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छत्तीसगढ़ की बोलियां, लोक नृत्य, लोकगीत, लोकनाट्य व सिनेमा

छत्तीसगढ़ की राज्य भाषा हिंदी तथा द्वितीय भाषा अंग्रेजी है. यहाँ भारत की सभी भाषाएं बोलने वाले लोग बसे हुए हैं. राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली बोलियां इस प्रकार है-

  • छत्तीसगढ़ – संपूर्ण छत्तीसगढ़ में.
  • हल्बी –  बस्तर, पखांजूर
  • गोंड़ी-  बस्तर, कांकेर, दंतेवाड़ा, दुर्ग, राजनंदगांव,  रायपुर।
  • अबूझमाड़ –  बस्तर संभाग।
  • माड़िया- नारायणपुर, अबूझमाड़, बिलासपुर, कोटा, सुकमा, दंतेवाड़ा।
  • गद्दबी –  बस्तर संभाग।
  • मतरी –  बस्तर संभाग के उड़ीसा में से लगे क्षेत्रों में।
  • दोरली –  दक्षिणी बस्तर संभाग के आंध्र प्रदेश से लगे क्षेत्रों में।
  • परजी –  बस्तर संभाग।

छत्तीसगढ़ बोली को सरकारी भाषा के रूप में मान्यता दी जाने से संबंधित विधेयक छत्तीसगढ़ विधान सभा में पारित किया गया है।

छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य, लोकगीत, लोकनाट्य व सिनेमा

लोक नृत्य

नृत्य एक सजीव कला है। संगीत में श्रव्य प्रक्रिया प्रमुख रहती है, जबकि नृत्य में दृश्य प्रक्रिया प्रमुख रहती है। भारत की नृत्य कला अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध है। नृत्य भारतीय संस्कृति का अभिनव अंग रहा है। भगवान शंकर के तांडव और पार्वती के लक्ष्य नृत्य की कहानी हमारे धर्म ग्रंथों में देखने को मिलती है। हरिवंशपुराण में उर्वशी, हेमा, रम्भा, मेनका आदि स्वर्ग की देव नर्टकियों के नाम भी आते है

नृत्य शरीर के अंग संचालन द्वारा मन के भावों को अभिव्यक्त करने की कला है। नृत्य के पांच तत्व है –

मुद्रा, रूप सौंदर्य, भाव, ताल एवं लय, अभिनय

छत्तीसगढ़ भी लोक नृत्यों का घर रहा है। यहां की आदिम जातियां नृत्य की दीवानी रही है। यहां जन्म, विवाह, तीज त्यौहार, मेले व उत्सवों में प्रथम संगीत और नृत्य का प्रचलन है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक नृत्य निम्नलिखित है-

सुआ नृत्य गीत- यह नृत्य छत्तीसगढ़ अंचल में दीपावली के अवसर पर शिव-पार्वती की उपासना तथा रंगो पूजा का नृत्य गीत है। लकड़ी मिट्टी की सूअन्ना की मूर्ति की नृत्यगानाए घेरकर नृत्य करती है। नृत्य घेरे मे नारिया दो दलों में बंटी रहती है। एक दल सुअन्ना की आराधना में झुकता है, तो दूसरा खड़ा हो जाता है और सुअना के फेरे लगते रहते हैं।

करमा  नृत्य- यह नृत्य छत्तीसगढ़ की जनजातियों के गोंड और बैगा आदिवासियों रायगढ़ के उरांव जनजातियों में प्रचलित है। इसका आयोजन नई फसल के आने पर तथा वर्षा ऋतु शुरू होने पर आदिवासियों द्वारा किया जाता है। करमा नृत्य एवं गीत मस्ती, सजीवता, सरसता एवं सगीत का अद्वितीय सम्मिश्रण है।

डंडा या रहस्य नृत्य – छत्तीसगढ़ अंचल का डंडा या रहस नृत्य भी बहुत प्रसिद्ध है। यह भगवान कृष्ण की रासलीला के रूप में होली तथा दशहरा पर किया जाता है। इस सामूहिक नृत्य में पुरुष ही स्त्रियों जैसे स्वांग रचाते हैं तथा गोल घेरे में बिजली की गति से पाँव थिरकते दिखाई देते हैं।

राउत नृत्य – छत्तीसगढ़ में इस नृत्य का विशिष्ट स्थान है। श्री कृष्ण द्वारा गोवर्धन पूजा के बाद जब इंद्र ने अपनी शक्ति आजमाइश की, 1 सप्ताह बाद भगवान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया तथा क्षमा याचना की। उसी समय ब्रज के लोग हर्ष उल्लास से नाच उठे। उसी परंपरा को बनाए रखने के लिए राउत ( अहीर) लोग खूब उत्साह से नृत्य करते हैं। यह लोग ढोल, निशान मोहरी झांझ आदि गंडवा बाजे के साथ है नर्तक सुस्त पहनावे के साथ मोरपंख की कलंगी युक्त पगड़ी बांधे हुए, एक साथ में लोहे की फररी तथा दूसरे हाथ में लाठी लेकर नाचते हैं। रायपुर में यह नृत्य दीपावली से शुरू होता है, किंतु बिलासपुर में देव उठानी एकादशी से प्रारंभ किया जाता है।

सरहुल नृत्य- यह जशपुर के उरांव जनजाति का महत्वपूर्ण लोक नृत्य है। यह लोक नृत्य तथा गीत साल वृक्ष के पूजन से संबंधित है। उराव जाति के लोगों का मानना है कि इन नृत्यों से ग्राम देवता तथा पूर्वजों की आत्माएं प्रसन्न होती है तथा इसी के आशीर्वाद से गांव में सुख, शांति एवं समृद्धि बढ़ती। सरहुल का आयोजन चित्र पूर्णिमा को समारोह पूर्वक किया जाता है।

बार नृत्य – कंवर जाति में बरनृत्य का प्रचलन है। प्रत्येक तीसरे वर्ष इसका आयोजन किया जाता है। एक चबूतरे के चारों ओर परिक्रमा करते हुए कार्यक्रम लगातार 288 घंटे चलता है।

घासीयाबाज नृत्य – यह नृत्य सरगुजा के घासी जाति का परंपरागत नृत्य है, इसमें शहनाई, ढपला, लोहाती आदि वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है।

पंथी नृत्य – यह नृत्य छत्तीसगढ़ की सतनामी जाति द्वारा गुरु घासीदास के जन्म दिवस पर किया जाता है, जो माघ माह की पूर्णिमा को किया जाता है।

प्रमुख लोकगीत व लोकनृत्य

  • दादरिया – ददरिया गीतों को छत्तीसगढ़ी लोक-गीत का राजा कहा जाता है।
  • चेतपरब और धनकुल – बस्तर क्षेत्र का लोकगीत।
  • लैंजा गीत  – बस्तर के आदिवासी बाहुल क्षेत्र का लोक गीत।
  • रेला गीत –  मुरिया जनजाति का लोकगीत।
  • गौरा गीत –  मां दुर्गा की स्तुति में गाए जाने वाला लोक गीत है, जो नवरात्रि के समय गाया जाता है।
  • बार नृत्य गीत – कंवर जनजाति का नृत्य गीत।
  • बिलमा – बैगा जनजातियों का मिलन नृत्य गीत है।
  • रीना नृत्य गीत –  गोंड तथा बैगा स्त्रियों का दीपावली के समय का नृत्य गीत है।
  • पंडवानी- छत्तीसगढ़ी वीर रस का लोक नृत्य गीत जिसे लोक बेले भी कहा जाता है।
  • गोड़ों नृत्य गीत है –  गोंड जनजातियों का बीज बोते समय का नृत्य गीत।
  • गोर नृत्य गीत –  बाईसन हार्न माड़िया जनजाति का नृत्य गीत है।
  • गेंदी नृत्य गीत- गोंड युवकों का खेल नृत्य।
  • गोंचो नृत्य –  गोंड़ों का नृत्य।
  • मडई – रावत जाति का नृत्य
  • रास नृत्य – रहस नृत्य होली
  • सिंग माड़िया नृत्य – बस्तर जनपद के बैनेले भू-भाग में माड़िया आदिवासियों का नृत्य है।
  • रोला नृत्य – सैला एक मंडलाकार लोक नृत्य है। मयूर पख की कलंगी, कौड़ियों की बावजूद और कम पट्टे युवकों के दल सेना का प्रारंभ गुरु एवं प्रभु की वंदना से करते हैं।
  • छेरता – मोरिया युवक-युवतियों का सम्मिलित नृत्य।
  • माता सेवा गीत – चेचक को माता माना जाता है। इसकी शांति के लिए माता सेवा गीत गाया जाता है।
  • बांस गीत – राउत जाति का प्रमुख गीत
  • देवार गीत – देवार जाति द्वारा घुंघरू युक्त चिकारा के साथ गाया जाने वाला गीत
  • भड़ौनी गीत- विवाह के समय हंसी मजाक करने के लिए गाया जाने वाला गीत
  • नागामत गीत – नागदेव के गुण-गान व नाग-दंश से सुरक्षा की प्रार्थना में गाया जाने वाला लोकगीत है जो नाग पंचमी के अवसर पर गाया जाता है।
  • दहकी गीत – होली के अवसर पर अश्लीलतापूर्ण परिहास में गाया जाने वाला लोकगीत।

अन्य

  • छत्तीसगढ़ के लोक-संस्कृति, विविध रंगों का अनुपम समूच्चय है। नृत्य, संगीत,  गायन व नाटय के बिखरे मोती,  इस प्रदेश का सुंदर श्रृंगार करते हैं। राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ के लोकगीत ने अपनी अस्मिता को स्थापित किया है
  • सर्वप्रथम श्यामचरण दुबे 1940 में व दानेश्वर वर्मा ने 1962 में लोकगीतों का स्वतंत्र संग्रह क्रमश छत्तीसगढ़ लोकगीतों का परिचय व छत्तीसगढ़ के लोकगीत आदि प्रकाशित कर छत्तीसगढ़ लोकगीत को नई दिशा दी।
  • हेमंत नाडु का छत्तीसगढ़ी-लोकगीत संग्रह भी महत्वपूर्ण है।
  • छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का वर्गीकरण- संस्कारों के गीत (सोहर गीत, बिहाव गीत, पठौनी गीत) ऋतुओं से संबंधित गीत (फाग गीत, बारहमासी गीत, सवनाही गीत) उत्सव गीत ( छेरछेरा गीत, राउत नाचा के दोह, सुआ गीत) धर्म व पूजा गीत (गौरी गीत, माता सेवा गीत, जावरा गीत, भोजली के गीत, धनकुल के गीत, नागपंचमी के गीत), लोरिया व बच्चों के गीत (खेल गीत बरठे फुगड़ी, खड़े फुगड़ी, खुडवा, डांडी-पोहा) मनोरंजन गीत (करमा गीत, डंडा गीत, नचोरी गीत की ददरिया बांस गीत, देवार गीत) अन्य सफुट गीत (भजन और पंथी लोकगीत तथा सतनामियों व कबीरपंथीयों के पद )
  • पंडवानी लोकगीत के प्रमुख गायक/गायिका है- झाडूराम देवांगन, पदमश्री तीजन बाई, ऋतु वर्मा, पुनाराम निषाद, रेखा यादव आदि।
  • भरथरी लोकगीत के प्रमुख गायक/गायिका है- सरजू बाई खांडे, ममता चंद्राकार, अनुराग ठाकुर, रेखा जलक्षत्री आदि
  • लोकगायक है – केदार यादव, गंगाराम शिवारे, मानदास टंडन, संतोष शुक्ला,  शेख हुसैन आदि।

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