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बिहार में धर्म एवं सुधार आंदोलन

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बिहार में धर्म एवं सुधार आंदोलन

बौद्ध था जैन दोनों ही धर्मों का उद्गम स्थल बिहार रहा है.

बिहार में बौद्ध धर्म व भगवान बुद्ध

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक भगवान बुद्ध का जन्म लगभग 563 ई. पु. में नेपाल स्थित कपिलवस्तु के लिंबोड़ी नामक स्थान में हुआ था. बुद्ध के बचपन का नाम गौतम और सिद्धार्थ था. उनके पिता का नाम शुद्धोधन तथा माता का नाम महामाया था.

16 वर्ष की आयु में यशोधरा नामक कन्या से उनका विवाह हुआ. 28 वर्ष की अवस्था में यशोधरा से उन्हें राहुल नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. 29 वर्ष की आयु में वह घर छोड़कर चले गए. इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है.

गृहत्याग के बाद ज्ञान की खोज में भटकते हुए राजगीर पहुंचे गौतम के प्रथम दो गुरु हुए- अलार और उदर्क. 35 वर्ष की आयु में निरंजना नदी के किनारे पूर्व बेला नामक वन में पहुंचे और पांच ब्राह्मण साथियों के साथ घोर तपस्या की, परंतु कोई फल नहीं मिला. तत्पश्चात वे गया पहुंचे जहां पर साधना के आठवें दिन वैशाख पूर्णिमा को एक पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ.

उस पीपल वृक्ष को बोधि वृक्ष, उस स्थान को बौद्ध गया, गौतम को बुद्ध तथा इस घटना को बौद्ध धर्म में संबोधित कहा जाता है. ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने 40 वर्ष तक मगध, सारनाथ है, वैशाली आदि क्षेत्रों में अपने धर्म का प्रचार किया. गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश (प्रवचन) सारनाथ में दिया. इस घटना को धर्म चक्र प्रवर्तन कहा जाता है.

उनके उपदेश अत्यंत सरल थे तथा इन में सर्वप्रथम चार आर्य सत्य का प्रतिपादन हुआ- संसार में दुख है, दुख का कारण है, दुख का निवारण संभव है, और इसके लिए उपाय है दुख दूर करने के लिए उन्होंने अष्टांगीग मार्ग बताया, जिसमें सम्यक दृष्टि, समय श्रृंखला पर, सम्यक वाक, सम्यक समाधान पर उन्होंने जोर दिया.

नैतिक आचरण को शुद्ध करने के लिए बुद्ध ने 10 शीलों का आदेश दिया, जिसमें अहिंसा, सत्य, असत्य, अपरिग्रह एवं ब्रहाचर्य, नृत्य गान का त्याग, श्रृंगार प्रसाधनों का त्याग, कोमल विस्तर का त्याग एवं कामिनी कांचन का त्याग शामिल है. 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर नामक स्थान पर बुद्ध का महापरिनिर्वाण (देहावसान) हुआ.

प्रथम बौद्ध संगीति अजातशत्रु के शासनकाल में राजगृह में 483 ईसा पूर्व मे महाकस्सप की अध्यक्षता में संपन्न हुई. द्वितीय बौद्ध संगीति कलशोक के शासन काल में वैशाली में 383 ई. पु. में सबाकामी की अध्यक्षता में आयोजित हुई. तृतीय बौद्ध संगीति अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में लगभग 250 ई,पु, में मोगलीपुत्तिस की अध्यक्षता में संपन्न हुई. चतुर्थ बौद्ध संगीति कनिष्क के शासनकाल में प्रथम सदी ईसवी सन में कश्मीर के कुंडलवन में वसुमित्र की अध्यक्षता में संपन्न हुई.

इस चतुर्थ बौद्ध संगीति के पश्चात बौद्ध धर्म के दो भागो हीनयान और महायान में विभाजित हो गया.

बिहार में संपन्न बौद्ध संगीतिया

क्रम काल स्थल अध्यक्ष शासक कार्य
प्रथम लगभग 483 ई. पु. राजगृह (सप्तपर्णी गुफा) महाकस्सप अजातशत्रु सतु एवं वन्य पिटको की रचना
द्वितीय लगभग 383 ई,  पु. वैशाली (चुल्वग्ग) सबाकामी कालाशोक बौद्ध धर्म दो भागों- सत्यवीर एवं महासाधिंक में विभाजित है.
तृतीय लगभग 383 ई. पु. पाटलिपुत्र मोगलीपुत्त तीस अशोक अभीदम पिटक की रचना, संघभेद रोकने के लिए नियम बनाए गए.
चतुर्थी प्रथम सदी ईसवी सन कश्मीर (कुंडलवन) वसुमित्र (उपाध्यक्ष अशवघोष) कनिष्क विभाषा शास्त्र, नामक टीका संकलित बौद्ध मत दो संप्रदायों हीनयान एवं महायान में बट गया.

गौतम बुद्ध से संबंधित व्यक्ति

  • प्रजापति गौतमी:-  धाय माता (मौसी)
  • चना:-  सारथी
  • अलार क्लॉम:- प्रथम गुरु
  • चुनंद:-  पावा का लोहार या सुनार, जिसके यहां बुद्ध ने भोजन| भक्षण किया, जिसके कारण उन्हें अतिसार रोग हो गया और अतः उनकी मृत्यु हो गई.
  • कंठक:-  गौतम बुद्ध का प्रिय घोड़ा
  • उदरक रामपुत:-  बुद्ध के द्वितीय गुरु
  • बिंबिसार, अजातशत्रु (मगध नरेश), प्रसेनजीत (कोसल के शासक), उदयन (कौशांबी के शासक)  गौतम बुद्ध के वे शिष्य जो राजा थे.

बिहार में जैन धर्म व महावीर स्वामी

बिहार की धरती पर जैन धर्म का उदय शताब्दी ई. पु. में हुआ था. जैन धर्म में कुल 24 तीर्थकर हुए. प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे, जगजीत 24वें और अंतिम तीर्थंकर महावीर हुए.

जैन धर्म के प्रवर्तक वर्द्धमान महावीर थे. लिच्छवी वंश से संबंद्ध महावीर का जन्म 540 ई. पु. में वैशाली के समीप ग्राम में क्षत्रिय कुल में हुआ था. उसके पिता का नाम सिद्धार्थ था, जो कुंडग्राम के राजा थे.

उनकी माता का नाम त्रिशला था, जो एक लिच्छवी राजकुमारी थी तथा उसकी पत्नी का नाम यशोदा था, जिससे उन्हें प्रियदर्शना नामक पुत्री हुई. 30 वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया तथा 12 वर्ष की तपस्या के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई. 42 वर्ष की आयु में जांभिक ग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के किनारे साल के एक वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई.

इंद्रियों को जीतने के कारण वे केवल्य की प्राप्ति के पश्चात महावीर जिन, अर्हत एवं निर्ग्रन्थ (बंधनहीन) कहलाए तथा इस कारणवश उनके द्वारा प्रवर्तित धर्म जैन धर्म कहलाया. उन्होंने अपने विचारों का प्रचार किया तथा चंपा, मिथिला,  वैशाली एवं राजगीर में भ्रमण किया.

महावीर के अनुसार सभी प्राणियों के प्रति हिंसा का व्यवहार अनिवार्य है. उनके ईश्वर का अस्तित्व नहीं है और आत्मा की मुक्ति संयमित जीवन से ही संभव है. जैन धर्म में मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति के लिए  त्रिरत्न- सम्यक जीवन, सम्यक दर्शन, और सम्यक चरित्र का पालन अनिवार्य है.

महावीर ने जैन धर्म का प्रचार करने के लिए एक संगठित किया था तथा अपने प्रधान शिष्य इंद्रभूति के धर्म प्रचार का दायित्व सौंपा था. 72 वर्ष की अवस्था में 468 ई. पु. में राजगृह के निकट पावापुरी नामक स्थान पर इन्हें निवारण की प्राप्ति हुई.  जैन धर्म में दो संगीतियों का आयोजन किया गया.

प्रथम जैन संगीति का आयोजन तीसरी शताब्दी ई. पु. में पाटलिपुत्र में स्थूल भद्र की अध्यक्षता में संपन्न हुई. इस संगीति के पश्चात जैन धर्म दो भागों में बंट गया- श्वेतांबर और दिगंबर. द्वितीय जैन संगीति का आयोजन पांचवी सदी ई. में गुजरात के वल्लभी क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में संपन्न हुआ. 21 जैन तीर्थ कारों ने पारसनाथ में निर्वाण प्राप्त किया था. पार्श्वनाथ के अनुयायियों को निर्ग्रन्थ कहा जाता है.

पार्श्वनाथ वैदिक कर्मकांड और देववाद के कटु आलोचक थे. वे तप और संयम पर विशेष बल देते थे. उनके द्वारा प्रतिपादित चार सिद्धांत है- सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, और अस्तेय, जैन धर्म में संसारीक तृष्णा बंधन से मुक्ति को निर्वाण कहा गया है. जैन धर्म के दो संप्रदाय हैं- श्वेतांबर और दिगंबर.  

300 ई. पु. में मगध में लगातार 12 वर्ष तक अकाल पड़ने पर स्थूल भद्र के नेतृत्व में मगध दिन में ही निवास करने वाले और श्वेत वस्त्र धारण करने वाले जैन भिक्षु श्वेतांबर कहलाए, जबकि अकाल के समय जैन अचार्य भद्रबाहु के नेतृत्व में मगध छोड़कर श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चले जाने वाले जैन दिगंबर कहलाए. दिगंबर अपने को शुद्ध बताते थे और नग्न अवस्था में रहते थे.

चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल (322- 298 ई. पु.) पाटलिपुत्र में जैन धर्म के उपदेशों को संकलित करने के लिए एक महासभा (प्रथम जैन महासभा) का आयोजन किया गया. इसमें जैन धर्म के प्रधान भाग (12 अंगो) का संपादन हुआ. इस महासभा का दक्षिण के जैनों (भद्रबाहु आदि) ने बहिष्कार किया.

जिन्होंने अपने देश के लिए सामान्य बोलचाल की भाषा प्राकृत को अपनाया. जैन धार्मिक ग्रंथ अर्ध-मागधी भाषा में संकलित किए गए. जैन मुनि हेमचंद्र ने अपभ्रंश भाषा का पहला व्याकरण तैयार किया. जैनों के बाद में संस्कृत और कन्नड़ भाषा में भी प्रचुर मात्रा में लेखन किया.

जैन धर्म के अनुयायियों ने कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया. उन्होंने अनेक गुफाओं का निर्माण करवाया, जैसे- उदयगिरि की गुफा मंदिर, एलोरा की इंद्र सभा इत्यादि. 11वीं-12वीं सदी में जैन कला काफी विकसित हुई. आधुनिक काल में श्रवणबेलागोला में गोमतेश्वर की 75 फीट ऊंची मूर्ति की रचना ग्रेनाइट पत्थर को काटकर की गई.

बिहार में इस्लाम धर्म और सूफी सिलसिला

सूफी संतों के प्रयास से बिहार में इस्लाम का पर्याप्त प्रचार-प्रसार हुआ. बिहार में सर्वप्रथम चिश्ती सिलसिले के सूफी आए. बिहार में सबसे पहले आने वाले सूफी संतों में शाह मोहम्मद बिहारी एवं सैयद ताजूद्दीन प्रमुख थे.

बिहार आने वाले सूफी सिलसिले में सर्वाधिक महत्वपूर्ण फिरदौसी सिलसिला था. फिरदौसी सिलसिला के सर्वाधिक लोकप्रिय संत मखदूम सरफुद्दीन मैंनेरी है. इनका जन्म 1290 ई. में मनेर में हुआ था. मखदूम सरफुद्दीन मनेरी के पिता मखदूम याहिया मनेरी थे. जो सुहरावर्दी सिलसिले के सूफी संत है.

मखदूम सरफुद्दीन मनेरी का निधन 1381 ई. में बिहारशरीफ में हुआ था. उन का मकबरा आज भी पटना के निकट मनेर में अवस्थित है. विभिन्न सूफी संतों ने धार्मिक सहिष्णुता, सामाजिक सद्भाव, मानव सेवा और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का उपदेश दिया है. उनके उपदेशों की जानकारी उनके पुत्रों के संकलन मकतुबाते सदी तथा उनकी रचनाओं आदाबूल मुरुदीन से मिलती है.

अहमदिया संप्रदाय बिहार में 1893 ईसवी में आया. भागलपुर के हसन अली के नेतृत्व में यह आंदोलन जोर-शोर से चला. बुकानन के अनुसार 19वीं शताब्दी में दरियापंथी संप्रदाय की लोकप्रियता बरकरार थी तथा उस समय इस के अनुयायियों की संख्या 20,000 थी. उस समय संप्रदाय के प्रधान टेकदास थे. यह संप्रदाय हिंदू व मुसलमान संप्रदाय में समन्वय का पक्षधर था.

बिहार में सिख धर्म गुरु गोविंद सिंह

गुरु नानक ने बिहार के गया, पटना, राजगीर, मुंगेर, भागलपुर, कहलगांव आदि देशों की यात्रा करते हुए सिख धर्म का प्रचार प्रसार किया. सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द में बिहार आए. वह सासाराम और गया होकर पटना आए. पटना निवास के क्रम में ही उन्हें असम की तरफ प्रस्थान करना पड़ा. फलत: वह अपनी पत्नी गुजरी देवी को भाई कृपाल संरक्षण में पटना में ही छोड़ गए.

कुछ समय बाद माता गुजरी देवी ने पटना में 26 दिसंबर, 1666 को गुरु गोविंद सिंह को जन्म दिया. बुकानन के अनुसार 1812 ई. में बिहार में सिखों की संख्या लगभग 50,000 थी. गोविंद दास, हरिदयाल दास, और उदयन दास इन के प्रमुख धर्म प्रचारक थे. 1857 ई. के विद्रोह में बिहार के सिखों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

बिहार में ईसाई धर्म

बिहार में ईसाई धर्म का प्रसार सर्वप्रथम रोमन कैथोलिक पादरियों ने किया. 1620 में जहांगीर के आदेश पर पटना में ईसाई चर्च संगठन की स्थापना हुई. बिहार के एक मुगल गवर्नर खान द्वारा ईसाई धर्म ग्रहण करने की चर्चा भी मिलती है,

18 वीं शताब्दी के आरंभ में 1707 में दो पादरी, फादर डोमिनिक और फादर फ्रांसिस पटना से तिब्बत और नेपाल की यात्रा की और वह धर्म प्रचार के प्रयास किए. 1713 में पटना सिटी में ईसाइयों का पहला चर्च निर्मित हुआ. अभी भी यह इमारत और इसके पास के इलाके को पादरी की हवेली कहते हैं.

आधुनिक काल में 19वीं सदी में बिहार में बड़े पैमाने पर ईसाई लोगों ने प्रवेश किया. इन लोगों ने विशेष रूप से प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में प्रवेश किया. ईसाई धर्म के प्रचारक हेतु अधिक संगठित और सुनियोजित ढंग से काम 1846 के बाद आरंभ हुआ, हार्टमैंन नामक पादरी को इस काम के लिए पटना में पद स्थापित किया गया.

पटना के साथ-साथ बेतिया, मुंगेर, भागलपुर और पूर्णिया में ऐसे प्रयास शीघ्र ही आरंभ हुए. कालांतर में इन गतिविधियों का प्रसार छोटानागपुर के आदिवासी क्षेत्रों में हुआ, ऐसे प्रयासों की काफी सफलता मिली. स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं में इन संगठनों की स्वैच्छिक सेवाएं प्रशंसनीय रही है.

बिहार में धर्म एवं समाज सुधार आंदोलन

19वीं शताब्दी के धर्म एवं समाज सुधार आंदोलन का बिहार पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा. हिंदू समाज में नवजागरण लाने में ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसायटी आदि का योगदान महत्वपूर्ण रहा है.

ब्रह्म समाज

भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत तथा ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय का बिहार से संबंध रहा था. उन्होंने पटना में रहकर उर्दू एवं फारसी की तालीम हासिल की थी इंडिया कंपनी की नौकरी रामगढ़ से आरंभ की थी.

उनके सहयोगियों में केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से पटना और गया में ब्रहा समाज की शाखाएं स्थापित की गई. डॉ. कृष्ण नंदन घोष द्वारा भागलपुर में 18 सीट में ब्रहा समाज की शाखा स्थापित की गई बिहार में यह पहली शाखा थी, परंतु शीघ्र ही पटना, मुंगेर, जबलपुर नगरों में भी इसकी शाखाएं खुली.

हिंदू धर्म को अंधविश्वास से मुक्त कराने और नैतिक आचरण एवं एकेश्वरवादी, विश्वास पर बल देने में इस आंदोलन का मुख्य योगदान रहा है. समाज सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रगति लाने में इसकी भूमिका रही है. बिहार में इसके प्रमुख नेताओं में गुरु प्रसाद सेन, जैन प्रकाश चंद्र राय, हरिसुंदर बोस, शिवचंद्र बनर्जी, डी. एन. सेन, रजनीकांत गुहा, बजरंग बिहारी लाल, निवारण तंत्र मुखर्जी और कामिनी देवी के नाम शामिल है.

आर्य समाज

आर्य समाज की स्थापना के तुरंत बाद इसके संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने बिहार की यात्रा की थी. सबसे पहले बक्सर आये. उसके बाद डुमराव एवं आरा पहुंचे. डुमराव में वे हरवंस सहाय एवं जय प्रकाश लाल के घर रुके. इसके बाद पटना, मुंगेर, भागलपूर, और छपरा उनकी यात्रा क्रम में शामिल हुए.

पटना में पंडित रामजीवन भट्ट के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ. तत्पश्चात मुंगेर, भागलपुर, छपरा होते हुए मुंबई चले गए. परंतु भोलानाथ जी एवं माखनलाल के आग्रह पर उन्होंने दूसरी बार दानापुर की यात्रा 30 अक्टूबर, 1869 को कि. बिहार में पहला आर्य समाज मंदिर 1885 में दानपुर में स्थापित हुआ. आरा, पटना, सिवान, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, रांची (अब झारखंड में) और भागलपुर आदि नगरों में इसकी शाखाएं स्थापित हुई.

शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में इस आंदोलन का प्रमुख योगदान रहा. जाति-प्रथा और अनावश्यक कर्मकांड का विरोध करने के साथ महिलाओं के उदार और शिक्षा के विकास पर इस आंदोलन ने विशेष ध्यान दिया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने राष्ट्रीय चेतना को पल्लवित करने और स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए युवकों को प्रेरित किया.

आर्य समाज के प्रमुख बिहारी नेताओं में बाल कृष्ण सहाय, पंडित अयोध्या प्रसाद, डॉ केशव शास्त्री, भवानी दयाल सन्यासी, राजगुरु धीरेंद्र शास्त्री, पंडित वेदव्रत, पंडित राम रक्षा, रामानंद साह आदि के नाम उल्लेखनीय है. आर्य समाज द्वारा शुद्धि आंदोलन चलाया गया तथा गौ रक्षा समिति आदि का गठन एवं प्रसार किया गया.

रामाकृष्ण मिशन

रामकृष्ण परमहंस ने सिर्फ एक बार 1808 में बिहार की यात्रा की और देवघर पधारे. इसके बाद स्वामी विवेकानंद द्वारा अप्रैल, 1886 में गया, 1890 में भागलपुर एवं देवघर और 1902 बोधगया, बिहार की यात्राएं की गई. बिहार में रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे- रख्ता राम एवं मथुरा प्रसाद . रख्ता राम कुछ समय तक दक्षिणेश्वर के मंदिर में भी रहे.

1920 में पहली बार रामाकृष्ण मिशन की शाखा बिहार में जमशेदपुर (अब झारखंड में) स्थापित हुई. पटना एवं देवघर (झारखंड) में इसकी शाखा 1922 में खुली. अध्यात्म और शिक्षा के प्रसार में इस संस्था का महत्वपूर्ण योगदान रहा. बिहार में इसके प्रमुख नेताओं में जितेंद्र नाथ मुखर्जी और डॉक्टर राजेश्वर ओझा के नाम उल्लेखनीय है.

थियोसोफिकल सोसायटी

थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक कर्नल ओलकोंट ने सर्वप्रथम 1883 में और एनी बेसेंट के साथ 20 जनवरी, 1894 को बिहार की यात्रा की थी. उस समय पटना में यह आंदोलन ऑलवेज हो रहा था.

1904 ई. तक इसकी शाखाएं भागलपुर, गया, आरा, बांकीपुर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, छपरा, पूर्णिया, सीतामढ़ी, और देवघर आदि में संगठित हो चुकी थी. बिहार में इसके प्रमुख नेता मधुसूदन प्रसाद, रामाश्रय प्रसाद, बैजनाथ सिंह, परमेश्वर दयाल, रघुवीर प्रसाद, सरफराज हुसैन और नारायण सिन्हा आदि थे. पेशे से वकील श्री सिन्हा 1919 ई. से 1923 ई. तक थियोसोफिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के महासचिव भी रहे.

इस संस्था ने धार्मिक समन्वय ,संप्रदायिक भाईचारे और अध्यात्म के विकास में योगदान दिया है. होमरूल आंदोलन के माध्यम से श्रीमती एनी बेसेंट ने स्वतंत्रता संग्राम को भी नई प्रेरणा प्रदान की इसका प्रभाव देश में है और बिहार में भी महसूस हुआ है.

मुसलमानों में धर्म एवं समाज सुधार

आधुनिक बिहार में मुस्लिम समाज में शिक्षा के प्रसार हेतु 1872 ई. में मुजफ्फरपुर में बिहार साइंटिफिक सोसाइटी की स्थापना मौलवी इमदाद अली खान द्वारा की गई. 1873 में गया और पटना में इसकी शाखाएं खोली. उन दिनों बिहार के मुसलमानों में धर्म और समाज सुधार के प्रयास का मुख्य केंद्र पटना था. 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वहाबियों के माध्यम से यह प्रयास प्रारंभ हुए.

उन्होंने इस्लाम धर्म के मूल उपदेशों पर आचरण का आह्वान किया और धर्म में बिदत अथवा विकार का विरोध किया. इस उद्देश्य से उन्होंने शैक्षिक संस्थाएं संगठित की, जहां पारंपरिक इस्लामी शिक्षा प्रदान की जाती थी. ऐसी संस्थाओं में सबसे पहले पटना का मदरसा इस्लाहुल मौलाना अब्दुल रहीम द्वारा स्थापित किया गया.

1891 ईसवी में पटना में खुदाबख्श लाइब्रेरी की स्थापना हुई.स्वतंत्रता आंदोलन के क्रम में बिहारी मुसलमानों में भी राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई. 1917 में मौलाना मोहम्मद सज्जाद ने बिहार में जमीतूल- उलेमाए- हिंद की शाखा संगठित की.

खिलाफत और असहयोग आंदोलन 1921 में बिहार के मुसलमानों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था इमारतें-शरिया स्थापित हुई. इसके संस्थापक भी मौलाना मोहम्मद सज्जाद थे और इसका मुख्यालय पटना के निकट है फुलवरीशरीफ है में स्थित था.इसके द्वारा मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और सामाजिक कार्यों को संचालित करने और सुनियोजित करने के प्रयास किए गए.

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