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बिहार में भूमि सुधार

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बिहार में भूमि सुधार

बिहार में भूमि सुधार के निमित्त कार्यक्रम अपनाए गए हैं-

  • जमीदारी प्रथा उन्मूलन
  • वितरण संबंधी सुधार
  • जोतों की चकबंदी
  • जोतों की सीमाबंदी
  • सहकारी कृषि

बिहार में कृषि उत्पादन को प्रभावित करने वाले भूमि सुधार का महत्वपूर्ण कदम 1954 का भूदान यज्ञ कार्यक्रम है जो विनोबा भावे द्वारा चलाया गया है.

भूखंडों के विभाजन और बिखराव से पैदा स्थिति के कारण कृषि की अलाभकारिता को दूर करने और आधुनिक कृषि औधोगिक के कार्यान्वयन की आधारशिला निर्मित करने हेतु बिहार राज्य चकबंदी अधिनियम 1956 ई. में पारित किया गया. बिहार सरकार ने भूमि अधिकार अधिनियम 1961 में पारित किया.

बिहार राज्य में करीब 42.60 हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित है और औसतन 14.45 हेक्टेयर भूमि में बाढ़ का भीषण आक्रमण  होता रहता है. बिहार राज्य में मिट्टी सर्वेक्षण का कार्य 1954 से लेकर 1966 के बीच हुआ और बिहार में 22 प्रकार की भूमि का वैज्ञानिक समूह चयनित किया गया है.

बिहार के आर्थिक पिछड़ापन का कारण और उससे उबरने का प्रयास

बिहार का पिछड़ापन एक ऐतिहासिक तथ्य है ब्रिटिश शासन के दौरान एक रणनीति के तहत इसे पिछड़ा रखा गया है. राज्य में विकास से जुड़े कार्य निम्नतम स्तर पर रखे गए हैं. परिणामस्वरूप बिहार हमेशा ही पिछड़ा बना रहा है जिसकी पुष्टि 1930 में सरकारी आंकड़ों के आधार पर तैयार बिहार और उड़ीसा में सुधारों की कार्यप्रणाली पर भारतीय साविधिक आयोग के लिए ज्ञापन से भी होती है. यह दस्तावेज दर्शाता है कि किस तरह औपनिवेशिक के प्रशासन ने राज्य की न्यूनतम प्रशासनिक जरूरतों की भी उपेक्षा की है.

राज्य की धीमी विकास गति के लिए काफी हद तक कम योजना खर्च तथा अपर्याप्त केंद्रीय सहायता और पर्याप्त संस्थागत वित्तीय सहायता को जिम्मेदार माना गया है. पहली योजना में राज्य के लिए प्रति व्यक्ति योजना खर्च कुल ₹25 था और प्रति व्यक्ति केंद्रीय सहायता तो ₹14 जबकि शेष भारत के लिए यह राशि क्रमश: ₹33 और ₹23 थी.

सातवीं योजना के दौरान राज्य और शेष भारत में प्रति व्यक्ति योजना खर्च कर हमसे ₹733 और 1076 रुपए था तो प्रति व्यक्ति केंद्रीय सहायता राज्य के लिए ₹340 और पूरे भारत के लिए ₹375 आंकी गई. सातवीं और आठवीं योजना के तहत प्रति व्यक्ति योजना खर्च क्रमश: ₹653 और ₹1506 जबकि पंजाब और हरियाणा के लिए दो योजनाओं में यह राशि क्रम से 1775 रुपए व 1779 रुपए तथा 3252 रु और ₹3497 थी.

केंद्रीय क्षेत्र में निवेश के कम और गिरते स्तर का भी इस के पिछड़ेपन में योगदान रहा है. 1975-76 में बिहार का प्रतिशत 30.66 था. 1990-91 में यह घटकर 8.24% रह गया. 1995-96 में निवेश सबसे कम (2.68%) रह गया. बिहार की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और 90% ग्रामीण जनता की आजीविका का साधन है. इसके बावजूद कृषि में सार्वजनिक निवेश घटता गया जिसके परिणाम स्वरुप राज्य की उत्पादन क्षमता में कमी आई.

पांचवी योजना में कुल बुवाई क्षेत्र में प्रति एकड़ सार्वजनिक निवेश ₹196 था जो आठवीं योजना में घटकर ₹79 रह गया था. बिहार में कुल 9.41 लाख हेक्टेयर भूमि जल-जमाव की समस्या से प्रभावित है जिसमे 8 लाख हेक्टेयर से अधिक उत्तर बिहार में है तथा 1 लाख हेक्टेयर गंगा नदी से सटे फतुहा से लखीसराय तक मोकामा का टाल क्षेत्र है.

1946-47 ई. में बिहार में 2.06 लाख जमीदार थे. 1950 के भूमि सुधार अधिनियम को 1952 ई. में लागू कर जमीदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया है. 1956 ई. में बिहार चकबंदी अधिनियम तथा 1961 ई. में बिहार भूमि अधिग्रहण अधिनियम पारित किए गए किंतु इनका कार्यान्वयन संतोषप्रद नहीं रहा है.

राज्य सरकार के प्रयास से राज्य में लीची अनुसंधान केंद्र, मुसहरी (मुजफ्फरपुर) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का क्षेत्रीय मुख्यालय, पटना, दलहन अनुसंधान केंद्र, मोकामा मक्का अनुसंधान केंद्र,, सबलपुर (पटना) की स्थापना की गई है. इसके अतिरिक्त पान अनुसंधान केंद्र, कृषि  यांत्रिकीकरण अनुसंधान केंद्र तथा मखाना अनुसंधान केंद्र की स्थापना की जा रही है.

भारत में हरित क्रांति का आरंभ 1966-67 ई. में हुआ और इसके साथ बिहार में हरित क्रांति का आरंभ हुआ. बिहार के शाहाबाद (भोजपुर) जिले का चयन भारत सरकार ने इसके आरम्भ के लिए किया था.

बिहार में सूक्ष्म वित्त

सूक्ष्म वित्त (माइक्रो फाइनेंस) गरीबी निवारण का एक सक्षम विकल्प है. समाज के असुरक्षित और कमजोर तबकों को समय पर पर्यावरण एवं अन्य वित्तीय सेवाओं की किफायती खर्च पर उपलब्ध समाज के समग्र आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य है. इस पृष्ठभूमि में अनुसूचित व्यवसायिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सहकारी बैंकों द्वारा क्रिया गणित एवं सहायता समूह और स्वयं सहायता समूह- बैंक संघ कार्यक्रम देश में प्रमुख सूक्ष्म वित्त कार्यक्रम के बतौर उभरा है.

31 मार्च 2015 तक देश में 77 लाख स्वयं सहायता समूह मौजूद थे जिनका आच्छादान 10 करोड़ परिवारों तक था. बैंकिंग व्यवस्था के साथ में औपचारिक रूप से जुड़े हुए थे और उनकी बजट की राशि 11,060 करोड रुपए से अधिक थी. बैकिंग व्यवस्था से 2014-15 में उसको प्राप्त कुल ऋण 27,580 करोड रुपए से अधिक था.

मार्च 2015 तक बिहार में 29.2 लाख ग्रामीण परिवार स्वयं सहायता समूह द्वारा आच्छादित थे. बिहार में प्रति स्वयं सहायता समूह 13,216 रुपए की औरतें बचत राशि राष्ट्रीय बचत और ₹14,368 से काफी कम थी और 1.02 लाख रुपए का उत्तरण भी 1.44 लाख रुपए के राष्ट्रीय औसत से कम था लेकिन पिछले वर्ष के मुकाबले यह फैसला काफी घट गया है.

वर्ष 2014-15 में बैंकों द्वारा स्वयं सहायता समूह को वितरित कुल ऋण 471 करोड रुपए और उन पर बकाया ऋण राशि ₹1027 करोड़ थी.

कृषि

बिहार की कुल जनसंख्या का लगभग 90% गांव में रहता है.  कृषि जनसंख्या के निर्वाह का मुख्य आधार है. बिहार में कृषि मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है. क्योंकि बिहार में 75 से 80% वर्षा मानसून के दौरान ही होती है, राज्य में बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. कुल बुवाई क्षेत्र के 57% में ही सिंचाई होती है.

राज्य की 63 प्रतिशत ट्यूबवेल से ही होती है .नहरे 30% सिंचाई जरूरत को पूरा करती है तो अन्य स्रोतों से 7% जरूरत पूरी होती है. राज्य में उर्वरकों का उपयोग 1980 के दशक के 22 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2011-12 में खरीफ एवं रबी फसलों के लिए 138.45  एवं 175.47 किलो प्रति हेक्टेयर हो गया है.

विगत 3 वर्षों के दौरान आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार, राज्य में उर्वरकों की खपत 11.3% की कमी करते हुए वर्ष 2014-15 में कुल 41.16 लाख टन रह गई है. राज्य में बीज प्रतिस्थापन दर, बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार 2006-07 के मात्र 12% थी, अब बढ़कर 33% हो गई है.

कृषि के मामले में राज्य का सबसे नकारात्मक पहलू है बार-बार आने वाली बाढ़ जो हर साल जान, माल, पशु, और खड़ी फसल को बर्बाद कर बेहिसाब आर्थिक नुकसान करती है.

बाढ़ राष्ट्रीय आयोग ने बिहार को देश का एक ऐसा राज्य माना है, जो बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है. राज्य में कुल भौगोलिक क्षेत्र का 73.06% बाढ़ ग्रस्त हो सकता है और देश में बाढ़ की संभावना क्षेत्र का यह 17.2 प्रतिशत है.

उद्योग

औद्योगिक क्षेत्र का इस राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 2014-15 में 18.5% है, जो देश के प्रमुख राज्यों में सबसे कम है. वर्ष 2012-13 में किए गए सबसे हाल के सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में 3347 विनिर्माण इकाइयों थी जबकि 2010-11 में उनकी संख्या 2807 थी. इस प्रकार यह 19.2% वृद्धि दर्शाता है.

चालु कारखानों की बात की जाए तो 2012 और 2013 में बिहार में उनकी संख्या 2946 थी जो आज कुल निबंधित कारखानों का 88.1% है. बिहार में कृषि आधारित उद्योगों का हिस्सा राष्ट्रीय आंकड़े (395%) से कम है. वर्ष 2012-13 में भारत में कारखानों की कुल संख्या में बिहार का हिस्सा 1.51% था. लेकिन अन्य सभी विशेषताओं में इसका हिस्सा काफी कम था-  

  • स्थिर पूंजी- 0.30%
  • कार्यशील पूंजी- 0.41%
  • नियोजित व्यक्तियों की संख्या- 0.90%
  • निर्यात मूल्य- 0.86%
  • निवल मूल्य वर्धन- 0.15%

वर्ष 2012-13 में बिहार में कारखानों में 1.16 लाख कामगार कार्यरत थे जो पूरे देश में नियोजित 129.50 लाख व्यक्तियों के 1% से भी कम है. बिहार में कामगारों का वेतन औसतन 90.8 हजार था. जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 184.9 हजार रुपए का था.

बिजली

बिहार में विद्युत उत्पादन और उपलब्धता की दर देश में सबसे कम है. अखिल भारतीय औसत वार्षिक विद्युत उपभोग सत्र 813 किलो वाट की तुलना में बिहार में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 117 किलो वाट है.

सड़कें

वर्तमान सरकार ने सड़कों के विकास को प्राथमिकता की सूची में बहुत ऊपर रखा है. बिहार में सड़कों की कुल लंबाई 1,40,220 किलोमीटर है, इसमें से 77.5% सड़कें पक्की है तथा शेष गांव की कच्ची सड़के हैं. राष्ट्रीय राज्य मार्ग कुल सड़क लंबाई 4595 कि.मी. है, जबकि राज्य की लंबाई 4,253 किलोमीटर है.

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में नहीं शामिल स्थाई जिलो के लिए 2013-14 में मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 1948 करोड रुपए के व्यय से 1787.86 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया है.

रेल

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो नई लाइनें बिछाई गई, उन्होंने 7.38 प्रतिशत बिहार में बिछी है. गेज के मामले में 7.12% और देश में जितने रेल रूट का बिजलीकरण हुआ है, उसका 12.8% बिहार में है.

मानव विकास सूचकांक

प्रति व्यक्ति औसत आय की तरह ही बिहार सभी राज्यों के मानव विकास सूचकांक (HDI) में भी सबसे नीचे है. लगभग दो दशक तक बिहार का HDI राष्ट्रीय से भी लगभग 20% नीचे था. विकास सूचकांक में बिहार का स्थान (2006-07) 15वां था.

शिक्षा

2011 की जनगणना के अनुसार बिहार की साक्षरता दर 61.8 फीसदी  है जो 2001 के राष्ट्रीय औसत से थोड़ी ही ऊपर है. बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13 के अनुसार 2011-12 में राज्य में योजना व गैर योजना मिलाकर शिक्षा पर कुल 10,085 करोड रुपए खर्च किए गए हैं.

पिछले 4 वर्षों के दौरान आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13 के अनुसार प्राथमिक स्तर पर नामांकन में वार्षिक वृद्धि दर 3% थी. उच्च प्राथमिक स्तर पर नामांकन में वार्षिक वृद्धि दर 1.2% थी. बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13 में अनुसूचित जाति के बच्चों का प्राथमिक उच्च प्राथमिक शिक्षा में नामांकन की दर 8.6% दर्शाया गया है.

सार्वजनिक वित्त

सर्वप्रथम 2004-05 में अपने राजस्व लेखे में 1076 क्षेत्र करोड रुपए के अधिवेश से प्रारंभ करने के बाद से बिहार लगातार राजस्व अधिशेष दर्शाता रहा है. 2014-15 में घटकर ₹5,848 रह जाने के पहले 2013-14 में यह 6441 करोड रुपए के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था. हालांकि 2015-16 के बजट अनुमान में इसे बढ़कर 11,981 करोड रुपए तक पहुंच जाना अनुमानित है.

विकास दर

केंद्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011-12 में स्थिर मूल्य पर बिहार की विकास दर 10.52% रही है, जो राष्ट्रीय विकास दर से तेज है. वर्तमान मूल्य पर को वर्ष 2011-12 में बिहार की विकास दर 20.39% दर्ज की गई है जबकि राष्ट्रीय विकास दर 15.7% आंकी गई है. वर्ष 2009-10 में स्थिर मूल्य पर बिहार की विकास दर 14.77% रही थी, जबकि वर्तमान मूल्य पर इसी अवधि में 22.69% थी.

साल 2005-06 से 2014-15 के बीच 15% से अधिक विकास दर दर्ज करने वाले क्षेत्र है- निबंधित वीर निर्माण (19.31%) निर्माण (16.58%) बैंकिंग एवं बीमा (17.70) और परिवहन  भंडार/संचार (15.08%). राज्य की लगभग 90% आबादी की जीविका का मुख्य स्रोत रहे कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र का विकास 6.02% की दर से हुआ है.

प्रति व्यक्ति आय

वाणिज्य और उद्योग मंडल के सर्वेक्षण 2013 के अनुसार बिहार में प्रति व्यक्ति आय 2004-05 के ₹ 7814 से बढ़कर 2011-12 में 95.4% की वृद्धि के साथ ₹15,268 के स्तर पर पहुंची है.

वर्ष 2007-08 में बिहार के प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का 32.4% थी जो 2011-12 में बढ़कर 42.1% हो गई है. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (ISO) द्वारा 7 फरवरी, 2012 को जारी आंकड़ों के अनुसार, स्थिर मूल्य पर बिहार के प्रति व्यक्ति आय 15,268 रुपए हो गई है, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय ₹3805 की तुलना में 40.17% (जो गत वर्ष 37.07% थी) हो गई है.

बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13 के अनुसार राज्य में प्रति व्यक्ति आय वर्तमान मूल्य ₹25,653 हो गई है. वर्ष 2012-13 में बिहार की प्रति व्यक्ति आय संपूर्ण भारत के औरतें का 37.0% थी. वह अनुपात 2014-15 में बढ़कर 40.6% हो गया है.

राज्य घरेलू उत्पाद

बिहार के राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) और राज्य घरेलू उत्पाद (NSDP) के लिए अलग-अलग तैयार किए  जाते हैं. दोनों वर्तमान मूल्य अलग तैयार किए जाते हैं और स्थिर मूल्य पर अलग है.

निर्धनता अनुपात

तेंदुलकर समिति द्वारा सुझाए गए नए फार्मूले के आधार पर केंद्रीय योजना आयोग द्वारा 19 मार्च 2012 को जारी आंकड़े के अनुसार वर्ष 2009-10 में देश में सर्वाधिक निर्धनों की संख्या वाले राज्यों में बिहार उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है जहां की 543.5 लाख जनसंख्या निर्धन है.

सर्वोच्च निर्धनता अनुपात वाले राज्य/केंद्र शासित क्षेत्रों में बिहार प्रथम स्थान पर है. वर्ष 2009-10 के लिए नेतृत्व प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय बिहार में ग्रामीण क्षेत्र हेतु 655.6 रुपए और शहरी हेतु 775.3 रूपय थी.

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