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बिहार की राज्य व्यवस्था

आज इस आर्टिकल में हम आपको बिहार की राज्य व्यवस्था के बारे में बता रहे है जिसकी मदद से आप न सिर्फ BPSC की बल्कि Anganwadi, AIIMS Patna, BPSC, BRDS, BSPHCL, Bihar Education Project Council, IIT Patna, RMRIMS, Bihar Agricultural University, District Health Society Arwal, Bihar Police, Bihar Steno, Bihar Constable, BSSC के एग्जाम की तैयारी आसानी से कर सकते है.

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बिहार की राज्य व्यवस्था

बिहार की शासन व्यवस्था

बिहार भारतीय संघ का एक राज्य प्रांत है. राज्य के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए संघ सरकार के सदृश बिहार में भी प्रतिनिधिमूल्क संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है. भारतीय संविधान के भाग 6 में राज्य प्रशासन के लिए प्रावधान किया गया है.

सरकार के तीन अंग होते हैं- कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका, प्रशासनिक इकाई के अनुसार राज्य का प्रशासनिक व्यवस्था संचालित होती है. राज्य स्तर पर शासन कार्य का संपादन राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद और विभागीय सचिवों के जरिये होता है.

प्रमंडल स्तर पर सभी विभागों के लिए हालांकि आयुक्त उत्तरदायी होते हैं, लेकिन आरक्षी उपमहानिरीक्षक (D. I. G.)  शिक्षा विभाग के सर्वोच्च अधिकारी क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक (RDD) इत्यादि भी महत्वपूर्ण पदाधिकारी होते हैं. शिक्षा विभाग का सर्वोच्च अधिकारी जिला शिक्षा अधिकारी (D.E.O)  जिला शिक्षा अधीक्षक (D.S.E.) इत्यादि होता है.

इसी प्रकार अनुमंडल स्तर पर है प्रशासन के लिए अनुमंडल अधिकारी (SDO\SDM ),आरक्षी उपाधीक्षक (DSP) इत्यादि जिम्मेवार होते हैं. प्रखंड स्तर पर प्रखंड विकास पदाधिकारी (B.D.O) एवं अंचल अधिकारी (C.O.) तथा थानों के प्रभारी आरक्षी निरीक्षक (इंस्पेक्टर) या अवर निरीक्षक (दारोगा या S.I) होते हैं.

भारतीय संविधान में एकरूप राज्यव्यवस्था का प्रावधान किया है. संविधान में राज्यों की शासन व्यवस्था संबंधी उपबंध की भी लगभग संघीय सरकार के समान किए गए हैं.

व्यवस्थापिका

संविधान की धारा 168 के अंतर्गत राज्य विधान मंडल का गठन किया गया है. इसके अनुसार राज्य विधानमंडल के तीन अंग है- राज्यपाल, विधानपरिषद और विधानसभा. इस प्रकार बिहार विधानमंडल द्विसदनीय (विधान परिषद तथा विधान सभा दोनों) हैं.

बिहार विधान सभा

बिहार विधान सभा का गठन संविधान के उपबंधो के अनुसार किया गया है. वर्तमान में बिहार विधान सदस्यों की कुल संख्या 243 है. (अविभाजित बिहार में 14 नवंबर, 2000 ई. तक 324 सदस्य थे) .

पूरे राज्य को 242 निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से 1 सदस्य टीम को विधानसभा में आते हैं. इस प्रकार बिहार विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या 242 है. साथ ही विधानसभा में सभी को प्रतिनिधित्व देने की दृष्टि से एंग्लो इंडियन समुदाय के एक प्रतिनिधि को राज्यपाल द्वारा विधानसभा का सदस्य मनोनीत किया जाता है.

मनोनीत सदस्य को मिलाकर राज्य विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या 243 होती है. विधानसभा का गठन 5 वर्ष के लिए किया जाता है, किंतु संवैधानिक संकट उत्पन्न होने की स्थिति में इसे 5 वर्ष से पूर्व भी  विघटित किया जा सकता है.

विधान सभा राज्य की जनता की प्रतिनिधि सभा है. यह राज्य विधानमंडल का निम्न सदन है. विधानसभा को राज्य के लिए कानून बनाने, बजट पारित करने, कार्यपालिका पर अंकुश लगाने संबंधी व्यापक शक्तियां संविधान द्वारा प्रदान की गई है.

राज्य मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती हैं. विधानसभा में बहुमत प्राप्त राजनीतिक पार्टी द्वारा ही राज्य में सरकार का गठन किया जाता है. राज्य मंत्रिपरिषद तभी तक अस्तित्व में रह सकती है जब तक की विधानसभा में बहुमत प्राप्त है. बिहार विधानसभा में एक अध्यक्ष (स्पीकर)  और एक उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) होता है.इनका चुनाव सदन के सदस्यों में से सदन द्वारा ही किया जाता है.

बिहार विधान परिषद

यह राज्य विधानमंडल का उच्च सदन है. इन सदस्यों का चुनाव निम्नलिखित विधि से संपन्न होता है.

सदस्यों की कुल संख्या के 1\3  भाग का चुनाव निर्वाचक मंडल द्वारा होता है, जिसमें राज्य की नगरपालिकाओ, जिला परिषद एवं स्थानीय स्वशासन की अन्य संस्थाओं के सदस्य शामिल होते हैं. सदस्यों की कुल संख्या की एक तिहाई का निर्वाचन राज्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा संपन्न होता है.

1\12 भाग सदस्य ऐसे स्नातकों को मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा चुने जाते हैं. जो किसी विश्वविद्यालय से कम से कम 3 वर्ष से पंजीकृत स्नातक है. 1\12 भाग सदस्य शिक्षक प्रतिनिधियों के द्वारा चुने जाते हैं. शेष सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किये जाते हैं. ऐसे सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान अथवा व्यावहारिक अनुभव रखने वाले होते हैं.

विधान परिषद एक स्थाई सदन है और उसका विघटन नहीं होता है. किंतु इसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष अवकाश ग्रहण कर लेते हैं. बिहार विधान परिषद में एक सभापति और उपसभापति का पद होता है.

कार्यपालिका

राज्य की कार्यपालिका केंद्र की कार्यपालिका की तरह ही कार्य करती है तथा इसका प्रधान राज्यपाल होता है. राज्य की राजधानी- पटना से ही राज्य की कार्यपालिका राज्य का संचालन करती है. राज्य की कार्यपालिका के राजनीतिक प्रमुख मुख्यमंत्री होते हैं.

किंतु कार्यपालिका का वास्तविक प्रमुख राज्य का मुख्य सचिव होता है, जो मुख्यमंत्री को उनके कार्य दायित्व, विशेषकर प्रशासनिक तथा कार्यान्वयन आदि के प्रति कार्यपालन, परामर्श तथा सहायता अर्थ कार्य संचालित करता है. राज्य के मुख्य सचिव के अधीन पटना में एक पूर्णतया: सुव्यवस्थित सचिवालय कार्यरत है. जिसमें अनेक प्रधान सचिव,अपने-अपने विभागों के रूप में कार्यरत है.

वे अपने विभाग के दक्षतापूर्ण कार्य संचालन, अपने विभाग के मंत्री तथा मंत्रिपरिषद के आदेश एवं निर्देशों के अनुपालन के प्रति उत्तरदायी होते हैं. इनके सहायता से विशेष सचिव, उप- सचिव, अन्य उच्चधिकारी तथा कर्मचारी होते हैं.

सचिवालय

राज्य के सचिवालय के प्राय: सभी विभागों में अनेक प्रधान सचिवों के नियंत्रणाधीन विभागाध्यक्ष अथवा कार्यालयाध्यक्ष होते हैं. शासन की कार्यपालिका शक्ति के रूप में कार्य करते हुए समस्त आदेश या समस्त कार्य मुख्यतः हिंदी भाषा एवं देवनागरी लिपि में संपन्न होता है और शासनादेशों पर सचिव अथवा उनके द्वारा अधिकार प्राप्त अनु सचिव पद तक के अधिकारी हस्ताक्षर करते हैं.

सचिवालय के प्रधान सचिव, विशेष सचिव, संयुक्त सचिव, उप-सचिव पदों पर  सामान्यतः भारतीय तथा बिहार प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं..

राज्यपाल

राज्य का समस्त शासन कार्य राज्यपाल के नाम पर चलता है. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है जो प्रायः 5 साल के लिए नियुक्त किए जाते हैं, किंतु राष्ट्रपति उन्हें बीच में भी हटा सकता है.

ऐसे नागरिक ही राज्यपाल नियुक्त किये जा सकते हैं जिनकी उम्र कम से कम 35 वर्ष हो. राज्यपाल में राज्य की कार्यपालिका संबंधी शक्तियां निहित होती है, जिनका उपयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ मंत्रियों के द्वारा करता है.

राज्यपाल के अधिकार

कार्यपालिका संबंधी राज्यपाल मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों, महाधिवक्ता, राज्य के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों और अन्य बड़े अधिकारियों की नियुक्ति करता है.

व्यवस्थापिका संबंधी:  राज्यपाल विधान मंडल की बैठकों को बुलाता है, स्थागीत कर सकता है तथा विधानसभा को विघटित कर सकता है. यदि विधानमंडल का अधिवेशन नहीं चल रहा हो तो आवश्यकता पड़ने पर वह अध्यादेश जारी कर सकता है. अध्यादेश को कानून सदृश्य विधिक मान्यता प्राप्त होता है.

वित्त संबंधी: राज्यपाल की स्वीकृति से ही राज्य विधानसभा में वित्त विधेयक प्रस्तुत किया जा सकता है.

 न्याय संबंधी: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में राष्ट्रपति राज्यपाल से सलाह लेता है.

राज्यपाल अपराधियों को सजा को कम कर सकता है यह क्षमा कर सकता है.

आपातकाल संबंधी:  राज्य में वैधानिक रूप से प्रशासन चलाने की संभावना ना होने पर संविधान की धारा 356 के अधीन वह राष्ट्रपति को आपातकाल घोषित करने या राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने का परामर्श दे सकता है.

विवेक आधारित अधिकार: राज्यपाल अधिकार कार्य मंत्री मंडल के परामर्श एक आता है ,लेकिन कुछ कार्य,  जैसे- विधायकों की स्वीकृति देने में, विधानसभा भंग करने में तथा, मुख्यमंत्री की नियुक्ति करने मे, जब विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला हो, अपने विवेक से निर्णय करता है.

मंत्रिपरिषद

राज्यपाल को प्रशासन में सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होती है, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होता है. विधि, वित्तीय व अर्थ संबंधी सभी मामलों को निर्धारण मंत्रिपरिषद ही करती है.

मुख्यमंत्री

विधानसभा के सदस्य की राजनीतिक दलों में बंटे होते हैं, जिस दिल का बहुमत होता है, उसी दल का नेता मुख्यमंत्री होता है. यदि किसी दल का बहुमत नहीं हुआ तो कई दलों के परंपरिक के तालमेल से गठबंधन सरकार या मंत्रिपरिषद का गठन किया जाता है. मंत्रिमंडल में प्रधानता मुख्यमंत्री की होती है. मुख्यमंत्री का चुनाव उसके दल अथवा गठबंधन के सहयोगी दलों के सदस्य करते हैं. किंतु मुख्यमंत्री के रूप में किसी व्यक्ति की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा होती है.

मुख्यमंत्री नियुक्त हुए व्यक्ति को राज्य व्यवस्थापिका का सदस्य होना चाहिए या नियुक्ति से छह माह के  के अंदर सदस्य बन जाना चाहिए. मुख्यमंत्री राज्यपाल व मंत्रिमंडल के बीच कड़ी का कार्य करता है. शासन संबंधी निर्णयों, मंत्रियों व पदाधिकारियों की नियुक्ति तथा विधि निर्माण कार्य में मुख्यमंत्री की भूमिका अहम होती है.

न्यायपालिका

न्यायपालिका सरकार का तीसरा प्रमुख अंग होता है. नागरिक जीवन में शासन अनुचित हस्तक्षेप न करें और एक नागरिक दूसरे नागरिक के साथ ठीक व्यवहार करें, इसकी देखभाल के लिए भारतीय संविधान के उपबन्धो के अधीन बिहार में भी स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है.

राज्य में सबसे ऊँची अदालत पटना उच्च न्यायालय है, जिसकी स्थापना सन 1916 में हुई थी. पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं बिहार के राज्यपाल की सलाह से राष्ट्रपति द्वारा की जाती है.

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने के लिए आवश्यक है कि –  वह भारत का नागरिक हो, वह कम से कम 10 वर्ष तक भारत में न्याय संबंधी किसी पद पर कार्य कर चुका हो या राज्यों के उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रह चुका हो. बिहार में जिला एवं अन्य अधीनस्थ न्यायालय में जिला एवं सत्र न्यायाधीश होते हैं और उनकी सहायता के लिए अतिरिक्त जिला जज तथा सब जज होते हैं..

छोटी अदालतों के अधिकारी राज्य सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं. अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायाधिकरण के अधीक्षण का अधिकार पटना उच्च न्यायालय को प्रदान किया गया है. अंतिम अपील सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में होती है.

राज्य में स्थित न्यायालयों पर मंत्रिमंडल का कोई भी अधिकार नहीं होता है. वे उच्च न्यायालय के अधीन रूप से कार्य करते हैं. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की आयु में अवकाश ग्रहण करते हैं.

उच्च न्यायालय: गठन  एवं क्षेत्राधिकार

देश के विभिन्न राज्यों में न्याय प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए उच्च न्यायालय का गठन किया गया है. उच्च न्यायालय राज्य का शीर्ष  न्यायालय होता है, जो राज्य के मौलिक अधिकारों का संरक्षक होता है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होता है. उच्च न्यायालय के गठन की व्यवस्था अनुच्छेद 216 में की गई है. गुवाहाटी उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या सबसे कम है, जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सबसे अधिक है.

वर्तमान में संपूर्ण भारतवर्ष में  24 उच्च न्यायालय है. सविधान में उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित अन्य न्यायाधीशों कीकोई संख्या सीमा निश्चित नहीं की गई है. अंत: सभी उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या समान नहीं होती है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 231 के अनुसार संसद को यह अधिकार है कि वह किन्ही दो राज्यों या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना करें.

मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायधीशों की नियुक्ति

भारतीय संविधान के अनुच्छेद  217 के अनुसार राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करने में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श लेता है.

संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करने में राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करता है.

1993 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति के बिना किसी उच्च न्यायालय में न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं हो सकती है.

न्यायाधीशों की योग्यता

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 (2) के अनुसार कोई व्यक्ति किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने योग्य तभी होगा, जब वह भारत का नागरिक होता तथा किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय में या एक से अधिक राज्य के उच्च न्यायालयों में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो अथवा भारत में कम से कम 10 वर्ष तक किसी न्यायिक पद पर आसीन रहा हो तथा  62 वर्ष की आयु पूरी न की हो.

न्यायाधीशों का कार्यकाल

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश से 62 वर्ष की आयु तक अपने पद पर रह सकता है. इसके अतिरिक्त  निमन तरीकों से पद छोड़ सकता है यदि-  वह स्वयं त्यागपत्र दे दे,संसद द्वारा पारित प्रस्ताव के पश्चात वह राष्ट्रपति द्वारा बर्खास्त कर दिया जाए, राष्ट्रपति द्वारा उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त कर दिया जाय या उसे किसी अन्य राज्य के उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया जाय.

उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की आयु संबंधी विवाद का निर्णय राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 223 के अनुसार किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त होने पर, राष्ट्रपति न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों में से किसी एक को मुख्य न्यायाधीश के कार्यों का संपादन करने हेतु नियुक्त किया जा सकता है.

वेतन एवं भत्ते

सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय (न्यायाधीश) वेतन एवं सेवा शर्तें संशोधन विधेयक/अधिनियम 2008 के अनुसार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों को अब 30,000 के बदले ₹90,000 प्रति माह तथा अन्य न्यायाधीशों को 26,000 के स्थान पर ₹80,000 प्रतिमाह वेतन मिलेगा.(नया वेतन 1 जनवरी 2006 से प्रभावी किया गया है)

इसी तरह उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 33,000 के स्थान पर ₹100000 प्रतिमाह तथा अन्य न्यायाधीशों को ₹30,000 के बदले ₹90,000 प्रतिमाह वेतन मिलेगा.

वेतन के अलावा उन्हें भत्ते आदि का सेवा निवृत्ति के पश्चात पेंशन भी मिलती है. न्यायाधीशों के कार्यकाल में उनके वेतन तथा भत्ते में किसी प्रकार की कमी नहीं की जा सकती है.

न्यायाधीशों को दिए जाने वाले वेतन में भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते का निर्धारण करने की शक्ति संसद को प्राप्त होती है.

स्थानांतरण

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 222 के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की किसी दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जा सकता है. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसमें राज्य के राज्यपाल या उनके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा शपथ ग्रहण करवाया जाता है.

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