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झारखंड में उद्योग धंधों से जुड़ी जानकारी


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झारखंड के प्रमुख उद्योग खनिज उत्पादक पर आधारित हैं क्योंकि राज्य में खनिज पदार्थों की प्राप्ति से उद्योगों की स्थापना हेतु व्यापक क्षेत्र है. टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी और टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी जमशेदपुर, सिंदरी खाद कारखाना, भारी मशीन उपकरण कारखाना रांची, यहां के मुख्य उद्योग है. खनिज उत्पादन की दृष्टि से झारखंड देश का अग्रणी राज्य है. अंत: यहां खनिजों पर आधारित अनेक उद्योग धंधों का विकास हुआ है.

यहां उत्पादित किए जाने वाले खनिज पदार्थों में लौह अयस्क कोयला, मेंगनीज, चूना पत्थर, डोलोमाइट आदि प्रमुख है. इसी के इस्पात उद्योग के लिए ठोस आधार प्रस्तुत करता है. इसी के फलस्वरूप यहां टाटा लोहा इस्पात कंपनी तथा बोकारो इस्पात कारखाने स्थापित किए जा सके हैं.

यहां तांबा, अभ्रक, एस्बेस्टस, बॉक्साइट, गधक, यूरेनियम, जस्ता, टीन, आदि खनिज उत्पादित किए जाते हैं जिनके फलस्वरूप यहां तांबा उद्योग विद्युत यंत्र उद्योग एल्युमिनियम उद्योग आदि अनेक उद्योगों की स्थापना संभव हो सकी है.

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लौह इस्पात उद्योग

देश में आधुनिक पद्धति से लोहा इस्पात तैयार करने का सर्वप्रथम प्रयास से झरिया के निकट सन 1779 में मोटले फरफुहार तथा जोशीया हीथ द्वारा किया गया है। परंतु इसमें सफलता नहीं मिली सकी भारतीय लोहा इस्पात के इतिहास में 1960 का वर्ष विशेष उल्लेखनीय कहा जा सकता है, क्योंकि इसी वर्ष से शाही उद्योगपति जमशेदजी द्वारा साक्षी नामक स्थान पर टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की शुरुआत की गई-

टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी

यह कारखाना 1910 में बनकर पूरा हो गया लेकिन यहां उत्पादन का काम 1911 से प्रारंभ हुआ। इसे टिस्को अर्थात टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी कहते हैं। यह जमशेदपुर में है। इसको की उत्पादन क्षमता 20 लाख टन है। जिसे बढ़ाकर 40 लाख टन किए जाने का प्रस्ताव है। इस कारखाने में सलाखें, गार्डर, रेलवे की धुरी, पट्टरियां, पहिए, चादरें, स्लीपर आदि बनाए जाते हैं।

यह कारखाना झारखंड राज्य के सिंहभूम जिले में कोलकाता नागपुर रेल मार्ग पर कोलकाता से 240 किमी उत्तर प्रदेश में कई और स्वर्णरेखा नदियों के संगम पर स्थित है। यह देश में निजी क्षेत्र का महत्वपूर्ण कारखाना है। इसी 1960 में जमशेदजी टाटा ने साक्षी नामक स्थान पर स्थापित किया था। इसी स्थान का वर्तमान नाम जमशेदपुर है।

इस कारखाने को कच्चे लोहे की प्राप्ति इसके दक्षिण में 75 किमी दूर स्थित सिंहभूम जिले के मयूरभंज में गुरमहीशानी की खानों तथा दक्षिण पश्चिम में लगभग 110 किमी दूर स्थित सिंहभूम जिले की नोआमड़ी कि खानों से होती है। कुछ लौह अयस्क बादाम पहाड़ व सुलेपट से भी मंगाया जाता है।

  • यहां से 200 किमी दूर स्थित रानीगंज झरिया की खानों से कोयला प्राप्त कर लिया जाता है।
  • इस कारखाने को डोलोमाइट 400 किमी दूर स्थित एक पान पोश बीरमित्रपुर, हाथीवारी, बिसरा कटनी आदि क्षेत्रों से प्राप्त कर लिया जाता है।
  • इस कारखाने को मैंगनीज की प्राप्ति उड़ीसा के गंगापुर क्षेत्र में मध्य प्रदेश से क्रोमाइट की प्राप्ति झारखंड के क्षेत्रों से, टंग्स्टन प्राप्ति मीदनापुर तथा जोधपुर से होती है।
  • इस कारखाने को जल की आपूर्ति स्वर्ण रेखा नदी सी होती है।
  • इस कारखाने की भट्टियों के आंतरिक भाग की लिपाई हेतु चिकनी मिट्टी यहां से 10 किलोमीटर दूर काली माटी नदी से उपलब्ध होती है।
  • इस कारखाने को झारखंड उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल से सस्ते श्रमिक मिल जाते हैं।
  • यह कारखाना सड़क और रेल मार्गों द्वारा देश के अनेक भागों से जुड़ा है। अंतः विस्तृत बाजार होने के कारण माल की मांग बनी रहती है। कोलकाता बंदरगाह से विदेशों को लोहा इस्पात निर्यात करने की सुविधा रहती है।
  • इस कारखाने के निकट अनेक स्थानों पर इंजीनियरिंग उद्योग स्थित है जिन्हें यहां के लोगों की निरंतर मांग बनी रहती है।

बोकारो इस्पात कारखाना

देश में लोहे की निरंतर मांग बढ़ती जाने के कारण झारखंड राज्य में पूर्व सोवियत संघ के सहयोग से कारखाना स्थापित करने का निर्णय लिया गया। बोकारो स्टील लिमिटेड की स्थापना 1967 ईसवी में की गई। 1972 ईसवी में इस कारखाने की प्रथम भट्टी ने कार्य करना प्रारंभ कर दिया। आधुनिक प्रावधान प्रणाली पर आधारित यह विश्व का विशाल एवं परिष्कृत कारखाना है जिसकी विशालकाय धमन भट्टी सर्वाधिक ऊंची कोक ओवन भट्टियों तथा विशाल स्ट्रिंग प्लांट विश्व भर में अद्वितीय है।  इस कारखाने के निर्माण में लगभग 900 करोड रुपए व्यय होने का अनुमान है। बोकारो इस्पात कारखाने को अनेक सुविधाएं उपलब्ध है जिनके कारण वह निरंतर विकसित होता जा रहा है।

  • यह कारखाना बोकारो कोयला क्षेत्र में झरिया कोयला क्षेत्र के निकट स्थित होने के कारण ही यहाँ कोयला संस्ता एवं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है।
  • इस कारखाने के लौह अयस्क की आपूर्ति क्योंझर की खान से की हो जाती है।
  • चूना पत्थर की आपूर्ति इसे मध्य प्रदेश की खानों से होती है।
  • दामोदर परियोजना के क्षेत्र में स्थित होने के कारण इस कारखाने को सस्ती जल विद्युत की आपूर्ति सुलभ है।
  • दामोदर एवं बोकारो नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण इस कारखाने को प्रचुर मात्रा में जल की आपूर्ति हो जाती है।
  • इस कारखाने के निकट अनेक औद्योगिक संस्थान स्थित है। अंतः कारखाने से लोहे की मांग बनी रहने के कारण उत्पादन में निरंतर वृद्धि की जा रही है।
  • इस कारखाने को झारखंड मध्य प्रदेश पश्चिम बंगाल से सस्ते श्रमिक मिल जाते हैं।
  • इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 40 लाख टन इस्पात पिंड है। इस कारखाने में छड़े, गर्डर, फिश प्लेटें, चादरें, एंगल पाइप आदि बनाने हेतु एशिया की सबसे बड़ी धमन भट्टी सबसे ऊंची कोक ओवन बैट्रीया एवं सबसे बड़ा सीटरिंग प्लांट लगाया गया है।

एलुमिनियम उधोग

झारखंड राज्य में एल्युमिनियम उद्योग बॉक्साइट की अनेक खाने हैं. इनमें रांची और पलामू जिले में पाटन क्षेत्र में बॉक्साइट के अपार भंडार हैं। रांची लोहरदगा के निकट और पलामू जिले में नेतरहाट पठारी क्षेत्र में बॉक्साइट निकाला जाता है।

इस बॉक्साइट पर निर्भर करते हुए 1938 ईसवी में भारत सरकार ने भारतीय एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड की स्थापना स्वर्णरेखा घाटी के मूरी नामक स्थान पर की गई है। इस कंपनी ने 1959 ईसवी में हीराकुंड में एल्युमिनियम देश के विभिन्न भागों में भेजा जाता है इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 1,60,000 टन है।

इस कारखाने को पर्याप्त मात्रा में रांची और पलामू की कानों से बॉक्साइट समीप के जल विद्युत केंद्रों से जल विद्युत और निकट के राज्यों से संस्था श्रमिक मिल जाता है। यह कारखाना रेल और सड़क मार्गों द्वारा जुड़ा होने के कारण विनिमय की पूर्ण सुविधा है।

तांबा उद्योग

झारखंड राज्य तांबा उत्पादन की दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य है। यहां से सिंहभूम, हजारीबाग, संथाल परगना आदि जिलों में पर्याप्त तांबा निकाला जाता है। 1924 में इंडियन कोपर ऑपरेशन एक कारखाना घाटशिला में स्थापित किया गया। जो सिंहभूम जिले में स्थित है। तांबा अयस्क शुद्ध करने हेतु राखा में तांबा परियोजना लगाई गई। घाटशिला के निकट मऊ में कंपनी का तांबे के पनीर के शोधन हेतु 1930 ईसवी में स्थापित किया गया है।

इस उद्योग की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत में तांबे के आयात को कम करना है। घाटशिला कारखाने की उत्पादन क्षमता 9600 मीटरी टन है। जिसे बढ़ाकर 16,500 टन प्रतिवर्ष किया जा रहा है।

कोयला शोधक कारखाना

झारखंड के दामोदर घाटी क्षेत्र में कोयले के विशाल भंडार हैं। झारखंड में कोयला शोधक कारखाने कई स्थानों पर स्थापित है। जहां कोयले से राख, अग्निसह मिट्टी, जिप्सम, कैल्साइट, शेल आदि अलग किया जाता है। मुख्य कोयला शोधक केंद्र कर गली, जमादोवा, पश्चिमी बोकारो, लोदना, करणपुर आदि स्थानों पर केंद्रित है।

रेल इंजन बनाने का कारखाना

देश में रेल इंजन बनाने की शुरुआत 19वीं शताब्दी के मध्य चरण में हुई। झारखंड राज्य में 1921 में सिंहभूम जिले में पेनिनसुलर लोकोमोटिव कंपनी की स्थापना की गई थी। इसकी उत्पादन क्षमता 200 इंजन प्रतिवर्ष है। इस कारखाने को सफलता न मिलने के कारण पहले से 1933 ईसवी में ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया और 1945 ईसवी में पुन: कारखाना टाटा कंपनी को बेच दिया गया। इस कारखाने का पुनर्गठन टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव के नाम से प्रारंभ किया गया। इस कंपनी ने प्रतिवर्ष 100 इंजन 100 बायलर निर्माण करने का लक्ष्य रखा था। अभी इस कारखाने में रेल इंजन बनाने का कार्य नहीं हो रहा है। अब यहां रेल के लिए इंजीनियरिंग साज समान तैयार किया जाता है।

मोटर गाड़ी उद्योग

झारखंड राज्य केंद्र जमशेदपुर में स्थिति टाटा के टेल्को नामक कारखाने में ट्रक तैयार किए जाते हैं।

इंजीनियरिंग उद्योग

इस उद्योग के अंतर्गत अनेक कारखाने स्थित है.

भारी इंजीनियरिंग एवं मशीन उद्योग

इस कारखाने की स्थापना 30 दिसंबर, 1998 रांची में की गई थी।  इस की तीन प्रमुख शाखाएं हैं जो रांची में स्थित ही है-

  • भारी उद्योग उपकरण संयंत्र- इसमें भारी मशीनें को इस बात की अन्य उपकरण बनाए जाते हैं।  इसी में 274 प्रकार के कलपुर्जे बनते हैं। इसकी उत्पादन क्षमता 10,000 टन वार्षिक है। इस कारखाने से बोकारो इस्पात कारखाने को आवश्यक मशीनरी उपकरण व मशीनी औजार उपलब्ध कराए जाते हैं।
  • भारी मशीन निर्माण संयंत्र- यह कारखाना पूर्व सोवियत संघ के सहयोग से रांची में स्थापित किया गया है। इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 80,000 मी. टन भारी मशीनों और 25,000 मी. टन इस्पात के ढांचे से तैयार करना।
  • फाउंड्री फ़ोर्ज संयंत्र- इस कारखाने की स्थापना प्रो चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से रांची में की गई थी। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 1,40,000 मी. टन है।

रासायनिक उद्योग

देश के उद्योग विकास में रासायनिक उद्योगों का विशेष स्थान है।  इनमें विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरक, भारी रसायन, औषधीय एवं दवाइयां, पेंट एवं वर्णित और पेट्रो केमिकल्स सम्मिलित है-

भारी रासायनिक उद्योग- भारी रासायनिक उद्योगों में गंधक का अम्ल, सोडा  ऐश और कास्टिक सोडा शामिल है। गंधक का अम्ल सभी अम्लों में महत्वपूर्ण है। इसका उपयोग रासायनिक उर्वरक, उत्तम वस्त्र, प्लास्टिक तथा रंग रोगन बनाने में किया जाता है, गंधक का अम्ल गंधक से बनता है। हमारे देश में इसका उत्पादन कम होता है। अंतः इसी विदेशों से आयात करना पड़ता है।

झारखंड राज्य में सीदरी, जमशेदपुर, और घाटशिला में गंधक का अम्ल बनाया जाता है। सोडा ऐश एक क्षारीय रसायन है, जो सोडियम क्लोराइड तथा चुना पत्थर के मिश्रण से बनता है। इसका प्रयोग कांच, कागज, वस्त्र, साबुन, कास्टिक सोडा, रबड़ तथा फोटोग्राफी का सामान बनाने में प्रयोग किया जाता है। यह झारखंड में टाटा केमिकल्स, जमशेदपुर में तैयार किया जाता है। कास्टिक सोडा भी एक क्षारीय पदार्थ है, जो साबुन, कागज, वस्त्र, रंग-रोगन, रसायन एवं तेल शोधन तथा एल्युमिनियम उद्योग में प्रयोग किया जाता है। झारखंड में इसके दो कारखाने हैं- टाटा केमिकल से टाटानगर और रोहतास इंडस्ट्रियल डालमियानगर।

 रासायनिक उर्वरक उद्योग- भारत में उर्वरक उद्योग के कारखाने तीन क्षेत्रों में विभाजित है। – सर्वजनिक क्षेत्र, सहकारी क्षेत्र, निजी क्षेत्र।

भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में भारतीय उर्वरक निगम की स्थापना की थी। इस निगम ने 1951 में झारखंड के सीनरी नामक स्थान पर एक विशाल रासायनिक उर्वरक कारखाने की स्थापना की थी। इस कारखाने में नाइट्रोजन तथा फास्फेट खाद बनाई जाती है।  यह कारखाना दामोदर नदी के किनारे धनबाद से 24 किलोमीटर दूर स्थित है। 1951 से ही यहां अमोनिया सल्फेट का उत्पादन हो रहा है। विश्व की आधुनिक तकनीक से सुसज्जित यह कारखाना पांच भागों में बंटा हुआ है- पावर प्लांट, गैस प्लांट, अमोनिया प्लांट, सल्फेट प्लांट, कोक प्लांट, दिसंबर 1981 में इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 2,19,000 टन थी। इसके अतिरिक्त यहां डालमियानगर तथा धनबाद में भी उर्वरक कारखाने स्थापित किए गए हैं।

कांच उद्योग

कांच उद्योग देश में प्राचीनतम उद्योगों में से हैं। यहां वैदिक काल में भी कांच की चूड़ियां पहनने का प्रचलन था। आधुनिक भारत में देश के वैज्ञानिक और औषधि विज्ञान के विकास के साथ-साथ कांच उद्योग का महत्व बढ़ता जा रहा है।

इस उद्योग के लिए बालू सीलीका, सोडा ऐश, चुना पत्थर सोडियम सल्फेट, पोटेशियम कार्बोनेट, सुहागा, बोरिक एसिड, सीसा, सुरमा, संखिया, बेरियम, बॉक्साइट आदि पदार्थ कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होते हैं। झारखंड की राजमहल की पहाड़ियों में मंगल घाट तथा पात्र घाट क्षेत्र में तथा निकटवर्ती क्षेत्र में इसका कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है।

झारखण्ड के मुख्य उद्योग

कंपनी का नाम किसकी कंपनी स्थान उद्योग
बोकारो इस्पात लिमिटेड केंद्र सरकार स्टील  बोकारो
डिस्को टाटा समूह स्टील पूर्वी सिंहभूम जमशेदपुर
टिनप्लेट टाटा समूह टीन की चादर वही
एग्रिको टाटा समूह कृषि उपकरण वही
टीआरएफ टाटा समूह औधोगिक मशीन वही
टेल्को टाटा समूह वाहन वही
टाटा टिमकें टाटा समूह रोलर बीयरींगस वही
एशियन केंद्र सरकार कोयला संथाल परगना
सीसीएल केंद्र सरकार कोयला रांची
बीसीसीएल केंद्र सरकार कोयला धनबाद
उषा मार्टिन उषा मार्टिन समूह है स्टील रांची/सिंहभूम
एचइसी केंद्र सरकार भारी मशीन रांची
हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड केंद्र सरकार तांबा पूर्व सिंहभूम
उषा बेल्ट्रॉन उषा मार्टिन समूह केबुल रांची
एसीसी एसीसी समूह सीमेंट धनबाद/पूर्वी सिंहभूम
आईसीआई इंडिया आईसीआई समूह विस्फोटक गोमिया
बिहार स्पंज आयरन मोदी उमेश कुमार स्पाज लोहा पूर्वी सिंहभूम
इंडियन एलुमिनियम निजी (विदेशी)  हाइड्रेट और  एल्यूमिना रांची
हैदराबाद इंडस्ट्रीज बिरला समूह एस्बेस्टस देवघर
इंडो असाइ ग्लास निजी (विदेशी) ग्लास हजारीबाग (देवघर में भी ग्लास कंपनी)
सिंदरी खाद कारखाना केंद्र सरकार उर्वरक धनबाद
इंडियन स्टील एंड वायर निजी स्टील का छड़ पूर्वी सिंहभूम

सीमेंट उद्योग

वर्तमान वैज्ञानिक सभ्यता के युग में सीमेंट का विशेष महत्व है। विभिन्न प्रकार की इमारतों, पूल,बाकी है बांध, नहर, विद्युत आदि परियोजनाओं में सीमेंट का पर्याप्त मात्रा में प्रयोग होता है।  सीमेंट का आविष्कार पोर्टलैंड सीमेंट के रूप में इंग्लैंड (लीडस) यह जोसेफ एमड़ेंन नामक व्यक्ति ने किया था।

सीमेंट के लिए कच्चा माल कोयला चूने का पत्थर चिकनी मिट्टी आदि खनिजों की आवश्यकता है, जो झारखंड में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

झारखंड में सीमेंट के छह कारखाने हैं जो सीनरी, जपला, चाईबासा, कल्याणपुर, (बंजारी) खेलारी और कुमारधुबी में है।

कृषि पर आधारित उद्योग

चीनी उद्योग

चीनी उद्योग भारत का एक महत्वपूर्ण एवं प्राचीन उद्योग है।  यह गन्ने पर आधारित है। झारखंड में इसका पलामू, हजारीबाग, संथाल परगना में उत्पादन होता है।

सूती वस्त्र उद्योग

भारत में यह उद्योग प्राचीनकाल से प्रमुख उद्योग रहा है।  झारखंड राज्य में सूती वस्त्र उद्योग का कोई विशेष स्थान नहीं है। यह उद्योग यहां गिरिडीह, जमशेदपुर, रांची में है।

रेशमी वस्त्र उद्योग

झारखंड राज्य में केवल टसर तथा अंडी रेशम का उत्पादन होता है। टसर रेशम उत्पादन में यह राज्य देश भर में अग्रणी है। रांची, हजारीबाग, दुमका, साहेबगंज, पलामू, धनबाद आदि स्थानों पर टसर रेशम का उत्पादन होता है। डाल्टनगंज, गिरिडीह, रांची, दुमका आदि जगहों पर रेशमी वस्त्रों का उत्पादन होता है।

वन्य पदार्थ पर आधारित उधोग

झारखंड के वनों में विभिन्न प्रकार की लकड़ियां, बांस, सवाई घास और असंख्य जड़ी बूटियां प्राप्त होती है.  इन वन्य पदार्थों में झारखंड में निम्नलिखित उद्योग स्थापित है-

लकड़ी उद्योग

झारखंड के वनों से तथा नेपाल के सीमांत प्रदेश से लकड़ी प्राप्त से झारखंड में लकड़ी चीरने के कारखाने, प्लाईवुड बनाने के कारखाने और फर्नीचर बनाने के कारखाने स्थापित किए गए हैं. झारखंड में लकड़ी चीरने की आरा मशीन स्थापित की गई है.  छोटा नागपुर के वन क्षेत्र में स्थित सिंहभूम जिले में सर्वाधिक लकड़ी चीरने के कारखाने हैं.  इनकी कुल संख्या 60 से अधिक है. इनमें लकड़ियों को काटकर और चीरकर तख्ते या कुंदे बनाने का कार्य होता है.  इसके अलावा रांची, चाईबासा, जुगसलाई, लातेहार हजारीबाग दरिया में लकड़ी के कारखाने केंद्रित है.

प्लाईवुड उद्योग

आधुनिक भवनों में लकड़ी के स्थान पर प्लाईवुड का प्रयोग निरंतर बढ़ता जा रहा है. इसे देखते हुए झारखंड के उद्योगपतियों ने लकड़ी की से प्लाईवुड बनाने के कारखाने स्थापित किए.  झारखंड का चकुलिया नामक स्थान का प्लाईवुड कारखाने प्रख्यात है. रांची में भी एक नया कारखाना स्थापित किया गया है.

कागज और लुग्दी भी उद्योग

झारखंड में वनों से बांस, सवाई घास और मुलायम लकड़ी प्राप्त हो जाती है जिसके आधार पर यहां कागज एवम लुग्धी उद्योग का विकास हुआ है। झारखंड में कागज एवं लुगदी का प्रमुख कारखाना डालमियानगर में सोन नदी के बाएं तट पर स्थापित किया गया है।  इस कारखाने को कोयला व जल विद्युत शक्ति साधन के रूप में प्रचुर मात्रा में प्राप्त हो जाता है। छोटे कारखाने संथाल परगान में स्थित है।

लाख उद्योग

वन पदार्थों पर आधारित उद्योग में लाख उद्योग का प्रमुख स्थान है। लाख कुछ विशेष वृक्षों के कीड़ों से प्राप्त होने वाला नशीला पदार्थ है, जो जमकर ठोस हो जाता है और वह है लाह अथवा लाख कहलाता है।  यह कीड़ा एक वृक्ष पर लाखों की संख्या में होता है। जिन वृक्षों पर यह कीड़ा पाला जाता है उनमें पलास, बैर, कुसुम आदि वृक्षों के नाम उल्लेखनीय है।  पलास वह बैर वृक्ष हजारीबाग, रांची संथाल परगना, आदि जिलों में सर्वाधिक मात्रा में पाये जाते हैं व कुसुम वृक्ष रांची और सिंहभूम जिले में अधिक पाए जाते हैं।

लाख उद्योग

कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हुआ है।  यहां बंगाल की सीमा में चले जाने से पूर्व पुरुलिया के समीप मालदा झारखंड का प्रमुख लाख उत्पादन केंद्र था।  झारखंड देश का लगभग 50% लाख उत्पादित करता है और इसका देश में लाख उत्पादन में प्रथम स्थान है। वर्तमान में यहां बुंदू, गढ़वा, मुरहू खूंटी, पाकुर, डाल्टनगंज, चाईबासा, चक्रधरपुर, रांची और इमामगंज लाख उत्पादन के प्रमुख केंद्र है।  यहां लाख की 83 बड़ी-छोटी इकाइयां है।

झारखंड राज्य में रांची के समीप नामकुम में लाख अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई है जिससे लाख उधोग के विकास में अधिक वृद्धि की संभावना है।

केंद्र सरकार के सार्वजनिक प्रबंध के भारी उद्योग

पाइराइटस फास्फेटस एंड केमिकल्स लिमिटेड,  सिंदरी

इस कारखाने की स्थापना सिंदरी में की गई थी। इसकी कुल जमा पूंजी ₹ 5 करोड है।  यहां पायराइट्स फास्फेट आदि रासायनिक पदार्थ बनाए जाते हैं।

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड घाटशिला

इस कारखाने की स्थापना 1924 में की गई थी। इस उद्योग की एक शाखा राजस्थान के खेतड़ी नामक स्थान पर भी स्थित है। इस कारखाने की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत में तांबे उत्पादन में वृद्धि और आयात में कमी करना है। घाटशिला में स्थित कारखाना की उत्पादन क्षमता 21,000 टन वार्षिक है।

इंडियन एलुमिनियम कंपनी लिमिटेड, मुरी

हिंदूस्तान एल्यूमिनियम कॉरपोरेशन ने स्वर्ण रेखा घाटी के मुरी नामक स्थान पर एल्यूमिनियम कारखाने की स्थापना की थी जो झारखंड बॉक्साइट पर आधारित है।  इसकी उत्पादन क्षमता 1,88,500 टन है।

माइनिंग एंड एलाइड इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड रांची

इसको कॉरपोरेशन की स्थापना 1 अप्रैल, 1965 में की गई थी।  इसका प्रमुख उद्देश्य कोयला व अन्य खनिजों में प्रयुक्त की जाने वाली मशीनरी का निर्माण करना है। इस कॉरपोरेशन को तकनीकी सहयोग प्राप्त होता है। पूर्व में यह हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन का ही भाग था।

हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड रांची

इस कॉरपोरेशन की स्थापना 31 दिसंबर, 1958 को रांची में की गई थी। इनकी तीन उपशाखाएं हैं-

भारी मशीन उपकरण  संयंत्र, भारी मशीन निर्माण संयंत्र और फाउंड्री फोर्ज संयंत्र। इस कॉरपोरेशन की कुल जमा पूंजी ₹100 करोड़ है।  भारी मशीन निर्माण संयंत्र में 1,00,000 टन की भारी मशीनें और 25,000 टंकी फैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर का निर्माण किया जाता है।

हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, धनबाद

झारखंड में धनबाद जिले के टुंडू नामक स्थान पर जस्ता पर पिघलने का सन्यंत्र लगाया गया है।  भारत में इस प्रकार के पांच संयंत्र लगाए गए थे। इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 225 लाख तक जस्ता प्रगलन की है।

फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, सिंदरी

इस कारखाने की स्थापना 1 जनवरी 1951 को की गई थी।  यह भारत का सार्वजनिक क्षेत्र में पहला कारखाना है। यह अमोनियम,  सल्फेट, यूरिया आदि खादे बनाई जाती है।

सार्वजनिक प्रबंध राज्य सरकार के अधीन उद्योग

बिहार माइका सिंडीकेट लिमिटेड, हजारीबाग

इस सरकारी उपक्रम कि स्थापना हजारीबाग में कि गई है। इसका मुख्य कार्य अभ्रक उत्पादन, उसका श्रेणी पद वर्गीकरण और विपणन करना है।

बिहार स्टेट सुपर फास्फेट फैक्ट्री लिमिटेड, धनबाद

झारखंड सरकार की फैक्ट्री है जिसका मुख्यालय धनबाद में है।  इसमें उच्च श्रेणी का फास्फेट तैयार किया जाता है।

व्यक्तिगत प्रबंध के उद्योग

टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी लिमिटेड, जमशेदपुर-

यह झारखंड राज्य का निजी क्षेत्र का उपक्रम है। इसमें रेल के लिए इंजीनियरिंग रसायन और लोकोमोटिव का निर्माण होता है।

टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड, टाटानगर

यह भी व्यक्तिगत प्रबंधन का मुख्य संसाधन है। इसकी स्थापना जमशेदजी टाटा ने 1907 ईसवी में की थी। इसे स्टील नगरी भी कहते हैं।

  • यूरेनियम प्रोसेसिंग प्लांट, घाटशिला

सार्वजनिक प्रबंध राज्य शासन के अधीन उद्योग

  • बिहार माइका सिंडीकेट लिमिटेड, हजारीबाग
  • बिहार स्टेट सुपर फास्फेट फैक्ट्री लिमिटेड, धनबाद
  • बिहार एयर प्रोडक्ट लिमिटेड, आदित्यपुर
  • बिहार हिल एरिया लिस्ट इरीगेशन कॉर्पोरेशन, रांची
  • बिहार स्टेट बेकन फैक्ट्री, रांची
  • बिहार स्टेट इलैक्ट्रिक एक्युपमेंट फैक्ट्री रांची
  • बिहार स्टेट हाईटेंशन इंसुलेटर फैक्ट्री रांची

केंद्र सरकार के सर्वजनिक प्रबंध के भारी उद्योग

नाम स्थापना वर्ष
बोकारो इस्पात संयंत्र बोकारो 1968
हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, घाटशिला 1967
इंडियन एलुमिनियम कंपनी, मुरी
माइनिंग एंड स्टील इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड, रांची 1965
हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड, रांची 1958
इंडियन एक्स्प्लेसिव लिमिटेड कंपनी, गोमिया 1955
फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, सिंदरी 1951
पाइराइट्स फास्फोरस एंड कैमिकल्स लिमिटेड, सिंदरी
हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड धनबाद

राज्य औद्योगिक विकास निगम के नवीन औद्योगिक संस्थान

  • घड़ी का कारखाना, रांची
  • सीमेंट कारखाना, पतरातू

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