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झारखंड राज्य के विकास का इतिहास


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इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस 1992 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में उत्पादित कुल तांबे का अतिक्रमण 33.85% है, कोयले का 32.98 प्रतिशत है, लोहे का 23.22%, ग्रेफाइट का 17.19  प्रतिशत है, अभ्र्क का 46.51 प्रतिशत क्षेत्र से प्राप्त होता है।  बिहार को एशिया क्षेत्र की खनिज संपदा तथा अन्य स्रोतों में प्राय ₹800 करोड की आय प्रति वर्ष होती है और इसे प्राप्त होता है लगभग ₹200 करोड़ जिससे लगभग आधा ढांचागत खर्च में निकल जाता है। विकास कार्यों पर बहुत कम खर्च हो पाता है। इसी कारण इस क्षेत्र की सड़कें सिंचाई व्यवस्था तथा यातायात अत्यंत दयनीय अवस्था में है, बिहार सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में कुल खेतिहर जमीन 22.54 प्रतिशत है, लेकिन स्थाई सिंचन व्यवस्था मात्र 1.29 प्रतिशत भूमि पर है। 29.77 प्रतिशत जमीन को वन्य क्षेत्र माना जाता है, परंतु फलदार वृक्ष मात्र 1.30% जमीन पर है. 14.72 प्रतिशत जमीन परती जमीन के रूप में तथा 3.86 प्रतिशत जमीन बंजर जमीन के रूप में चिन्हित है।

सन 1973 में झारखंड आंदोलन शिबू सोरेन नामक प्रभावशाली नेता के नेतृत्व में पुनः प्रारंभ हुआ। शिबू सोरेन ने आदिवासियों के शोषण, पुलिस अत्याचार, अन्य एवं श्रमदान के विरुद्ध आवाज उठाई, शिबू सोरेन को कई नेताओं विशेषकर ए. के. राय विनोद बिहारी महतो, का व्यापक समर्थन मिला। धनबाद के उपायुक्त के पी सक्सेना ने आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध अनेक प्रसाशनिक कदम उठाए। आदिवासियों में ली गई रुचि के परिणाम स्वरुप शिबू सोरेन की घनिष्ठता के बी सक्सेना में हुई फलत: शीबू सोरेन ने श्रीमती इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम का समर्थन किया। इसी दौरान श्रीमती गांधी ने क्षेत्र के कांग्रेसी नेता ज्ञानरंजन के सहयोग से झारखंड मुक्ति मोर्चा एवं कांग्रेस से समझौता करा लिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा पुन: बिखरने लगा।

सन 1980 झारखंड आंदोलन पुन: उग्र रूप से सामने आया। इसका नेतृत्व डॉ रामदयाल मुंडा ने संभाला। डॉ रामदयाल मुंडा सन 1980 में अमेरिका से 15 वर्ष अध्यापन कार्य करके रांची आए एवं रांची विश्वविद्यालय के उप कुलपति के पद पर आरुड हो गए। उन्होंने आदिवासी लोगों के संस्कृति के उत्थान के लिए सराहनीय कार्य किया। श्री मुंडा ने रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय भाषा विभाग खुलवाया। इनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। लोकप्रियता बढ़ने के साथ डॉ मुंडा के क्रियाकलापों पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा तथा विरोधी दलों ने इन्हें CIA(अमेरिकी गुप्तचर संस्था) का एजेंट भी कह डाला।

9 अगस्त 1995 को रांची में झारखंड क्षेत्र स्वायत्तशासी परिषद् का गठन हुआ। इस परिषद में बिहार के 18 जिलों को सम्मिलित किया गया। नए वनांचल राज्य के गठन संबंधी विवाद के परिपेक्ष्य में झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा राबड़ी देवी सरकार से समर्थन वापसी के पश्चात राज्य सरकार ने 17 सितंबर 1998 को झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद जैक को भंग कर दिया। जैक के गठन के पश्चात 7 वर्ष के कार्यकाल को बढ़ाया गया था। इसी बीच केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार आ गई और उसने अपने चुनाव पूर्व किए वायदे को राष्ट्रीय एजेंडे में रखवा कर पृथक राज्य के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।

अस्तु झारखंड लंबी प्रसव पीड़ा के बाद 28 वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आ गया है। बावजूद इसके बिहार में झारखंड आंदोलन का प्रादुर्भाव जिन समकालीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में हुआ था। यह परिस्थितियां आज भी उसी विष-वृक्ष के रूप में विकसित है, पल्लवित एवं पुष्पित हो रही है। नए राज्य को इन तमाम समस्याओं से जूझना होगा। एक नई समस्या राजनीतिक अस्थिरता की है जो झारखंड के अस्तित्व में आने के साथ ही प्रारंभ हो गई है। शिबू सोरेन मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार थे।  यह क्षेत्र अशिक्षा, उग्रवाद, उपेक्षा में लालटेन युग का पर्याय है।

यद्यपि इसके प्रथम मुख्यमंत्री होने का असर यह प्राप्त किए बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि माओवादी कम्युनिटी सेंटर(MCC) व पीपुल्स वार ग्रुप(PWG) जैसे अति वामपंथी संगठनों से बातचीत करने की जरूरत है। मरांडी के अनुसार झारखंड के 18 में से 14 जिले उग्रवाद से प्रभावित है और उन क्षेत्रों में समांतर सरकार चल रही है। झारखंड के गठन के बाद श्री मरांडी ने कहा है कि प्रशासनिक मोर्चे पर नक्सलवाद को रोकना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। उन्होंने कहा है कि उनकी प्राथमिकता सूची में शिक्षा संचार मानव संसाधन विकास और बिजली भी शामिल है और उनकी सरकार औद्योगिक विकास के लिए राज्य सरकार के बाहर से निवेश जुटाने का प्रयास करेगी।

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