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बिहार में पर्यटन


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बिहार में पर्यटन, bihar ke prytan, bihar mein sthal, bihar munger ka kila, bihar mein pashu mela, bihar mein rohtas ka kila, bihar mein naalanda vishv-vidhylay

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More Important Article

बिहार में पर्यटन

बिहार में राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय महत्व के स्थल

  • महाबोधि मंदिर (बौद्धगया)
  • सोनपुर का अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय पशु मेला
  • नालंदा महाविहार के अवशेष (नालंदा)
  • शेरशाह का मकबरा (सासाराम)
  • रोहतास का किला (सासाराम)
  • मुंगेर का किला (मुंगेर)
  • देव का सूर्य मंदिर (औरंगाबाद)
  • विशाल का गढ़, अशोक स्तंभ (वैशाली)
  • अशोक स्तंभ, लोरिया नंदनगढ़ (पश्चिम चंपारण)
  • केसरिया सहित विश्व का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप (पूर्वी चंपारण)
  • बिहार शरीफ सहित बौद्ध विहार व मकबरे आदि
  • राजगीर स्थित गर्म जल के कुंड एवं पुरातात्विक स्थल व चीजें
  • बराबर की गुफाएं एवं बराबर की पहाड़ियां (गया)
  • पटना के अनेक प्राचीन व अन्य ऐतिहासिक स्थल

बिहार के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

नालंदा

नालंदा प्राचीन काल से शिक्षा और ज्ञान केंद्र रहा है. आज भी नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष मौजूद है जो नालंदा जिला अंतर्गत राजगीर से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. नालंदा महाविहार के अवशेषों की खोज सर्वप्रथम पुरातत्वशास्त्री अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी.

सातवीं शताब्दी में यहां स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में दुनिया भर से विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे. चीन से ह्येंसांग, इत्सिग (सातवीं सदी) तथा तिब्बत से लामा तारानाथ (9 वीं सदी) एवं धर्मस्वमीन (तेहरवीं सदी) जैसे छात्र नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने आए थे. ह्येंसांग जो इसी विश्वविद्यालय में विद्यार्थी और शिक्षक दोनों रूपों में रहे हैं, नालंदा विश्वविद्यालय का विस्तृत वर्णन किया है.

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पांचवी सदी ई. में कुमार गुप्त ने की थी. बुद्ध गुप्त ने इसे अनुदान दिया था. पाल वंश शासक धर्मपाल ने इसे महावीर को 200 गांव का अनुदान में प्रदान किए हैं. हर्षवर्धन के काल तक यह शिक्षा का एक अंतर्राष्ट्रीय केंद्र के साथ महायान दर्शन का केंद्र बन चुका है. यह विश्व का अपने प्रकार का प्रथम विश्वविद्यालय था, जहां प्रवेश परीक्षा ली जाती है, उन्तीर्ण छात्रों को ही अध्ययन की अनुमति दी जाती है.

नालंदा को समुद्रगुप्त का एक ताम्रपत्र और यशोधर्मन के प्रस्तर स्तंभ अभिलेख के लिए भी जाना जाता है. यहां स्थित नव नालंदा महाविहार ह्येंसांग स्मारक के लिए प्रसिद्ध है, 12 फरवरी 2007 को नालंदा में निर्मित ह्येंसांग समृद्धि भवन के उद्घाटन समारोह में भाग लेने के लिए चीन के विदेश मंत्री ली. चाउग शिंग नालंदा आए थे. इस भवन में ह्येंसांग का अस्थिकलश स्थापित किया गया है.

जुलाई 2016 में इस्तांबुल (तुर्की) में हुई यूनेस्को की विश्व विरासत समिति की बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार नालंदा महाविहार को विश्व विरासत सूची में सांस्कृतिक स्थलों की श्रेणी में शामिल किया गया है.

राजगृह (राजगीर)

नालंदा से 19 किलोमीटर तथा पटना से 103 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है राज्य का प्राचीन नाम गिरिव्रज था. वर्तमान में इसे राजगीर के नाम से भी जाना जाता है, जो बिहार के नालंदा जिले में है. यह मगध सम्राज्य की प्राचीन राजधानी थी.

पुराणों के अनुसार चंडप्रद्योत ने यहां मगध की राजधानी बसायी है. महाभारत काल में जरासंध की तथा मगध नरेश बिंबिसार एवं अजातशत्रु की राजधानी राजगृह में ही थी. गया से 34 किलोमीटर दूरी पर स्थित राजगीर को राजा का घर भी कहा जाता है. यह हिंदू, बौद्ध एवं जैनियों का एक प्रमुख धर्म स्थल है.

महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी दोनों ने ही यहां वास किया है. चीनी यात्री ह्येंसांग ने भी यहां की यात्रा की थी. राजगीरे पांच पहाड़ियों- विपुल गिरी, रतन गिरी, उदयगिरि, सोनगिरी तथा वैभव गिरी के बीच बसा हुआ है. ग्रिद्धकुट के नाम से प्रसिद्ध था. महान शिल्पी महागोविंद ने राजगिरा नगर का निर्माण योजना बनाई थी.

राजगृह के दर्शनीय स्थलों में- वेणुवन, करंद सरोवर, जरासंध का अखाड़ा, राजगीर दीवार के अवशेष, रज्जू मार्ग, जीवकामन , सोन भंडार गुफाए (संभवत मौर्य कालीन) परवर्ती स्थलों में गुप्तकालीन मनियार मठ है (सर्प-पूजा संस्कार से संबंधित है) बिंबिसार की जेल (जहां अजातशत्रु ने अपने पिता को बंदी बनाकर रखा.) मध्यकालीन सूफी संत मखदूम सरफुद्दीन याहिया मनेरी का हजुरा (प्रार्थना करने की गुफा) गर्म जल कुंड आदि प्रमुख है.

जैन धर्मावलंबी राजगीर को अपने दूसरे तीर्थकर मुनि सुब्रत का जन्म स्थान मानते हैं. ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के महावस्तु नामक एक बौद्ध ग्रंथ के अनुसार इस नगर में 36 विभिन्न प्रकार के शिल्पों का केंद्र था. वैभवगिरी (वैभवा हिल) सती के गर्म जल कुंड में स्नान एवं रज्जू मार्ग (रोप वे ) के माध्यम से प्रकृति के मनोरम दृश्यों का आनंद लेना यहां आने वाले पर्यटकों की प्राथमिकताओं में शामिल होते हैं.

राजगीर में प्रत्येक तीसरे वर्ष मलमास मेला लगता है तथा राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा हर वर्ष अक्टूबर माह के अंत में राजगीर नृत्य महोत्सव का आयोजन किया गया है. यहां के घोड़ाकटोरा में हाल ही में उत्खन्न कराए गए हैं. फिलहाल यहां एक आयुध कारखाना निर्माण दिन है तथा एक पुलिस ट्रेंनिंग महाविद्यालय प्रस्तावित है.

वैशाली

वैशाली विश्व की प्राचीनतम गणतंत्र के वर्तमान स्वरूप की जननी मानी जाती है. यह मुजफ्फरपुर से 37 किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम की ओर स्थित है. प्राचीन वैशाली के अवशेष वर्तमान वैशाली जिलातर्गत बसाढ़ नामक गांव में पाए गए हैं.

वैशाली का विकास लिच्छवीयों ने किया. प्रसिद्ध वज्जीसंघ की राजधानी वैशाली थी. वैशाली जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है. महावस्तु से ज्ञात होता है कि गौतम बुद्ध लिच्छवियों के निमंत्रण पर वैशाली गए थे. आम्रपाली यहां की राज नृत्य की थी, जिसने महात्मा बुद्ध के प्रभाव में आकर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया.

द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में 383 ई. पु. में हुआ था, अशोक स्तंभ, राजा विशाल का गढ़, मिरांजी की दरगाह, कमल वन, हरिकोटरा मंदिर, बावन पोखर मंदिर, बौद्ध स्तूप आदि यहां के महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल है.

गुप्तकाल में नालंदा आदि स्थानों से वैशाली में श्रेष्ठियों, सार्थवाह, प्रथम कुली को अधिक का आवागमन होता है, इनकी मोहरें शिल्पी की संगठनात्मक गतिविधियों को  प्रदर्शित करता है. यहां हुए उत्खननों में काले और लाल रंग के मृदभांड, लोहे के औजार मिले हैं. यहां से गुप्त कालीन मूर्तियों तथा गुप्त कालीन लिपि में उत्क्रमित मोहरे भी मिली है.

रैलिक स्तूप

रैलिक स्तूप भगवान बुद्ध के पार्थिव अवशेष पर बने देश के 8 मौलिक तत्वों में से एक है. बुद्ध के अस्थि अवशेष को 8 भागों में बांटा गया, जिनमें से एक वैशाली के लिछवियों को मिला था तथा शेष सात भाग मगध नरेश अजातशत्रु, कपिलवस्तु के शाक्य, अलकप के बूली, संमग्राम के लिए, दीप के एक ब्राह्मण तथा पावा एवं कुशीनगर के मल्लों को प्राप्त हुए थे.

कुंड ग्राम

कुंड ग्राम ज्ञात्रीक गणराज्य था, जो वजीसंघ का सदस्य था. सिद्धार्थ ज्ञात्रिक संघ के प्रमुख थे. इनके पुत्र महावीर थे, जो जैन धर्म के 24 में एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थकार हुए. 540 ईसा पूर्व में कुंडग्राम् या कुंडलग्राम (वैशाली के निकट) में महावीर का जन्म हुआ था

बिहारशरीफ

पटना से 64 किलोमीटर दूर स्थित बिहार शरीफ नालंदा जिला का मुख्यालय है तथा प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है. पाल वंश के शासक धर्मपाल ने आठवीं सदी ई. में यहां उदंतपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, जिसे तुर्की आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने करीब 1198 ई. में नष्ट कर दिया.

इसके आसपास फैले विहार के कारण पुरखों ने इसे अर्जे विहार (विहार की भूमि) कहा. तुगलक काल में यह बिहार की राजधानी थी. शेरशाह द्वारा 1541 ई. में राजधानी पटना ले आने के बाद बिहार शरीफ का महत्व घटने लगा. यहां तेरहवीं सदी में निर्मित मलिक इब्राहिम (मलिक बया) का मकबरा पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है तथा प्रसिद्ध सूफी संत मखदूम सरफुद्दीन याहया मनेरी की दरगाह की है.

चिरांद

चिरांद बिहार के छपरा जिले में स्थित है. यहां हुए उत्खनन ओं से पांच सांस्कृतिक चित्रण प्रकाश में आए हैं-

  1. चरण I – नव पाषाण
  2. चरण ii – ताम्र पाषाण
  3. चरण iii – नार्दन ब्लैक पोलिर्ड वेयर  
  4. चरण IV – ई. पु.  पहली शताब्दी से तीसरी शताब्दी ईस्वी सन्
  5. चरण V – उत्तर ऐतिहासिक/पूर्व मध्यकाल

इस स्थान से प्राप्त वस्तुओं में हड्डी के औजार और अलंकृत बर्तन, हड्डी के आभूषण, खुले चूल्हों सहित एक गोलाकार फर्श, खम्बे गाड़ने के गड्ढे, गेहूं, जौ, मूंग, और मसूर के दाने तथा चावल के छिलके के छापों सहित मिट्टी के टुकड़े आदि प्रमुख है, जो उस समय की सामाजिक आर्थिक स्थिति एवं कृषि की ओर संकेत करते हैं. यहां से लोहे की वस्तुएं, जानवरों की खुली कब्रें और हड्डी से बने वानाग्र दूसरे चरण में प्राप्त हुए हैं. चरण IV में यहां कुषाण काल का एक बौद्ध विहार तथा तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं.

लौरिया-नंदनगढ़ एवं लोरिया-अरेराज

पश्चिम चंपारण जिला में स्थित लोरिया नंदनगढ़ अशोक के स्तंभ के लिए प्रसिद्ध है. अशोक के प्रथम छह स्तंभ लेख उत्तर बिहार में लोरिया नंदनगढ़, लोरिया अरेराज और रामपुरवा से प्राप्त हुए हैं.

प्रथम स्तम्भ लेख में धम्म के प्रति अपनी निष्ठा, दूसरे स्तंभ लेख में धम्म के गुण तीसरे स्तंभ लेख में प्रजा को अपनी अच्छाइयों बुराइयों की चेतना रखने, चौथे स्तंभ लेख में राजुक नामक अधिकारियों के कार्यों, पांचवी स्तंभ लेख में पशु पक्षी वध को नियंत्रित करने तथा छठे स्थान में धम्म प्रचार हेतु उपाय और सभी धर्मों के प्रति अपनी श्रद्धा का उल्लेख अशोक ने किया. उत्खनन के क्रम में यहां एक बौद्ध स्तूप, सिक्के और उनके मृदभांडो के अवशेष प्राप्त हुए हैं.  कृष्ण काल में संभवत यहाँ एक मुद्रालय भी था.

रामपूर्वा

बिहार नेपाल सीमा के निकट स्थित रामपूर्वा से 2 अशोक तंबो के अवशेष प्राप्त हुए हैं. यह स्तंभ मौर्य कालीन वास्तुकला का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. इन पत्थरों की चमक विशेष आकर्षण शक्ति है. इन स्तंभों के शीर्ष भाग पर पशुओं (एक पर सिंह और एक पर सांड) की आकृतियां बनी है. इन स्तंभों पर कोई अभिलेख नहीं है.

बोधगया

गया से 14 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है बोधगया. यही पीपल के वृक्ष के नीचे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था. इस वृक्ष को बोधि वृक्ष तथा इस स्थान को उरुवेला कहा जाता है. सम्राट अशोक ने यहीं से पीपल के नन्हे पौधे श्रीलंका भिजवाए थे. बोधगया के निकट निरंजना नदी बहती है, जहां भगवान बुद्ध ने स्नान किया था.

यहीं महाबोधि मंदिर है, जहां भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा है. भगवान बुद्ध के जन्म के लगभग 26 वर्ष बाद यूनेस्को ने जुलाई, 2002 में बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर को विश्व विरासत घोषित किया. 1400 साल पुराने 180 फुट इस मंदिर को यूनेस्को ने पुरातात्विक चमत्कार माना है.

अनिमेशलोचन चैत्य इसी महाबोधि मंदिर के निकट स्थित है, जहां ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध एकटक देखते खड़े रहे थे. चंकामन एक उठा चबूतरा है, जहां भगवान बुद्ध ऊपर-नीचे टहले थे, यह जानने को कि यह ज्ञान विश्व को दिया जाए अथवा नहीं. यहीं पर एक विशाल धर्म चक्र या विधि चक्र के साथ ही  तिब्बत मठ स्थित है.

गया

फल्गु नदी के किनारे बसा गया बिहार का एक प्रमुख ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल है. यहां स्थित विष्णुपद मंदिर का निर्माण इंदौर की रानी अहिल्याबाई ने करवाया था. गया में कुषाण और गुप्त काल का निर्माण कार्य देखने को मिलता है. समुन्द्र गुप्त के समय श्रीलंका के शासक में मेधवर्मन ने गया में एक बिहार का निर्माण कराया था.

बंगाल के शासक शंशाक ने धार्मिक स्थलों को नष्ट कर दिया तथा बोधगया में बोधि वृक्ष को भी नुकसान पहुंचाया. पाल शासकों के अधीन धार्मिक स्थलों का पुनः निर्माण हुआ है. गया प्राचीन काल में धातु के मार्ग पर के अंतिम पड़ाव स्थल था.

बराबर की पहाड़ी

गया से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बराबर पहाड़ियों के बीच बनी गुफाएं मौर्यकालीन है और अशोक कालीन अभिलेख अंकित है. इन्हें सम्राट अशोक द्वारा आजीवक संप्रदाय के भिक्षुओ के निवास के लिए बनाया गया है.

यहां पर अशोक के तीन और उसके पुत्र दशरथ के तीन लघु शिलालेख सुरक्षित है. इन गुफाओं में करण चौपार, सुदामा गुहा, लोमश ऋषि की गुफा, और विश्व झोपड़ी प्रमुख है. गया जिलान्तर्गत बराबर तथा नागार्जुनि पहाड़ियों से मौखरी वंश के भी तीन लेख प्राप्त हुए हैं.

सोनपुर (गया)

बिहार के गया जिले में स्थित सोनपुर से नवपाषाण युगीन अनेक साक्ष्य मिले हैं. उत्खनन में यहां से 400 ई. पु. की एक कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है.

मुंगेर

पाल शासक देवपाल मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया. 1533-34 शेरशाह ने मुंगेर पर अधिकार कर लिया, जबकि 1563 अकबर ने मुंगेर को जीतकर मुगल साम्राज्य का अंग बना लिया. अंग्रेजों के हस्तक्षेप से मुक्त रहने के उद्देश्य से मीर कासिम ने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर में स्थापित की.

अकबर ने बिहार विजय के बाद मुंगेर में किले का निर्माण करवाया था, जिस का जीर्णोद्धार मीर कासिम ने करवाया था. मुंगेर में ब्रिटिश काल में ब्रिटिश सेना की छावनी थी. यहां पर अंग्रेज सैनिकों ने वेतन एवं भतों की मांग को लेकर विद्रोह किया. इस विद्रोह  को श्वेत सैनिक विद्रोह कहा गया है. इस विद्रोह के कारण यहां सैन्य छावनी भंग कर दी गई.

पावापुरी

पावापुरी नालंदा जिला में स्थित है. यह जैन धर्मावलंबियों का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, पावापुरी में महावीर स्वामी ने अंतिम उपदेश दिया और यहीं पर उनका निधन भी हुआ था. यहां का जलमंदिर संगमरमर की एक सुंदर इमारत है जो झील के मध्य स्थित है.

विक्रमशिला

विक्रमशिला भागलपुर जिला में स्थित है. यहां पाल काल में शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था. यहां पर विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के शासक धर्मपाल ने की थी. इसके अवशेष अतिचक से मिले हैं. तुर्कों के आने के पश्चात (बख्तियार खिलजी के आक्रमण के परिणामस्वरुप) इस विश्वविद्यालय का पतन हो गया.

अंग

प्राचीन काल में अंग महाजनपद था. इसकी स्थापना अंग नामक राजा ने की थी. महाभारत व पुराणों के अनुसार इसकी राजधानी चंपा का प्राचीन नाम मालिनी था.

अंग का मगध से हमेशा संघर्ष चलता रहा था. अंग का सबसे प्रसिद्ध ए राजा ब्रहादत्त था, जिसने मगध नरेश से भटीयम को हराकर मगध पर अपना अधिकार कर लिया था. कुछ समय पश्चात बिंबिसार ने ब्रहादत की हत्या कर के अंग पर अधिकार कर लिया.  तत्पश्चात बिंबिसार ने अपने पुत्र अजातशत्रु को अंग का उप राजा बना दिया. अंग वर्तमान बिहार के भागलपुर जिले में स्थित है.

कुम्हरार

कुम्हरार पटना में स्थित है, जहाँ मौर्यकालीन स्थापत्य कला का सबसे पहला उदाहरण चंद्रगुप्त के प्रसाद का अवशेष मिला है. कुम्हरार की खुदाई में प्रसाद के सभा भवन के जो अवशेष प्राप्त हुए हैं उससे पता चलता है कि यह सभा भवन 80 खंभों वाला हाल था. सन 1914-15 की खुदाई तथा 1951 की खुदाई में कुल मिलाकर 40 पाषाण स्तंभ मिले हैं, जो इस समय भग्न दशा में है.

बुद्ध स्मृति पार्क

भगवान बुद्ध के 2550वें महापरिनिर्वाण वर्ष एवं उनके ज्ञान प्राप्ति के 2600 वें वर्ष की स्मृति में निर्मित बुद्ध स्मृति पार्क, पटना जंक्शन के समीप पुराने बांकीपुर सेंट्रल जेल परिसर में अवस्थित है. 2013 ई. में यहां पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संघ समागम आयोजित हुआ, जिसमें 17 देशों के बौद्ध भिक्षुओं ने पावन दलाई लामा की उपस्थिति में भाग लिया.

22 एकड़ भूमि पर लगभग 125 करोड रुपए की लागत से बने इस पार्क में पाटलिपुत्र करुणा स्तूप नामक 200 मीटर ऊंचा बौद्ध परिक्रमा स्तूप के अतिरिक्त स्मृति संग्रहालय और ध्यान केंद्र (मेडिटेशन सेंटर) भी है.

पाटलिपुत्र

प्राचीन काल में पाटलिपुत्र का नाम कुसुमपुर अथवा पुष्पपुर था. पाटलीपुत्र मगध साम्राज्य, नंद वंश, मौर्य साम्राज्य, गुप्त राजवंश की राजधानी रहा है. आजकल यह पटना नाम से विख्यात है और बिहार राज्य की राजधानी है.

अजातशत्रु ने पाटलिपुत्र का जिला बनवाया था, जबकि उसके पुत्र उदयिन पाटलिपुत्र नगर बसाया और इसे मगध साम्राज्य की राजधानी बनाया. आधुनिक शोधों से ज्ञात होता है कि पाटलिपुत्र नाम का यह महानगर है एक लंबी पट्टी के रूप में कुम्हारर के आधा मील उत्तर में विस्तृत था. सम्राट अशोक का राजमहल छोटी पहाड़ी में कुम्हारर तक 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला था.

पाटलिपुत्र (पटना) में ही भिखना पहाड़ी स्थित है, जो एक कृत्रिम पहाड़ी है. इसकी ऊंचाई लगभग 12 मीटर है और यह एक मील के घेरे में विस्तृत है. यहां पटना के नवाबों की रियासत थी. यही सम्राट अशोक ने संत की कुटिया रूपी पहाड़ी बनवाया था. अशोक ने ही यहां पांच पहाड़ियों का निर्माण कराया था.

चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आए यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने पाटलिपुत्र के कुम्हरार, भिखना पहाड़ी, अगम कुआं, बुलंदी बाग, कंकड़बाग तथा अन्य निकटवर्ती स्थानों का वर्णन अपने यात्रा- वृत्तांत में किया था. अजातशत्रु के उत्तराधिकारी उदय भद्र (उदयीन) मगध की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र स्थानांतरित किया था. पटना में गत वर्षो में जो खुदाई हुई उससे कष्ठ निर्मित दीवार के अवशेष प्राप्त हुए हैं. बुलंदी बाग की खुदाई में प्राचीर का एक अंश उपलब्ध हुआ है.

अशोक के शासनकाल में 250 ई. पु. पाटलिपुत्र में बौद्ध धर्मावलंबियों गठित करने के लिए बौद्ध परिषद का तीसरा सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता मोगलीपूत तिस्स ने की थी, गुप्त साम्राज्य के पतन और हूणों के आक्रमण के पश्चात इस नगर का पतन हो गया. सातवीं शताब्दी के चीनी यात्री युवान श्वांग ने पाटलिपुत्र की नष्ट अवस्था का वर्णन किया है

तारीखे दाऊदी के विवरण के अनुसार 1541 में शेर शाह ने इस नगर के सामरिक महत्व और भौगोलिक स्थिति को देखते हुए एक यहां मजबूत किले का निर्माण कराया. इस पर ₹5 लाख खर्च हुए हैं. शेरशाह ने बिहार शरीफ से हटाकर पटना को राजधानी बनाया. अकबर ने 1574 में पटना पर मुगल शासन स्थापित किया और 1580 में यहां पर टकसाल और मुद्रालय स्थापित किया.

1738-39 में नगर शाहदरा दिल्ली में कत्लेआम के बाद कुछ समय के लिए अजीमाबाद का नगर ही उत्तर भारत का सबसे महत्वपूर्ण शैक्षिक और सांस्कृतिक केंद्र बन गया था. 1912 में बिहार में प्रांत के गठन के बाद इस नगर का विस्तार हुआ तथा इसका महत्व बढ़ा. पटना की नगर देवी पटनदेवी के नाम पर ही संभवत इस नगर का नाम पटना पड़ा है.

आधुनिक पटना के मुख्य भागों में राज भवन, नया तथा पुराना सचिवालय भवन, बिहार विधानसभा तथा विधान परिषद भवन, उच्च न्यायालय भवन आदि प्रमुख है. पर्यटन की दृष्टि से पटना के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों में किला हाउस, शेरशाह का किला, गांधी घाट, लक्ष्मी नारायण मंदिर, बिरला मंदिर, वीर कुंवर सिंह पार्क, सदाकत आश्रम, महात्मा गांधी सेतु आदि उल्लेखनीय है

इटली और भारत के पुरातात्वविवादों द्वारा पाटलिपुत्र के अवशेष की खोज का प्रयास

प्राचीन भारत की सबसे समृद्ध राजधानी पाटलिपुत्र के अवशेष खोजने के लिए अब इटली के पुरातात्विविवादों ने पहल किया है, अभी तक पुरातात्वविद सिर्फ मौर्य वंश से संबंधित साक्ष्य ही ढूंढ पाए हैं, जब की खुदाई के दौरान इससे पूर्व के हर्यक वंश, शिशुनाग वंश तथा नदवा से संबंधित और संभवत: महाभारत काल के भी कई महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हो सकते हैं.

सर्वप्रथम बुकानन के द्वारा प्राचीन पाटलिपुत्र के भग्नावशेष का सर्वे किया गया. बाद में अंग्रेज विद्वान सर अलेक्जेंडर कनिंघम तथा बेंगलर द्वारा प्राचीन पाटलिपुत्र की पहचान की गई. 1892 ई. में अंग्रेज विद्वान वाडेल ने पटना का वन संरक्षण किया तथा 1893 में यहां उत्खनन करवाया.

हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉक्टर फनीकांत मिश्र के निर्देशन में पुनः इंन स्थलों पर काम प्रारंभ किया गया. इसके लिए इटली ने प्रो विरालडी को तथा भारत ने डॉक्टर फनीकांत मिश्र को इसका कार्य सौंपा है. इटली में पुरातत्व निर्देशक विरालडी बुद्धिस्ट सर्किट पर काम कर रहे हैं. उन्होंने अक्टूबर 2007 में नेपाल के गोदियावा में उत्खनन करवाया.

हरमंदिर

गुरुद्वारा तख्त श्री हरमंदिर पटना सिटी पटना में है जो सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के जन्म स्थल पर बना है. गुरु गोविंद सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1666 को पटना सिटी में हुआ था. यहां एक संग्रहालय है जिसमें गुरु गोविंद सिंह से संबंधित है जिसमे अनेक अवशेष सुरक्षित हैं. इनमें गुरु ग्रंथ साहिब की एक प्रति है, जिसमें गुरु के हस्ताक्षर हैं.

पादरी की हवेली

पादरी की हवेली पटना का सबसे पुराना चर्च है. इसका निर्माण 1772 में फादर जोसफ ने आरंभ किया.

पत्थर की मस्जिद

पत्थर की मस्जिद पटना में स्थित है इसका निर्माण जहांगीर के पुत्र शाहाजादा परवेज के आदेश पर नजर खान द्वारा 1626-27 में कराया गया था.

गोलघर

गोलघर पटना में गांधी मैदान के समीप स्थित है तथा इसकी ऊंचाई 96 फिट है. इसका निर्माण में कैप्टन ने अनाज रखने के उद्देश्य से करवाया था. राज्य में पहले म्यूजिकल फाउंटेन लेजर शो का शुभारंभ यहीं पर 14 जनवरी, 2013 को हुआ. वृंदावन, अहमदाबाद और दिल्ली अक्षरधाम के बाद यह देश का चौथा वाटर स्क्रीन पर लेजर शो है.

गुरहट्टा

गुरहट्टा पटना सिटी में से एक ऐतिहासिक मोहल्ला है जहां तीन जुलाई 1857 को पीर अली के नेतृत्व में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का जवाला भड़का. पीर अली गुरहट्टा का ही रहने वाला एक छोटा सा पुस्तक विक्रेता था. अंग्रेज अधिकारी लायल की हत्या के आरोप में पटना के अंग्रेज कमिश्नर टेलर ने पीर अली को फांसी दे दी.

सादिकपूर

पटना में सादिकपुर एक मोहल्ला है जहां वहाबी आंदोलन का केंद्र था.

बॉस घाट

बॉस घाट पटना में गोलघर के समीप गंगा नदी के तट पर अवस्थित है. यही राजेंद्र घाट पर भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की समाधि है.

शहीद स्मारक (सप्तमूर्ति)

शहीद स्मारक पटना सहित बिहार विधानमंडल (पुराना सचिवालय) के प्रवेश द्वार के सामने हैं. यह स्मारक भारत छोड़ो आंदोलन में शहीद होने वाले 7 शहीदों की याद में बनवाया गया है.

सदाकत आश्रम

पटना में स्थित सदाकत आश्रम वर्तमान में बिहार प्रदेश कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय है. प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद अवकाश प्राप्त करने के पश्चात यहीं पर थे. इसे मौलाना मजहरुल हक ने असहयोग आंदोलन के दौरान उपयोग हेतु प्रदान किया था.

गुलजार बाग

गुलजारबाग को मीर कासिम के भाई गुलजार अली ने बताया था. गुलजरबाग के दक्षिण में प्रसिद्ध पटना देवी का मंदिर स्थित है. मुगल प्राश पंथी राजा मान सिंह द्वारा इस मंदिर का निर्माण 1587-94 के दौरान कराया गया था.

मनेर

मनेर पटना जिला में स्थित है. यह मध्यकाल में बिहार में सूफी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था. मनेर में मकदूम सरफुद्दीन याहिया मनेरी तथा साह दौलत की मजार है. जहाँगीर के द्वारा नियुक्ति प्रातपन्ति इब्राहिम खान काकर ने यहां एक मकबरे का निर्माण करवाया था, जो मुगल स्थापत्य, का एक श्रेष्ठ उदाहरण है. मनेर में व्याकरण के विश्व ख्याति ज्ञाता पाणीनी रहते थे.

चौसा

चौसा बिहार की पश्चिम सीमा पर बक्सर के समीप बसा एक ऐतिहासिक स्थान है जो कर्मनाशा नदी के तट पर अवस्थित है. यहीं पर 1539 ई. में शेरशाह ने मुगल सम्राट हुमायूं को पहली बार हराया था. यह मुगलों की भारत में पहली किंतु निर्णायक पराजय थी, 1540 के कन्नौज बिलग्राम के युद्ध में हुमायूं के उन्हें पराजित होने से मुगल साम्राज्य का कुछ समय के लिए भारत में अंत हो गया था.

चंपारण

भारत की स्वतंत्रता संग्राम में चंपारण का विशेष महत्व है चंपारण में नील उत्पादक किसानों पर अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध गांधी जी ने सत्याग्रह का पहला सफल प्रयोग यही पर किया है.

1916 में कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ. इस अधिवेशन में चंपारण की समस्या पर चर्चा हुई. वहीं पर राजकुमार शुक्ल ने किसानों की इस समस्या के समाधान हेतु गांधी जी को चंपारण चलने का अनुरोध किया. गांधी जी ने चंपारण आकर किसानों की दयनीय स्थिति को देखा और उन्हें तीनकठिया की समस्या से मुक्त करवाया. केसरिया (पूर्व चंपारण) में खुदाई में विश्व का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप मिला है.

सासाराम

सासाराम पटना से 193 किलोमीटर दूर दिल्ली कोलकाता रेल मार्ग पर स्थित है. शेरशाह सूरी का किला और मकबरा स्थित है. शेरशाह सूरी का प्रसिद्ध किला 150 फीट ऊंचा है. इसके गुंबद 72 फीट ऊंचे हैं. इसकी ऊंचाई ताजमहल (आगरा) से भी 12 फीट अधिक है.

सासाराम नगर के पूर्व में चंदन पीर पहाड़ी पर एक गुफा में अशोक के शिलालेख पाए गए हैं. इसमें अशोक द्वारा धम्म यात्राओं की विस्तृत चर्चा मिलती है. पहाड़ी की चोटी पर एक मुसलमान फकीर की दरगाह है जिनके नाम से यह पहाड़ी प्रसिद्ध है.

रोहतासगढ़

बिहार के मध्य कालीन स्मारकों में रोहतास गढ़ का विशेष महत्व है. यह चित्र स्थानीय चेरों शासकों के अधीन था. इस पर शेरशाह ने उस समय अधिकार किया जब वह बिहार में अपनी सत्ता सुदृढ़ कर रहा था.

शेरशाह ने हुमायु के साथ संघर्ष और उसके पूर्व बंगाल पर सफल अभियान के क्रम में बंगाल से प्राप्त धन को सुरक्षित रखने के लिए रोहतास के दुर्ग का ही उपयोग किया था. शेरशाह के राजनीतिक उत्कर्ष से में रोहतास के दुर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इस क्षेत्र में मुगल सत्ता की स्थापना के साथ ही रोहतासगढ़ मुगलों का एक महत्वपूर्ण शामरिक केंद्र बना है. रोहतास में अनेक मंदिर भी स्थित हैं जिनमें रोहतास मंदिर, हरीश चंद्र मंदिर, गणेश मंदिर और महादेव मंदिर प्रमुख है.

बक्सर

बक्सर का बिहार के साथ साथ भारतीय इतिहास में भी एक विशिष्ट महत्व है. यहां पर 1764 ई. में मुगल सम्राट साह-आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजा उद दौला और बंगाल के विस्थापित नवाब मीर कासिम तथा अंग्रेजो के बीच युद्ध हुआ. इस युद्ध में अंग्रेजो की जीत हुई और भारत में अंग्रेजों की सत्ता मजबूत हुई.

चंपा

चंपा आधुनिक चंपानगर है जो बिहार के भागलपुर जिले में स्थित है. चंपा, अंग महाजनपद की राजधानी था, जिसे मगध के शासक बिहार ने अपने राज्य में मिला लिया था.

रेशमी वस्त्रों के उत्पादन का यह एक प्रमुख केंद्र था तथा दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों को यहां से रेशमी वस्त्र निर्यात होते थे. जैन ग्रंथों के अनुसार यहां जैन तीर्थ वासुपूज्य का जन्म हुआ है. यहां हुए उत्खननों में से एक सुरक्षात्मक प्राचीन और डिजाइन सहित उत्कृष्ट कोटि के काले मृदभांड मिले हैं.

जगदीशपुर

आरा से लगभग 35 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम की ओर स्थित जगदीशपुर 1857 के विप्लव के नायक बाबू कुंवर सिंह का जन्म स्थल है. जगदीशपुर और आसपास के क्षेत्र से उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध छेड़ा था जो लगभग 1 साल तक चलता रहा.

बानगावं

सहरसा से 8 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है बनगांव एक ऐतिहासिक गांव है कोशी प्रमंडल का एक प्रमुख पुरातात्विक स्थल है, जहां की खुदाई से अनेक पाल कालीन सिक्के व अवशेष प्राप्त हुए हैं. यहां परमहंसी लक्ष्मीनाथ गोस्वामी नामक संत की कर्म स्थली के रूप में विख्यात है. बनगांव में भगवती का एक मंदिर है जिसमें देवी दुर्गा की एक पाल कालीन मूर्ति है.

इसके उत्तर में देवना नामक स्थान पर वाणेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है. कुछ विशेष में मूर्ति एवं चित्रों में बौद्ध धर्म, भगवान बुद्ध एवं पाल कालीन कला की झलक भी देखते हैं. 1987 में यहां से प्राप्त मिट्टी के घड़े में चांदी के आहत सिक्के, सोने की चिड़िया, तांबे की चूड़ी और मनके मिले हैं.

देव

देव गया से 20 किलोमीटर की दूरी पर औरंगाबाद जिला में स्थित है, जहां प्राचीन सूर्य मंदिर स्थित है. यहां प्रतिवर्ष भव्य छठ पूजा आयोजित होता है. 1880 में कनिंघम ने यहां से एक उल्लेख खोजा था, जिसमें प्रवर्ती 3 गुप्त शासकों ने के नाम मिलते हैं. लेख में सूर्य मंदिर के लिए वृणीक का नामक गांव दान देने का उल्लेख मिलता है.

सूरजगढ़ा

1536 में यही एक निर्णायक युद्ध में शेर शाह ने अपने प्रतिद्वंदी निभानी पठान सरदारों और उनकी सहायता कर रही बंगाल की सेना को पराजित कर बिहार में अपने राजनीतिक वर्चस्व को सुरक्षित कर दिया था.  इसी युद्ध से उसके बंगाल अभियान और तत्पश्चात हुमायु के साथ निर्णायक संघर्ष की भूमिका बनी.

अन्य प्रमुख स्थल

ऐतिहासिक महत्व के अन्य स्थानों में चंपारण स्थिति केसरिया (विश्व का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप के अवशेष के लिए) कहलगांव (बरारी गुफाओं और गुफा मंदिर के लिए) सुल्तानगंज (जहांगीर कालीन प्रसिद्ध जिला के लिए) प्रसिद्ध है.

इनके अतिरिक्त मंदार पर्वत, सिमरावगढ़, (कर्नाटक शासकों की राजधानी, जो नेपाल की तराई क्षेत्र में स्थित है) आदि भी उल्लेखनीय ऐतिहासिक स्थल है.


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