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झारखंड की जनजातियों से जुडी जानकारी


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झारखंड जनजातियों की दृष्टि से भारत का प्रमुख राज्य है. यहां 30 प्रकार की अनुसूचित जनजातियां हैं. करीबन 94% जनजातियां आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है और सिर्फ 6% आबादी शहरों में रहती है. अनुसूचित जनजातियों को दो श्रेणियों में रखा गया है प्रमुख जनजाति और आदिम जाति. झारखंड में 22 जनजातियां प्रमुख जनजाति की श्रेणी में आती है. बाकी आठ यानी बिरहोर, कोरबा, असुर, बिरजिया, सौरिया पहाड़िया, माल पहाड़ियों और स्वर को आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा जाता है। आदिम जाति अल्पसंख्यक है। उनकी अर्थव्यवस्था कमोबेश आज भी प्राथमिक स्तर की है। वे आज भी जंगल में शिकार करने और जंगल में भोजन जुटाने के आदिम संस्कारों से लैस है। हालांकि अब उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं रहा है। उनमें भी अब आजीविका के लिए एक जगह स्थाई तौर पर टिकने में समझ पैदा हो रही है।

भाषा की दृष्टि से जनजातियों के दो समूह है। ग्रियर्सन ने झारखंड क्षेत्र की जनजातीय भाषाओं को आस्ट्रिक (मुंडा) और द्रविडियन समूहों में बांटा है। अधिक संख्या जनजातीय भाषाएं आस्ट्रिक समूह में आती है। सिर्फ उंराव जनजाति की कुरुख भाषा और व्यापारियों की मोटा बरसात द्रविड़ समूह की मानी जाती है। शरद चंद्र राय के अनुसार छोटा नागपुर में बसी सभी ऑस्ट्रिक भाषा ही समूहों की जनजातियों का भारत के उत्तरी भाग से ऐतिहासिक संबंध है। द्रविड़ भाषाई समूह के माने जाने वाले उरांव और शौर्य पहाड़ियों लोगों के बारे में अनुमान है कि वह सबसे पहले दक्षिण में चले थे। संभवत नर्मदा के क्षेत्र से वे पहले रोहतास में और बाद में छोटानागपुर और संथाल परगना में बसे।

प्रजातिय अध्ययन के अनुसार झारखंड क्षेत्र की जनजातियां प्रोटो ऑस्ट्रोलायड प्रजाति की मानी जाती है। यहां की लगभग सभी जनजाति है उन्हें नाटा कद, दीर्ध कपल, पहली चिपटी नाक, काला चमड़ा सामान्य शारीरिक लक्षण है। प्रजाति अध्ययन के अनुसार कपाल, मुख्य आकृति, बाल और चमड़े का रंग में झारखंड की जनजाति, श्रीलंका की वेडडा जनजाति और ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी काफी हद तक मिलते जुलते हैं। इस आधार पर झारखंड की जनजातीय आबादी की प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड्स प्रजाति की संज्ञा दी गई है।

झारखंड में जनजातीय मुख्यतः छोटा नागपुर का पठार तथा राजमहल की पहाड़ी क्षेत्र के रांची, हजारीबाग, गिरिडीह, पलामू, धनबाद, सिंहभूम, संथाल परगना आदि जिलों में निवास करती है। सर्वाधिक जनजातियां रांची, संथाल परगना और सिंहभूम जिलों में पाई जाती है। प्रस्तुत है कुछ प्रमुख जनजातियों के बारे में जानकारी-

संथाल

  • संथाल भारत की एक महत्वपूर्ण जनजाति है। संथालों की संख्या सर्वाधिक है। संथाल संथाली भाषा बोलते हैं, जिनकी अपनी ओलचिकि लिपि है, संथाल जनजाति का विकास क्षेत्र मुख्यत है झारखंड के संथाल प्रगान में है। इसके अतिरिक्त यह रांची, सिंहभूम, हजारीबाग, धनबाद आदि जिलों में भी पाए जाते हैं। इनके निवास स्थान को राज महल पहाड़ियों में दामिन-ए-कोह कहते हैं।
  • संथाल ऑस्ट्रोलायड और द्रविड़ प्रजाति के होते हैं। इनकी त्वचा का रंग हल्का भूरा और काला, बाल अधिक तथा सीधे, नाक लंबी तथा उठी हुई, मुहा फैला या चोड़ा, ओठ पतले परंतु उभरे हुए तथा कद छोटा होता है।
  • संथाल जनजाति के लोग वस्त्रों का कम प्रयोग करते हैं। पुरुष केवल घुटनों के ऊपर जघाव तक धोती बांधते हैं और स्त्रियाँ केवल धोती ही पहनती है। जो घुटनों तक होती है। वक्ष स्थल पर कोई कपड़ा नहीं होता, केवल आँचल लपेट होती है। विशेष उत्सवों शादी विवाह के समय पुरुष कुर्ता तथा पगड़ी का प्रयोग करते हैं।
  • संथाल जनजाति का मुख्य भोजन चावल है। जंगलों से कंदमूल फल एकत्रित कर उन्हें बड़े चाव से खाते हैं। यह लोग शिकार भी करते हैं और भोजन में मांस का प्रयोग भी करते हैं।
  • संथाल जनजाति मुंडा भाषा बोलती है। इस जनजाति के लोग प्रकृति पूजक है, जो प्रेतों में भी विश्वास करते हैं। ये लोग आदिकाल से देवी-देवताओं पर विश्वास करते आ रहे हैं और बड़े अंधविश्वासी होते हैं।
  • इस जाति का मुख्य व्यवसाय आखेट है। ये जंगली जानवरों का शिकार कर मास खाते हैं, अधिकार संथाल कृषि द्वारा जीविकोपार्जन करते हैं। संथाल धान की कृषि करते हैं। इसके अतिरिक्त ज्वार, बाजरा, मोटा अनाज, साग सब्जियां और फल फूल भी पैदा कर लेते हैं। आजकल संथाल चाय और बागानों और खानों में मजदूरी करते हैं।
  • संथाल जनजाति उत्सव प्रिय है। यह बाह्रा सोहरई और सकरात नामक पर्व मनाते हैं। बाह्रा पर्व मार्च के महीने में होता है। इस दिन विशेष विधि से देवताओं की पूजा की जाती है और बलि चढ़ाई जाती है। अंत में सभी लोग खाते पीते और नाच गाना करते हैं। सोहरही पर्व अक्टूबर माह में मनाया जाता है। इस पर्व के दिन सभी संथाल अपने-अपने घरों से भोजन और चावल की शराब एकत्रित करते हैं। देर रात्रि तक खाना-पीना और नाच गाना होता है। सकरात पर्व फरवरी माह में मनाया जाता है। इस दिन यह प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं।
  • संथाल एक ही गोत्र में विवाह संबंध नहीं करते हैं.

कोरबा

  • कोरवा जनजाति झारखंड के पलामू जिले में मुख्य रूप से पाई जाती। यह इस जिले के बांकों थाने में सर्वाधिक संख्या में निवास करते हैं । यह जनजाति कोलेरियन जनजाति से संबंधित है और मुंडा और संस्थानों के समान जीवन निर्वाह करती है।  पहाड़ी कोरबा पहाड़ों पर छुटपुट संख्या में फैले हैं और दिहारीया कोरबा संमतल मैदानों में निवास करते हैं।
  • पहाड़ी कोरबा जिन्हें बैनवरिया भी कहते हैं। मुख्यतः जंगली कंदमूल एवं शिकार पर निर्भर करते हैं और दिहारीया कोरबा कृषि कार्य करते हैं। इन्हें किसान अथवा किसान गोरबा भी कहते हैं। इनका प्रमुख त्यौहार करमा है।
  • अन्य जनजातियों की भांति कोरबा भी अपनी जाति में ही विवाह करते हैं। विवाह कन्या का मूल्य चुका कर ही संपन्न होता है। विधवा विवाह भी इन में प्रचलित है। इनमें तलाक प्रथा का भी प्रचलन है। कोरवा जनजाति की अपनी पंचायत होती है जिसे मैयारी कहते हैं। बड़े बूढ़े एवं बुद्धिमान लोग कोरबा पंचायत के सदस्य होते हैं। यह लोग भगवान सूर्य और चंडी देवी के अतिरिक्त पितृ पूजा भी करते हैं। इनका मुख्य त्यौहार करमा है।इसके अलावा ये सर्प को पूजा भी करते है.

उंराव

  • झारखंड की यह प्रमुख जनजाति है। उरांव प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड्स प्रजाति की जनजाति है। यह कुरुख भाषा बोलते हैं, जो मुंडा भाषा से मिलती जुलती है।
  • उरांव जनजाति छोटा नागपुर के पठार में संथाल परगना जिले में निवास करती है।
  • उरांव जनजाति के लोग साधारणतया पठार के लहरदार प्रदेशों में हल से खेती करते हैं। कुछ उरांव शिकारी और मछली मारने का व्यवसाय भी करते हैं।
  • उरांव जनजाति के लोग स्थायी गांवों में निवास करते हैं। इनके गांव में 50 से 100 परिवार तक रहते हैं। यह पितृ वंशी जान जाती है और कुछ गांव के बाहर ही विवाह करते हैं। प्रत्येक गांव के दो मुखिया होते हैं- लौकीक, धार्मिक. मुखिया का पद अनुवांशिक होता है। परंपरागत प्रत्येक दिन जाति में एक क्षेत्रीय राजनीति के अधिकारी होता है, जो एक गांव के बीच अथवा एक दूसरे गांव के बीच के झगड़ों का निपटारा करता है। धार्मिक तथा सामाजिक कार्य गांव स्तर पर ही संपादित होते हैं। प्रत्येक गांव में नृत्य के लिए पारिवारिक मिलन हेतु एक स्थान होता है। प्रत्येक गांव में एक धार्मिक स्थान कब्रगाह तथा सयानागार होता है।

असुर

  • असुर जनजाति छोटा नागपुर के पठार के सिंहभूम जिले की प्रमुख जनजाति है। डॉक्टर गुहा के अनुसार यह जनजाति प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड्स प्रजाति की है। यह मुंडा वर्ग की मालेट भाषा बोलते हैं।
  • यह जनजाति परंपरागत रुप से लोहा गलाने का कार्य करती है। छोटा नागपुर की जनजातियां में इसका लोहा गलाने और उनसे विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाने की में एकाधिकार रहा है। कच्चा लोहा तो इन्हें अपने निवास क्षेत्र की पहाड़ियों से प्राप्त हो जाता है और कोयला समीपवर्ती जंगलों की लकड़ियों से मिल जाता है। इस प्रकार उन्होंने लोहा गलाने की साधारण विधि का विकास किया था. लेकिन गत कई दशकों से यह अपने प्राचीन पैसे को छोड़ चुके हैं क्योंकि इसमें आर्थिक व प्रशासनिक अनेक कठिनाइयां थी। वर्तमान में ये शिकार, खाद्य पदार्थ एकत्रित कर और मछली मार कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। कुछ असुर कृषि कार्य भी करते हैं।
  • असुर जनजाति के लोग छोटे छोटे गांवों में निवास करते हैं। अब वे अपने रीति रिवाज और पर्व व त्योहारों को बड़े पैमाने पर नहीं मानते हैं, क्योंकि बड़ी मुश्किल से यह अपना पेट भर पाते हैं। गांव का तथा परिवारी के संगठन ढीला है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह अपना विवाह नहीं करते हैं, क्योंकि पत्नी रखने हेतु उसका भरण पोषण करने का खर्चा जुटा नहीं पाते हैं। ऐसे लोगों को गांव वाले कुंवारा ही मानते हैं।

सौरिया पहाड़िया

  • सौरिया पहाड़िया जनजाति झारखंड में राजमहल की पहाड़ियों की चोटियों पर संथाल परगना जिले के अंतर्गत राजमहल, पाकुर तथा गोंडा अनुमंडल में निवास करती है। इसके गांव समुद्र तल से 450 मीटर से 600 मीटर तक की ऊंचाई पर स्थित होते हैं। सहारिया प्रदेश की जलवायु समशीतोष्ण प्रकार की होती है।
  • सौरिया पहाड़ियों के गांव लहरदार पहाड़ों की चोटियों पर अवस्थित होते हैं। जंगलों से भरे पहाड़ी ढालों पर यह जनजाति कृषि कार्य अपना जीवन निर्वाह करती है। यह कृषि में मिट्ठा और धानी  प्रकार की विधियों का प्रयोग करते हैं।
  • मिट्ठा कृषि और धानी कृषि में अधिक मजदूरों की आवश्यकता होती है। सौरिया परिवार के सभी सदस्य (पति पत्नी व बच्चे) मिलकर मुकुल झाड़ियों से खेत में सुराख कर बीज बो देते हैं। यह लोग खेत पर एक चबूतरा तथा झोपड़ी बनाकर खेत की देखभाल करते हैं। अधिकार गांव के लोग गांव छोड़कर खेतों पर ही रहने चले जाते हैं। फसल तैयार होने पर खेत में यह भूतों की बलि देते हैं और पूजा करते हैं फिर फसल काटना प्रारंभ करते हैं।
  • सौरिया गांव छोटे छोटे व बिखरे होते हैं। प्रत्येक गांव में 10 से लेकर 25 परिवार रहते हैं। प्रत्येक गांव में एक लौकिक मुखिया होता है जिसे महतो कहते हैं। यह महतो (मुखिया) गांव वालों से जमीन का लगान वसूल करता है। सौरिया जनजाति में कोई सताई धार्मिक मुखिया नहीं होता है। इस जनजाति में न गोत्र संगठन है और न वे ग्राम बहिव्रिवाह की पद्धति ही व्यवहार करते हैं। यह लोग विवाह संबंधों में 3 पुस्त की दूरी पर विचार करते हैं।
  • सौरिया लोग सीधी प्रकृति के होते हैं। सबसे बड़ा पुत्र पिता के मृत्यु के बाद उसकी जायदाद का अधिकारी होता है। वैवाहिक संबंध विच्छेद तथा पूण विवाह की प्रथा इस जनजाति में बहुत पाई जाती है।
  • सौरिया हिंदुओं की प्रथाएं जैसे- जनेऊ धारण करना, एक ही देवता की पूजा करना, शाकाहारी भोजन आदि अन्य चीजे प्रचलित है।

पहाड़ी खड़िया

  • पहाड़ी खड़िया जनजाति सिंहभूम जिले की पहाड़ियों पर निवास करती है। इसकी एक शाखा समतल मैदानों में रहकर कृषि कार्य करती है। पहाड़ी मुखिया जंगलों से खाद्य पदार्थ एकत्रित करते और बागवानी का खेती का जीवन निर्वाह करते हैं।
  • पहाड़ खडिया पहाड़ से भरे पहाड़ी ढालो पर बागवानी और पहाड़ी खेती करते हैं।
  • खड़िया गांव छोटे छोटे व बिखरे होते हैं। जो वंश परंपरा के आधार पर बनता है। यह धार्मिक विधी संस्कारों को छोड़कर गांव के प्रत्येक कार्य में मुखिया होता है। गांव का मुखिया गांव के लोगों की आपसी झगड़ों का भी निपटारा करता है।

खरवार

  • खरवार जनजाति का मूल क्षेत्र झारखंड का पलामू जिला और 18 हजारी क्षेत्र है। 11 व 12 शताब्दी में खरवार जाति अपने पूर्ण वैभव को प्राप्त थी।
  • खरवार जनजाति वीर एवं लड़ाकू होती है। यह अपने आन मान व सम्मान के लिए मर मिटने को सदैव तैयार रहती है। सत्य बोलने और सत्य के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देना खरवार का असाधारण गुण है। अनुशासन तथा ईमानदारी के साथ साथ इनमें बड़ी एकता है। इनकी उप जातियों में सूर्यवंशी, पट बंदी, दोसल्त बंदी खेरी, मौगति, गोजु मर्झीया आदि।
  • यह शरीर में बलवान व ब्लीस्ठ होते हैं। इनकी स्त्रियां भी पुरुषों की भांति हिम्मत एवं बहादुर होती है।
  • खरवार जाति के लोग साधारणतया टेहुन (घुटना), तक धोती, बड़ी, सिर पर पगड़ी पहनते हैं। इनकी स्त्रियां साड़ी पहनती है। इसकी आभूषणों में हैंकल, बाजूबंद, हंसुली, वखा, कूड़ा नथीनी, गुरीया या मूगो की माला आदि मुख्य है।
  • यह जनजाति कच्ची मिट्टी और फूस के मकानों में रहती है। ग्रामीण और नगरों के निकट रहने वाले परिवारों में रहन सहन, खान पान, पहनावा आदि में भिन्नता पाई जाती है।
  • यह मांसाहारी और शाकाहारी दोनों तरह का भोजन करते हैं। यह उत्सवों में मांस व मदिरापान करते हैं।
  • यह लोग जंगलों पर आश्रित थे, पर अब यह सहारा भी खत्म हो गया है। क्योंकि पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने के लिए सरकार ने इन्हें जंगलों से दांतुन, पत्ती, लकड़ी काटने की पाबंदी लगा दी है। इनके पास न तो कृषि हेतु भूमि है और ना ही कोई उद्योग धंधा, इसीलिए इन्हें मजबूर होकर भिक्षाटन के लिए निकलना पड़ता है। कुछ स्थानों पर यह बंधुआ मजदूरों का जीवन भी व्यतीत करते हैं।
  • सरकार इनकी आर्थिक स्तर को सुधारने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।

जनजातीय

नाम क्षेत्र नाम क्षेत्र
संथाल संथाल परगना बेदिया सिंहभूम
उमराव संथाल परगना पलामू चेरो पलामू
मुंडा रांची सिंहभूम चिक बड़ाईक रांची
हो पलामू सिंहभूम कोरा संथाल परगना
भूमिज रांची सिंहभूम परएचईया पलामू
खड़िया सिंहभूम किसान पलामू
सौरिया राज महल माल पहाड़िया संथाल परगना
बिरहोर संथाल परगना हिल खेचरा छोटा नागपुर
असुर सिंहभूम बंजारा संथाल परगना
खरवार पलामू बथुड़ी सिंहभूम
कोरबा पलामू बिरजिया गुमला
गोंड सिंहभूम करमाली हजारीबाग
महली रांची बिझीया संथाल परगना

मुंडा

  • मुंडा जनजाति झारखंड के छोटा नागपुर के पठार में निवास करती है। यह जनजाति कई विभागों में बंटी है। यह बहीर्विवाही गोत्र कहलाते हैं, जो मुंडा जनजाति में हो याकीली के नाम से पुकारे जाते हैं। मुंडा, महली, मुंडाया या पातर तथा कंम्पट मुंडा शाखाओं में विभक्त है। मुंडा गांव में प्रथम वास करने वालों को दूसरों की तुलना में कुछ विशेष सुविधाएं मिली होती है।
  • यह जनजाति सिंगवोगा (सूर्य देवता) को देवता के रूप में पूजा करते हैं। यह कोलेरीयन प्रजाति के होते हैं इनके प्रमुख पर्व – कर्मा धर्मा, मांघ परब एवं सरहुल है।

माल पहाड़िया

  • माल पहाड़िया की भाषा मालतो है, जो द्रविड़ परिवार की मानी जाती है। माल पहाड़िया समाज में कन्या का मूल्य देकर विवाह करने की प्रथा है.

बिरजीया

  • बिरजीया 2 शब्दों बिर और जिया के योग से बना है। शाब्दिक दृष्टिकोण से बिर शब्द का अर्थ मुंडारी और बिरजीया जनजाति का पेशा तथा पर्व त्यौहार असुर जनजाति से काफी मिलता-जुलता है।

हो

  • यह जनजाति धनबाद जिले में सरदार के नाम से पुकारी जाती है। इनकी भाषा मुंडारी है, जिस पर सदानी और बंगाली का प्रभाव स्पष्ट झलकता है।

करमाली

  • यह मूलत रांची और हजारीबाग जिले में है। वह सदानी भाषा बोलते हैं।

वीरहोर

  • खाद संग्रह और शिकार पर निर्भर रहने वाली जनजातियों में बिरहोर की गणना आर्थिक रूप से सर्वाधिक पिछड़े वर्ग में की जाती है। यह घुमक्कड़ किस्म के होते हैं। इसके निवास स्थल को सम्मानित टांडा कहा जाता है।

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