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अशोक (273-232 ई. पू.) का इतिहास


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आज इस आर्टिकल में हम आपको अशोक (273-232 ई. पू.) का इतिहास के बारे में बताने जा रहे है.

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अशोक (273-232 ई. पू.) का इतिहास

बिंदुसार की मृत्यु के बाद उसका सुयोग्य पुत्र अशोक प्रियदर्शी 273 ई, पू. के लगभग मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा. उसके अभिलेखों में अभिषेक के काल (269 ई. पू.)  से ही राज्य गणना की गयी है. मास्की तथा गुर्जरा के लेखों में उसका नाम अशोक मिलता है.

पुराणों मैं उसे अशोक वर्धन कहा गया है. दिव्यावदान और सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक अपने पिता के शासनकाल में अवंति का उप राजा था. बिंदुसार के बीमार पड़ने पर वह राजधानी पाटलिपुत्र आया था. सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने 99 भाइयों की हत्या करके राज सिहासन प्राप्त किया. लेकिन उत्तराधिकार के युद्ध का समर्थन स्वतंत्र प्रमाणों से नहीं होता है.

अशोक के अभिलेख में जीवित भाइयों के परिवार का उल्लेख मिलता है. अभिलेखीय साक्ष्य से यह भी ज्ञात होता है कि अशोक के शासन के विभिन्न भागों में उसके भाई निवास करते थे, जबकि उसके कुछ भाई विभिन्न प्रदेशों के राज्यपाल भी थे.

दिव्यावदान में अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी मिलता है जो चंपा के एक ब्राह्मण की पुत्री थी. दक्षिण परंपराओं में उसे धर्मा कहा गया है जो प्रधान रानी थे. कुछ लेखक उसे सेल्युकस की पुत्री से उत्पन्न बताते हैं,

महाबोधिवश में उसका नाम वेदिशमहादेवी मिलता है. और उसे शाक्य जाति का बताया गया है. उसी से अशोक के पुत्र महेंद्र तथा संघमित्रा का जन्म हुआ था और वही उसकी पहली पत्नी थी. दिव्यावदान में उसकी एक पत्नी का नाम तिष्यरक्षिता का उल्लेख मिलता है. परंतु अशोक के लेख में केवल उसकी पत्नी करुवाकि का नाम ही है, जो तीवर की माता थी.

दिव्यावदान में अशोक के दो भाइयों सुसीम तथा विगताशोक का उल्लेख मिलता है. उत्तरी बौद्ध परंपरा में यह युद्ध सिर्फ अशोक एवं उसके बड़े भाई सुसीम के बीच बताया गया है.

अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु जो साधन अपनाये गये, वे थे-

  1. धर्म यात्राओं का प्रारंभ है,
  2. राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्ति,
  3. ब्रह्मा मात्रों की नियुक्ति,
  4. दिव्य रूपों का प्रदर्शन,
  5. धर्म श्रवन एवं धर्मपदेश की व्यवस्था,
  6. लोकोपकारिता के कार्य,
  7. धर्मलिपियों को खुदवाना,
  8. विदेशों में धर्म प्रचारकों को भेजना आदि.

अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए धर्म यात्राओं की शुरुआत की. अपने अभिषेक के 20 वें वर्ष में वह लुंबिनी ग्राम गया और वहाँ का कर घटाकर 1\8  कर दिया. अशोक के इन कार्यों का जनता पर काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह बौद्ध धर्म की ओर आकृष्ट हुए,

अपने विशाल साम्राज्य में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु अशोक ने अपने साम्राज्य के उच्च पदाधिकारियों को नियुक्त किया. स्तंभ लेख 3 और 7 के अनुसार उसने युष्ट, रज्जुक, प्रादेशिक तथा युक्त नामक के पदाधिकारियों को जनता के बीच जाकर धर्म प्रचार करने तथा उपदेश देने का आदेश दिया. धर्म प्रचार हेतु अशोक ने साम्राज्य में धर्मश्रवण तथा धर्माेप्रदेश की व्यवस्था करवायी.

अभिषेक के 13 वें वर्ष में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु अशोक ने पदाधिकारियों का एक नया वर्ग तैयार किया, जिसे धर्ममहामात्र कहा गया. इनका कार्य विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच भेद-भाव को मिटाकर धर्म की एकता को बल देना था, धम्म को लोकप्रिय बनाने हेतु अशोक ने मानव व पशु जाति के कल्याण हेतु अनेक कार्य किये.

उसने सबसे पहले पशु पक्षियों की हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया तथा मानव एवं पशुओं की चिकित्सा की अलग अलग व्यवस्था करवायी . मार्गो में वृक्ष लगवाए आम्रवाटिकाए में लगवाए, आधे आधे कोस की दूरी पर कुएं खुदवाये तथा विश्राम गृह बनवाए. अशोक के छठे स्तंभ से ज्ञात होता है कि अशोक ने अपने धर्म लेख अपने राज्य अभिषेक (269 ई. पू .) के 12 वर्ष बाद (लगभग 257 ई. पू .से) लिखवाना शुरू किया था.

इन लेखों की भाषा संस्कृत में होकर पालि थी जो इस काल में आम लोगों की भाषा थी इससे धर्म काफी लोकप्रिय हुआ. अशोक ने दूर-दूर तक बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु दूतों का प्रसार को विदेशों में भेजा. अपने दूसरे तथा 13 वें शिलालेख में उसने उन देशो का नाम लिखवाया है जहां उसने दूध भेजे थे. दक्षिणी सीमा पर स्थित राज्य चोल, पांड्य, केरलपुत के नाम वर्णित.

तेहरवें शिलालेख में 5 यमन  राजाओं-

  1. अन्तियोक (सीरियाई नरेश)
  2. तुरम्य (मिस्त्री नरेश),
  3. अन्तिकिनि(मेसीडोनियन राजा ),
  4. मग (सिरिन) तथा
  5. अलिकसुंदर (एपरिस) के नाम मिलते है.जिनके राज्यों में उसके धर्म प्रचारक गये थे.

अन्तियोक पश्चिम एशिया (सीरिया) का राजा एंटियोक्स थियस (ई. पू . 261-246) तथा तुरमय मिस्त्री का शासक टाॅलेमी फिलाडेल्फस था.

अशोक का धम्म

  • धम्म प्राकृत भाषा का शब्द है तथा संस्कृत शब्द धर्म का पर्यायवाची है.
  • अशोक द्वारा प्रतिपादित धम्म का वर्णन अशोक के दूसरे तथा सातवें स्तंभ लेख में मिलता है.
  • अशोक ने मनुष्य की नैतिक उन्नति के लिए जिन आदर्शों का प्रतिपादन किया, उन्हें धम्म कहा गया है. अशोक ने विहार यात्राओं की जगह पर धर्म यात्रा की शुरुआत की.

अशोक की विदेशी नीति

  • अशोक की धम्म ने उसकी विदेशी नीति को भी प्रभावित किया तथा उसने अपने पड़ोसियों के साथ शांति एवं सह- अस्तित्व के सिद्धांतों के आधार पर अपने संबंध स्थापित किए.
  • मिस्त्री नरेश टालेमी फिलाडेल्फस, जो अशोक का समकालीन था, उसके दरबार में अपना राजदूत भेजा था.
  • उसने पाँच यवन राज्य में अपने धर्म प्रचारक भेजे थे. इसका मुख्य उद्देश्य सम्राट की धम्म नीति के बारे में वहां के लोगों को बताना था.
  • उसने दक्षिणी सीमा पर स्थित चार तमिल राज्य चोंल, पांडय, सतियपुत तथा केरल पुत्त एवं ताम्रपर्णि में भी अपने धर्म प्रचारक भेजे थे.
  • अशोक अपने पड़ोसी राज्यों के साथ शांति, सहिष्णुता एवं बंधुत्व के आधार पर मधुर संबंध बनाए रखने को उत्सुक था.

अपने आखिरी दिनों में सम्राट अशोक

बौद्ध ग्रंथों (दिव्यावदान) के अनुसार अशोक का शासनकाल जितना ही गौरवशाली था उसका अंत उतना ही दुखद था.

एक बार जब वह है कुक्कुटाराम विहार को कोई बड़ा उपहार देने वाला था उसके आमत्यों ने राजकुमार सम्प्रत्ति को उसके खिलाफ भड़काया. सम्प्रत्ति ने भांड़ागारिक को सम्राट की आज्ञानुसार कोई भी धनराशि संघ को नहीं देने का आदेश दिया. सम्राट के निर्वाह हेतु दी जाने वाली धनराशि में भी भारी कटौती कर दी गयी तथा अंतत:  उसके निर्वाह के लिए केवल आधा आंवला दिया जाने लगा.

अशोक का प्रशासन के ऊपर वास्तविक नियंत्रण नहीं रहा तथा अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में इस महान सम्राट का अंत हुआ. तिब्बती लेखक तारानाथ और चीनी यात्री हेनसांग ने भी कुछ-कुछ संशोधन के साथ इस बात का समर्थन किया है. कुछ दंत कथाओं के अनुसार अशोक ने संभवत है 269 ई, पू. के लगभग अपने राज्याभिषेक की तिथि से लेकर पुलिस 35 वर्षों तक शासन किया.

अशोक (273 – 232 ई, पु,)  मौर्य वंश का महानतम शासक था. उसके शासनकाल में 250 ई, पू . पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ. उसने बौद्ध धर्म से संबंधित तीर्थों की यात्रा की. बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु श्रीलंका, नेपाल  प्रतिनिधिमंडल भेजें. इस क्रम में भारतीय संस्कृति का प्रसार विदेशों में हुआ. अपने पुत्र और पुत्री संघमित्रा को उसने श्रीलंका भेजा.

अशोक ने जन कल्याण की नीति अपनायी. उसने विभिन्न वर्गों को आर्थिक अनुदान देने और सुविधाएं प्रदान करने के लिए धम्म- महा मात्रों की नियुक्ति की. न्याय- प्रशासन सुव्यवस्थित रखने के लिए राजुक नामक अधिकारी बहाल किये. इस प्रकार अशोक ने सर्वप्रथम एक कल्याणकारी राज्य का आदर्श प्रस्तुत किया और समस्त प्रजा के बीच सद्भाव और सदाचार को बढ़ावा दिया. कुछ इतिहासकारों ने अशोक की आलोचना इस आधार पर की है कि उसकी नीति से मौर्य साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर हुआ.

इन विद्वानों के अनुसार अशोक की शांतिप्रिय नीति ने सम्राज्य के सैन्यबल को नष्ट कर दिया, जबकि बौद्ध धर्म के प्रति उसके झुकाव ने ब्राह्मणों को रुष्ट कर दिया. यह दोनों कारण मौर्य साम्राज्य के पतन में सहायक हुए. परंतु मौर्य साम्राज्य के पतन के कुछ अन्य कारण भी थे. वस्तुतः अशोक के उत्तराधिकारियों की अयोग्यता, केंद्रीय प्रशासन की कमजोरी, प्रांतपतियों के अत्याचार और उनके विरुद्ध विद्रोह , हिंदू यूनानी शासकों के आक्रमण, साम्राज्य की विशालता आदि के कारण साम्राज्य का पतन अशोक की मृत्यु के बाद होने लगा.

184 ई. पू.  मैं अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ  की हत्या करें पुष्यमित्र शुंग ने राजसत्ता पर अधिकार कर लिया.


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