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स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के साधु संतों का योगदान

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स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के साधु संतों का योगदान

सन्यासी विद्रोह

ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध प्रथम विद्रोह 1763 में बंगाल और बिहार के संन्यासियों ने ही किया था. इसे इतिहास में सन्यासी विद्रोह के नाम से जाना जाता है. इस विद्रोह ने किसानों के विद्रोह को धार्मिक प्रेरणा भी प्रदान की है.

बंगाल और बिहार में पहले सन्यासी विद्रोह के कई नेता थे, जिसमें प्रमुख थे- मजनूशाह ,देवी चौधुरानी रामानंद गोसाई आदि. पूर्णिया में भी 1770-71, में इस तरह के हमले हुए, जिसमें पांच सौ विरोधी पकड़े गए. इन विद्रोहियों के कार्यक्रमों से तंग आकर वारेन हेस्टिंग्स ने अत्यंत कठोर आदेश पारित कर विद्रोहियों का दमन किया.

1776 में सन्यासी विद्रोह का प्रमुख केंद्र पटना के आसपास के अंचलों में था. सारण जिले में 5000 विद्रोहियों की सेना एवं अंग्रेजो के बीच मुठभेड़ हुई जिसमें अंग्रेजी सेना पराजित भी हुई.

स्वामी सहजानंद सरस्वती

स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला के देव गांव में 1889 ईसवी में हुआ था. उनके बचपन का नाम नौरंग राय था तथा उनके पिता का नाम बेनी राय था.  विद्रोही गतिविधियों के कारण उन्हें 1922-1923 में गाजीपुर, बनारस, फैजाबाद तथा लखनऊ जेलों में भी रहना पड़ा.

1920 में बिहार दौरे के समय पटना में 5 दिसंबर को एक संत से गांधी जी की भेंट हुई. यह संत स्वामी सहजानंद सरस्वती थे. गांधी जी से भेंट के बाद उनकी वास्तविक देश सेवा आरंभ हुई. आरम्भ में उनका कार्य क्षेत्र बक्सर, भभुआ तथा शाहाबाद था. परंतु 1924 के बाद वे संपूर्ण बिहार में प्रसिद्ध हो गए.

सन 1927 में बिहटा (पटना) में सीताराम आश्रम को केंद्र बना कर वे संपूर्ण बिहार वासियों की सेवा में लग गए. उन्होंने किसानों के हित में विशेष कार्य किया. इस क्रम में उन्हें अनेक बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी. 61 वर्ष की अवस्था में 1950 ईसवी में उनका देहावसान हुआ.

भवानी दयाल सन्यासी

इनके माता-पिता बिहार के रोहतास जिला के बहुआरा ग्राम के निवासी थे, बाद में कुली बन कर दक्षिण अफ्रीका चले गए. जोहांसबर्ग में 1892 में उनका जन्म हुआ. दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी से इनकी भेंट हुई और उनसे प्रभावित होकर यह भी अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए. अपने विद्रोही स्वभाव के कारण इन्हें दक्षिण अफ्रीका में कई बार जेल यात्राएं भी करनी पड़ी.

सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ये बिहार में सक्रिय थे. अत: 1930 में इनको गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में भेज दिया गया. यहां से इन्होंने कैदी मथुरा प्रसाद सिंह के सहयोग से हस्तलिखित पत्रिका कारावास निकाला. बिहार से प्रकाशित कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन इनके द्वारा किया गया है.

विदेशों में भारतीय सभ्यता-संस्कृति, भारतीय भाषा और भारतीय स्वतंत्रता का अलख जगाने वालों में भवानी दयाल सन्यासी का नाम अग्रणी है.

बाबा राम लखन दास उर्फ लाखन बाबा

लखन बाबा का जन्म झांसी में हुआ था, परंतु बाबू राजेंद्र प्रसाद के आग्रह पर वह छपरा जिले के सोनपुर प्रखंड में आ गए और यहीं के होकर रह गए. वह आरंभ से ही समाज सेवी, देश भगत और क्रांतिकारी थे. भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में भाग लिया.

वह आम जनता के आस्था केंद्र थे, इसलिए जनता पर इसका बहुत प्रभाव था. जब भारतीयों पर अंग्रेजी शासन का दबाव पड़ने लगा तो वह खुलकर सामने आ गए और गांवों में घूम घूमकर अंग्रेजी शासन के विरूद्ध प्रचार करने लगे. अंग्रेजों ने बाबा की गिरफ्तारी के अनेक प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हो पाए.

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