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झारखंड राज्य कब बना पूरा इतिहास


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15 नवंबर 2000 को (मध्य रात्रि के ठीक 5 मिनट बाद) देश का 28वां राज्य झारखंड अस्तित्व में आया, जब नए राज्यपाल प्रभात कुमार को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई गई, इसके साथ ही साथ दशकों से संघर्षरत झारखंड क्षेत्र के आदिवासी जनता का अपना राज्य बनाने का सपना साकार हो गया। इस ऐतिहासिक अवसर के लिए विशेष रूप से आयोजित एक भव्य समारोह में झारखंड उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश विनोद कुमार गुप्त ने राज्यपाल की शपथ दिलाई। बाद में बाबूलाल मरांडी ने झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। झारखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद पूरे झारखंड क्षेत्र में हर्ष तथा उमंग की लहर दौड गई हुई है और लोग सड़क पर उतरकर नगाड़े की गूंज तथा मांदर की थाप पर नाचने-गाने लगे ।

झारखंड राज्य के गठन के लिए बिहार पुनर्गठन विधेयक 2000 को लोकसभा ने 2 अगस्त 2000 को व राज्यसभा ने 11 अगस्त 2000 को पारित किया। राष्ट्रपति ने इसे 28 अगस्त 2000 को अपनी स्वीकृति प्रदान कर इसे अधिनियम का रूप दिया। बिहार से काटकर स्थापित किए गए राज्य में 18 जिले सम्मिलित थे। वर्तमान में झारखंड में 24 जिले हैं। इसकी विधानसभा में कुल 18 + 1 = 82 (एक सदस्य एंग्लो इंडियन) सदस्य है, जबकि प्रदेश से लोकसभा की सीटों की संख्या 14 व राज्यसभा की सीटों की।

बिहार में झारखंड आंदोलन का प्रादुर्भाव असंतोष व शोषण के परिणाम स्वरुप हुआ था। इस आंदोलन को भारत का ही नहीं अपितु विश्व का सबसे पुराना आंदोलन माना जाता है। झारखंड का सामान्य अर्थ है- झाड़ों का प्रदेश, बुकानन के अनुसार काशी से लेकर बीरभूम तक का समस्त पठारी क्षेत्र झारखंड कहलाता था। एतेरेय ब्राह्मण में इसे पुंड्र नाम से वर्णित किया गया है।

पृथक झारखंड का विचार सर्वप्रथम सन 1938 में जयपाल सिंह नामक एक छात्र ने एक आदिवासी महासभा में व्यक्त किया था। 1928 के ओलंपिक खेलों में उसने भारतीय हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया था. जयपाल सिंह को अपनी लोकप्रियता के कारण मरड़ गोमके के नाम से भी जाना जाता है। सन 1950 में महासभा के स्थान पर जयपाल सिंह के नेतृत्व में झारखंड पार्टी की स्थापना हुई। तब आंदोलन की बागडोर इस पार्टी ने संभाली, सन 1952 के आम चुनाव में झारखंड पार्टी (चुनाव चिन्ह मुर्गा) अपने उम्मीदवार खड़े किए तथा प्रथम आम चुनाव में ही 330 सदस्यीय बिहार विधान सभा (तत्कालीन) में 32 स्थान प्राप्त कर एक सशक्त विपक्षी दल के रूप में सामने आई। बाद के चुनाव (1957 में 1962) में इसकी लोकप्रियता में कमी आई तथा इसके नेता जयपाल सिंह का झुकाव कांग्रेस की और हुआ। 20 जून 1963 को झारखंड पार्टी का विलय कांग्रेस में हो गया। झारखंड पार्टी के कांग्रेस में विलय के साथ ही कांग्रेस ने समझा कि झारखंड राज्य की मांग त्रासदी समाप्त हो गई। दूसरी तरफ राज्य पुनर्गठन समिति ने सन 1954-55 में अभी तक राज्य झारखंड की मांग को अस्वीकार कर दिया था। इसके बावजूद पृथक झारखंड की आग उसी परिस्थिति मे सुलगती रही।

जयपाल सिंह की असफलता के बावजूद उसके युवा साथियों ने झारखंड पार्टी को हूल झारखंड पार्टी के नाम से बनाए रखा। आदिवासी भाषा मे हुल का अर्थ है- क्रांतिकारी। इस प्रकार संपर्क शब्दों में इस पार्टी का नाम, क्रांतिकारी झारखंड पार्टी पड़ा, परंतु यह पार्टी उचित नेतृत्व के अभाव में बिखर गई। इसी बीच इसके कई नेताओं की हत्याएं हो गई। इसी मध्य बिहार के विभिन्न जिलों में नेतृत्वकर्ताओ की एक श्रंखला बन गई।

मृतप्राय झारखंड आंदोलन सन 1968 में पुनः लोकप्रिय हुआ, अब इसकी बागडोर बिरसा सेवा दल के हाथों में आ गई। बिरसा सेवा दल ने आदिवासियों की भूमि एवं अन्य संपत्ति हड़पने वालों के विरुद्ध आवाज उठाई। सेवादल के सशक्त अभियान से सरकार के कान खड़े हुए। इनकी मांगों को यथावत स्वीकार कर अध्यादेश जारी किया गया। इस अध्यादेश के द्वारा 30 वर्षों के अंदर भूमि हस्तांतरण के मामलों को स्थगित किया गया। इस प्रकार इस अध्यादेश द्वारा आदिवासियों को उनकी हड़पी जमीन मिलनी प्रारंभ हुई। इसके बावजूद एक सशक्त नेतृत्व के अभाव में बिरसा सेवा आंदोलन भी खत्म हो गया।

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