रिस्टलन

यह विधि ठोस वस्तुओं के पृथक्करण तथा शुद्धिकरण के लिए प्रयुक्त होती है. इस विधि में अशुद्ध पदार्थ या मिश्रण को उचित विलायक जैसे- जल, अल्कोहल, एसीटोन, आदि के साथ मिलाकर एक गर्म करते हैं. इसके पश्चात विलियन को गरम अवस्था में ही छान लेते हैं.

उर्ध्वपातन

किसी ठोस पदार्थ को गर्म करने पर सीधे वाष्प में बदलना और ठडा किए जाने पर पुनः सीधे ठोस अवस्था में आ जाना उर्ध्वपातन कहलाता है.

इस विधि का उपयोग उर्ध्व्पाती  तथा अनुधर्व्पाती पदार्थों को पृथक करने में किया जाता है. इस प्रकार के मिश्रण को गर्म करने पर उर्ध्वपाती सीधे वाष्प अवस्था में परिवर्तित हो जाता है.

आसवन

किसी द्रव को गर्म करके वास्तव में परिवर्तन करने तथा इन वस्तुओं को ठंडा करके फिर से द्रव में परिवर्तित करने की क्रिया को आसवन कहते हैं.

आसवन =  वशीकरण + संघनन  

विभिन्न कोलाइडी तंत्र एवं उनके उदाहरण

कोलाइड का प्रकार उदाहरण
एरोसोल कोहरा, बादल , कुहासा
एरोसोल ( ठोस) धुँआ, वाहनों से निकलने अपशिष्ट
फ़ोम शेविंग क्रीम
इमल्शन दूध, फेस क्रीम
सोल मैग्नीशिया मिलक, कीचड़
फोम फोम,रबड़ स्पंज, प्युमिश
ठोस सोल रंगीन रतन पत्थर, दूधिया कांच
जेल जेली, पनीर, मक्खन

विद्युत अपघट्य के द्वारा स्कंदित हो जाते हैं. स्कंदन का प्रयोग, एल्बम द्वारा जल के शोधन FeCL3 द्वारा रक्त को रोकने, समुंदर में नदी के मिलने के स्थान पर डेल्टा के निर्माण में होता है. कोलाइडी विलियन को अपोहन द्वारा सिद्ध किया जाता है. अपोहन का प्रयोग रक्त को शुद्ध करने के लिए किया जाता है.

कार्बनिक यौगिक का शोधन

कार्बनिक पदार्थ में किसी विलेय पदार्थ की थोड़ी अशुद्धि होने या किसी अन्य विलेय पदार्थ की थोड़ी सी मात्रा अशुद्धि के रुप में उपस्थित होने पर उसका शोधन क्रिस्टलन द्वारा किया जाता है.

नेप्थलीन, बेंजोइक अमल, कपूर आदि पदार्थों का शोधन उर्ध्वपातन विधि द्वारा किया जाता है. आयोडीन तथा पोटेशियम क्लोराइड के मिश्रण से आयोडीन की उर्ध्वपातन विधि द्वारा अलग किया जाता है. बेंजीन तथा नाइट्रोबेंजीन के मिश्रण को प्रभाजी आसवन द्वारा पारित किया जाता है.

बेंजीन इसके मिश्रण को प्रभाजी आसवन द्वारा पृथक करते हैं. एनिलिन, नाइट्रोबेंजीन, क्लोरो बेंजीन आदि धर्मों का शोधन भाप आसवन द्वारा किया जाता है. गिलसरीन का शोधन निर्वात आसवन द्वारा किया जाता है. समुद्री जल को आसवन प्रक्रिया द्वारा सेट किया जाता है. शत प्रतिशत आर्द्रता होने पर वायु में जलवाष्प अपनी अधिकतम सीमा तक पहुंच जाता है, जिससे और वाष्पीकरण की गुंजाइश खत्म हो जाती है, अंतः सो प्रतिशत आर्द्रता जल का वाष्पीकरण नहीं होता है.

परमाणु तथा अणु

किसी पदार्थ का वह सूक्ष्म कणों रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेता है, परंतु स्वतंत्र अवस्था में नहीं पाया जाता, परमाणु कहलाता है. दो या दो से अधिक समानता विभिन्न तत्वों के परमाणु आपस में जुड़ कर अणु बनाते हैं. अणु किसी पदार्थ का वह सूक्ष्म कण हैं, जो रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेता है.

परमाणु के अवयव

इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन है. परमाणु में केंद्रीय नाभिक उपस्थित होता है, जो ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉनों के द्वारा घिरा रहता है. केवल हाइड्रोजन-1 ( प्रोटीयम) एक ऐसा स्थाई नाभिक है, जिसमें न्यूट्रॉन नहीं होते हैं.

इलेक्ट्रॉन ओवर प्रोटॉनों की समान संख्या वाला परमाणु उदासीन होता है. यदि इलेक्ट्रॉनों की संख्या, प्रोटॉन और से कम हो तो परमाणु धन आवेश होता है तथा यदि इलेक्ट्रॉनों की संख्या, तो परमाणु पर ऋणावेश होता है.

कैथोड किरणें

उनकी खोज जे जे थॉमसन ने की थी. यह कैथोड से उत्पन्न होती है तथा सीधी रेखा में चलती है.

एनोड किरण

उनकी खोज गोल्डस्टीन ने की थी. इन्हें धन किरण भी कहते हैं. यह धन आवेशित कणों, जिन्हें प्रोटॉन कहते हैं, की बनी होती है.

द्रव्यमान संख्या

यह न्यूट्रॉन तथा परमाणु की कुल संख्याओं का योग होता है.

समस्थानिक

जिन तत्वों के परमाणु क्रमांक समान परंतु द्रव्यमान संख्या भिन्न भिन्न होती है, एक दूसरे के समस्थानिक कहलाते हैं.

तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

अलग-अलग कक्षाओं में इलेक्ट्रॉनों का वितरण यह किसी परमाणु के कोष , उपकोष और कक्षा में इलेक्ट्रॉन की व्यवस्था को दर्शाता है.

आफबाऊ का नियम

ओप्पो एक जर्मन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है निर्माण करना इस नियम के अनुसार, परमाणुओं की उप कक्षाओं में इलेक्ट्रॉनों ऊर्जा के बढ़ते हुए क्रम में भर जाते हैं. किसी उप कक्षा की ऊर्जा (n + l) नियम के आधार पर ज्ञात की जाती है.

जिस उपेक्षा के लिए (n + l)  का मान कम होता है,उसकी ऊर्जा भी कम होती है., यदि दो उपकक्षाओं के लिए (n + l) समान समान है तो इलेक्ट्रॉन उस उपकक्षा में भरा जाता है, जिसके लिए n  का मान न्यूनतम होता है.

हुंड का नियम

इसे उचत्तम गुणन का नियम कहते हैं.इसके अनुसार, किसी उपेक्षा के विभिन्न कक्षाओं में इलेक्ट्रॉनों तब तक युग्मित नहीं होंगे जब तक कि उसे उप कक्षा के प्रत्येक कक्ष में एक एक इलेक्ट्रॉन में भर जाए.

क्वांटम संख्याएं

वे संख्याएं जिनके द्वारा किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा व स्थिति का पूर्ण वर्णन किया जाता है, क्वांटम संख्या कहलाती है. क्वांटम संख्याओं के द्वारा परमाणु में इलेक्ट्रॉन के कोष, उपकोष की स्थिति तथा चक्रण की दिशा का ज्ञान होता है. यह निम्न चार प्रकार की होती है.

मुख्य क्वांटम संख्या

यह इलेक्ट्रॉन की नाभिक से दूरी बताती है. यह इलेक्ट्रॉन के मुख्य ऊर्जा स्तर पर है कोश को प्रदर्शित करती है. इसे n  से प्रदर्शित करते हैं जिसका मान 1 2 3 हो सकता है.n का मान इलेक्ट्रॉनिक कोर्स के आकार को निर्धारित करता है.

द्विगशी क्वांटम संख्या

वह नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग को प्रकट करती है. इसे l से प्रदर्शित करते हैं. यह इलेक्ट्रॉन की गति के कारण बने इलेक्ट्रॉन मेघ की आकृति बताती है.

चुंबकीय क्वांटम संख्या

यह अंतराकाश में इलेक्ट्रॉन के कक्ष को के अभिविन्यास को निर्धारित करती है.

चक्रण क्वांटम संख्या

यह परमाणु में इलेक्ट्रॉन के चक्रण को बताती है. इसे s से प्रदर्शित करते हैं.

पाउली का अपवर्जन नियम

इसके अनुसार, किसी एक ही परमाणु में उपस्थित किन्हीं दो इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वांटम संख्या समान नहीं हो सकती. यदि किसी परमाणु में उपस्थित किन्हीं दो इलेक्ट्रॉन के लिए n, l तथा m के मान s का मान अवश्य भिन्न होगा.

रेडियोऐक्टिवता की खोज

रेडियोऐक्टिवता की खोज फ्रांसीसी वैज्ञानिक हेनरी बेकुरल ने 18 से 96 ईसवी में की थी. हेनरी बेकुरल ने पाया कि यूरेनियम तथा थोरियम  लवणों से कुछ अदृश्य किरणें स्वत: उत्सर्जित होती है.

बाद के अध्ययनों से पता चला कि थोरियम, पोलोनियम, रेडियो आदि रेडियोएक्टिव पदार्थ है. 18 सो 98 ईसवी में मैडम क्यूरी और उनके पति पियरे क्यूरी ने 30 टन ब्लेंडी से 2 किलोग्राम रेडियम प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की और यह पाया कि रेडियम यूरेनियम की अपेक्षा 10,00,000 गुना अधिक रेडियो एक्टिव है.

आज लगभग 40 प्राकृतिक रेडियोएक्टिव समस्थानिक एवं अनेक रेडियोएक्टिव तत्व ज्ञात है. हेनरी बेकुरल तथा क्यूरी दंपति को वर्ष 1903 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. रेडियोएक्टिव तत्वों के नाभीक अस्थायी होते हैं. तथा इन तत्वों के नाभिक स्वत: ही उस अवस्था तक विघटित होते रहते हैं जब तक की स्थायीनाभि का निर्माण नहीं हो जाता है.

नाभिकीय विघटन की दर ब्राहा कारको, जैसे- दाब,ताप  इत्यादि पर निर्भर नहीं करती है . फलस्वरूप a,b तथा r  कणों का उत्सर्जन होता है.

α- उत्सर्जन

α कण हीलियम के नाभिक होता है.  उसके उत्सर्जन से परमाणु द्रव्यमान में 4 तथा परमाणु क्रमांक में दो ईकाई की कमी हो जाती है.

नाभिकीय विखंडन

वह प्रक्रम है, जिसमें कोई भारी नाभिक दो या दो से अधिक मध्यम आकार के नाभिक में टूट जाता है. इसमें सामान्यतः न्यूट्रॉन तथा अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होती है. इसका प्रयोग नाभिकीय रिएक्टर तथा परमाणु बम में किया जाता है.

नाभिकीय रिएक्टर

यह वह यंत्र है, जिसमें नियंत्रित नाभिकीय विखंडन द्वारा विद्युत का उत्पादन किया जाता है. इसमें इंधन मन्दक (जैसे- ग्रेफाइट तथा भारी जल, न्यूटन की गति को बंद करने के लिए तथा नियंत्रक छड बोरोन स्टील अथवा केडीम की बनी) न्यूट्रॉन को अवशोषित करने के लिए उपस्थित होती है. इसमें द्रव सोडियम का प्रयोग शीतलक के रूप में किया जाता है.

परमाणु बम

प्रथम परमाणु बम का निर्माण वर्ष 1945 में जे रॉबर्ट हिमर ने किया था. इसे नाभिकीय बम भी कहा जाता है. परमाणु बम के निर्माण में यूरेनियम अथवा प्लूटोनियम प्रयुक्त किया जाता है, क्योंकि दोनों तथ्य न्यूट्रॉन द्वारा सरलतापूर्वक विघटित हो जाते हैं, यूरेनियम के दो समस्थानिक के u235 व् U238  में से परमाणु बम U235 को प्रयुक्त किया जाता है, क्योंकि U235 के विघटन हेतु तीव्र गति के न्यूट्रॉन आवश्यक होते हैं,

6 अगस्त, 1945 को अमेरिका वायु सेना ने जापान के हिरोशिमा पर परमाणु बम लिटिल बॉय गिराया था. इसके 3 दिन बाद अमेरिका ने नागासाकी शहर पर फैट मैन परमाणु बम गिराया था.

नाभिकीय सलयन

वह प्रक्रम है, जिसमें दो या दो से अधिक कल के नाभिक संयुक्त होकर भारी नाभिक बनाते हैं. इसका प्रयोग हाइड्रोजन बम में किया जाता है. सूर्य की उर्जा भी नाभिकीय सलयंन अभिक्रियाओं की एक श्रेणी परिणाम है.

हाइड्रोजन बम

हाइड्रोजन बम एडवर्ड टेलर एवं अन्य अमेरिकी वैज्ञानिकों ने वर्ष 1952 में बनाया. हाइड्रोजन बम नाभिकीय अनियंत्रित सलयन संक्रिया पर आधारित है.

रेडियो समस्थानिकओ के उपयोग

  • आयोडीन-131 का प्रयोग थायराइड ग्रंथि की संरचना तथा कार्यशिलता का अध्यन करने एवं घेघे के उपचार के लिए किया जाता है.
  • कोबाल्ट-60  का प्रयोग कैंसर के उपचार की वार्हा किरणी पद्धति में किया जाता है.
  • सोडियम-24  को रक्त के बहाव की जांच करने के लिए नमक के विलयन के साथ शरीर में इंजेक्शन द्वारा डाल दिया जाता है.
  • फास्फोरस-32  का प्रयोग ल्युकेमियां के उपचार के लिए किया जाता है.
  • कार्बन-14  का प्रयोग प्रकाश संश्लेषण  की विधि की का अध्ययन करने के लिए किया जाता है.

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