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स्वतंत्रता प्राप्ति का इतिहास

इस आर्टिकल में हम आपको स्वतंत्रता प्राप्ति का इतिहास के बारे में बता रहे है.

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स्वतंत्रता प्राप्ति का इतिहास

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति की 1945 में इंग्लैंड में चुनाव हुए और मजदूर दल सत्ता में आया. प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने भारत में सता हस्तांतरण का प्रस्ताव रखा. 24 मार्च, 1946 को ब्रिटिश मंत्री मंडल के तीन सदस्य पैथिक लारेंस, स्टेफर्ड क्रिप्स और ए वी वी एलेग्जेंडर से युक्त कैबिनेट मिशन भारत आया.

इस मिशन के द्वारा संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के उपाय सुझाए गए. लेकिन इन प्रस्तावों को सामान्य स्वीकृति नहीं मिल सकी. देशभर में चुनाव हुए,  किंतु कांग्रेस और मुस्लिम लीग में गतिरोध बने रहने के कारण सरकार निर्माण में आरंभ में हालांकि बाधा पहुंची परंतु अंततः 2 दिसंबर, 1946 को कांग्रेस द्वारा सरकार का गठन हुआ. इस सरकार में बिहार के डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और जगजीवन राम शामिल हुए.

9 दिसंबर, 1946 को स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने के लिए विधानसभा का सत्र डॉ सच्चिदानंद सिन्हा (अस्थाई अध्यक्ष) की अध्यक्षता में प्रारंभ हुआ. बाद में डॉ. प्रसाद संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष बने. कांग्रेस और मुस्लिम लीग में देश के विभाजन के प्रश्न पर समझौता हो जाने के बाद 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया.

26 जनवरी. 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ बिहार भारतीय संघ एक राज्य में परिवर्तित हो गया. भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत प्रांतीय स्वायत्तता लागू करने का फैसला हुआ, ताकि प्रांतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना की जा सके. इसके पश्चात सभी पार्टियां चुनाव की तैयारी में लग गई.

1935 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री कृष्ण सिंह की अध्यक्षता में बिहार में कांग्रेस का स्वर्ण जयंती वर्ष धूमधाम से मनाया गया. जनवरी, 1936 में 6 वर्ष के प्रतिबंध के बाद बिहार राजनीतिक सम्मेलन का 19वां अधिवेशन पटना में आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता रामदयालु सिंह ने की.

जवाहरलाल नेहरू ने बिहार के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करके काग्रेस के लिए सघन-प्रचार कार्य किया. 22 से 27 जनवरी, 1937 के मध्य बिहार के निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव संपन्न हुए. इसमें कांग्रेस ने अपने 107 प्रत्याशी खड़े किए थे, जिनमें 98 प्रत्याशी विजय रहे हैं. दोनों सदनों को मिलाकर कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ. 17-18 मार्च, 1939 को कांग्रेस की नई दिल्ली बैठक में प्रांतों में मंत्रीमंडल गठित करने की अनुमति दी गई है.

मंत्रीमंडल गठित करने का आमंत्रण पाकर श्री कृष्ण सिंह ने जब गवर्नर एम जी हैलेट से अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग न करने का आश्वासन मांगा तो उन्होंने इंकार कर दिया. परिणाम स्वरुप श्री कृष्ण सिंह ने सरकार बनाने से मना कर दिया. इसके बाद दूसरी बड़ी पार्टी इंडिपेंडेंट पार्टी के मोहम्मद यूनुस को सरकार बनाने का निमंत्रण मिला, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया,

इस प्रकार मोहम्मद युनूस बिहार के पहले भारतीय प्रधानमंत्री (उस समय प्रांतीय सरकार के प्रधान को प्रधानमंत्री ही कहा जाता था) बने. 1 अप्रैल, 1937 को गठित इस मंत्रिपरिषद में मो. यूनुस के अतिरिक्त वहवा अली,  कुमार अजीत प्र. सिंह और गुरु सहाय लाल शामिल हुए. परंतु कांग्रेस पार्टी के गवर्नर के इस कदम का विरोध किया गया. 21 जून, 1937 को वायसराय लिनलिथगो ने आश्वासन दिया कि भारतीय मंत्रियों के वैधानिक कार्यों में राज्यपल हस्तक्षेप नहीं करेंगे. इसके उपरांत कांग्रेस कार्यकारिणी में सरकार बनाने का फैसला किया. फलत: मोहम्मद यूनुस को त्यागपत्र देना पड़ा.

20 जुलाई, 1937 को बिहार में श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस मंत्रिमंडल का गठन हुआ, जिसमें अनुग्रह नारायण सिंह, डॉक्टर सैयद मोहम्मद, जगलाल चौधरी आदि शामिल हुए. रामदयालु सिंह विधानसभा के अध्यक्ष तथा अब्दुल बारी उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए.

सितंबर 1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ और ब्रिटेन की सरकार ने भारत को युद्ध में शामिल करने का निर्णय लिया, तो विरोधस्वरूप कांग्रेस ने सरकार से सहयोग समाप्त कर दिया. फलत: के सभी प्रांतों में सरकारों का विघटन हो गया. बिहार में श्रीकृष्ण सिंह ने कि 31 अक्टूबर 1939 को त्याग पत्र देकर मंत्रिमंडल को भंग कर दिया.

मार्च 1946 में बिहार में एक बार फिर चुनाव संपन्न हुए. इस बार विधानसभा की 152 सीटों में कांग्रेस को 98, मुस्लिम लीग को 34, मोमिन को 5, आदिवासियों को तीन तथा निर्दलीय को 12 सीटें मिली.

30 मार्च, 1946 को श्री कृष्ण सिंह के नेतृत्व में बिहार में सरकार का गठन हुआ. किंतु कांग्रेस द्वारा अंतरिम सरकार के गठन का मुस्लिम लीग ने प्रतिक्रियात्मक जवाब दिया तथा देश भर में दंगे भड़क उठे. बिहार में भी दंगो का प्रभाव पड़ा. छपरा, बांका, जहानाबाद, मुंगेर आदि इलाकों में दंगों का ज्यादा प्रभाव रहा. डॉ राजेंद्र प्रसाद तथा आचार्य कृपलानी ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की.

6 नवंबर, 1946 को गांधीजी ने बिहार के नाम एक पत्र जारी किया, जिसमें उन्होंने बिहार में फिरे दंगे पर काफी दुख: व्यक्त किया. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी बिहार आकर दंगा ग्रस्त इलाकों का दौरा किया.

दिसंबर, 1940 ईसवी में जब संविधान सभा के स्थाई अध्यक्ष डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में भारतीय संविधान सभा का अधिवेशन शुरू हुआ तो मुस्लिम लीग के सदस्य इसमें सम्मिलित नहीं हुए. 20 फरवरी, 1947 ईसवी को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने जून 1948 तक भारत को संविधानता प्रदान करने की घोषणा की,

इस बीच 5 मार्च, 1947 को गांधीजी बिहार की यात्रा पर आए और वह जब तक बिहार में रहे प्रार्थना शांति और एकता का संदेश देते रहे. 14 मार्च, 1947 ईसवी को लॉर्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय बने.

जुलाई 1947 में इंडिया इंडिपेंडेंस बिल संसद में प्रस्तुत किया गया तथा आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित हो गए. देश की स्वतंत्रता की इस यादगार घड़ी में बिहार में भी खुशियां मनाई गई. स्वतंत्र भारत में बिहार के प्रथम राज्यपाल के रूप में श्री जयरामदास दौलतराम तथा मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण सिंह ने पदभार ग्रहण किया.

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