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मार्किंग एवं मार्किंग टूल्स की जानकारी

आज इस आर्टिकल में हम आपको मार्किंग एवं मार्किंग टूल्स की जानकारी के बारे में बताने जा रहे है.

मार्किंग एवं मार्किंग टूल्स की जानकारी

मार्किंग

बाजार में उपलब्ध मूल कच्चे पदार्थ को उपयोगी वस्तु में बदलने के लिए उसको विभिन्न स्थानों पर कटिंग करके धातु को हटाया जाता है। धातु को हटाने से पहले बेसिक स्टॉक पर मार्किंग ली जाती है। जिससे यह मालूम हो जाए कि किस भाग से कितनी धातु को हटाना है। इसके लिए वस्तु की ड्राइंग के अनुसार कार्य खंड पर केंद्र बिंदु, केंद्र रेखा, बाउंड्री लाइन आदी खींच ली जाती है। इसी कार्य को मार्किंग करना कहते हैं फिटर का मुख्य कार्य पदार्थ मार्किंग करना होता है। मार्किंग इतनी अधिक यथार्थ होगी, जो भी उतना ही अच्छा वह यथार्थ बनेगा तथा उसके रिजेक्ट होने की संभावना भी उतनी ही कम रह जाएगी। वास्तव में मार्किंग निम्न देशों के लिए की जाती है-

  • मार्किंग होने के पश्चात जॉब को बार-बार नापने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
  • मार्किंग से समय की बचत होती है।
  • मार्किंग की रेखाएं कारीगर को गाइड करने का काम करती है।
  • जॉब को रिजेक्ट होने से बचाया जा सकता है।
  • मार्किंग होने से यह ज्ञान बना रहता है कि कब कौन सी प्रक्रिया करनी है.

मार्किंग करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए

  • मार्किंग शुरू करने से पहले ड्राइंग को भलीभांति पढ़ लेना चाहिए तथा समझ लेना चाहिए।
  • प्रारंभ में कोई संदर्भ बिन्दु या संदर्भ रेखा का नियत करने के बाद ही मार्किंग शुरू करें।
  • मार्किंग हल या स्क्राइबर नुकीला व कठोर होना चाहिए जिससे पतली व स्पष्ट रेखा अंकित हो।
  • ड्राइंग के अनुरूप व माप के अनुसार मार्किंग टूल्स का चुनाव करना चाहिए।
  • मार्किंग को पक्का करने से पहले एक बार दोबारा से चेक कर लेना चाहिए।
  • सेंटर पंच से निशान इस प्रकार लगाना चाहिए कि मार्किंग भी स्पष्ट से दिखाई देती रहे।
  • बिंदु ठीक लाइन पर तथा बराबर दूरी पर लगाते रहना चाहिए।
  • बिंदु लगाते समय पंचकोट ठीक लंबवत रखना चाहिए तथा बिंदुओं की गहराई समान होनी चाहिए।

विभिन्न प्रकार के मार्किंग मीडिया

धातु पर खींची गई लाइनें ठीक से दिखाई नहीं देती, इसके लिए जॉब पर कोई मार्किंग मीडिया लगा लिया जाता है। मार्किंग मीडिया कई प्रकार का होता है जैसे-

  • सफेद रंगाई
  • पार्शियन ब्लू
  • तूतिया
  • ले-आउट मीडिया

सफेद रंगाई

जॉब की सतह पर सफेद रंग की पुताई करने के लिए कई प्रकार के घोल बनाए जाते हैं।

  • साधारण ब्लैक बोर्ड का चोक में पानी में घोल।
  • साधारण चौक का मिथाईलेटेड स्पिरिट में घोल।
  • सफेद लेड पाउडर का तारा पिन के तेल में घोल।

यह सबसे अधिक प्रयोग में आने वाला मार्किंग मीडिया है। इसका प्रयोग, कास्टिंग या फोर्जिंग की गई सतहो पर मार्किंग करने के लिए किया जाता है। सूखने पर सतहों पर सफेद लेप चिपका जाता है। जब स्क्राइबर मार्किंग करते हैं तो यह लेख छूटता है तथा स्क्राइबर की खींची गई लाइन स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। इसके द्वारा लेप की मोटी सतह बनाई जाती है जिसके कारण यह मशीन कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं है। पानी में बने गोल को लोहे पर प्रयोग करने से उस पर जंग लग जाती है। अंत स्पिरिट या तारपीन तेल में बने घोल प्रयोग करने चाहिए।

पार्शियन ब्लू

इसका प्रयोग मशीनिंग की गई सतहों पर किया जाता है। पार्शियन ब्लू की बहुत बारीक परत जॉब की सतह पर फैलती है, अत: इसके द्वारा प्राप्त मार्किंग बहुत स्पष्ट तथा एक्यूरेट होती है। परंतु इसके लेप को सूखने में बहुत अधिक समय लगता है।

तूतिया

नीला थोथा को पानी में घुलने पर एक नीले रंग का घोल प्राप्त होता है। इसको अधिक क्रियाशील बनाने के लिए इसमें कुछ बूंदे सल्फ्यूरिक एसिड को मिला ली जाती है। इस घोल को मार्किंग की सतह पर लगाने से यह सतह को कापर के रंग में बदल देता है। इसका प्रयोग केवल स्टील के जॉब के लिए किया जाता है। इस पर बहुत सही मार्किंग की जा सकती है। इसका प्रयोग परिष्कृत सतहों पर मार्किंग के लिए किया जाता है। यह लेख लगाने से पहले सतहों से ग्रीस, ऑयला आदि साफ कर देना चाहिए।

ले-आउट डाई

यह एक प्रकार की नीले रंग की स्याही (व्यावसायिक रूप से बाजार में कई रंगों से उपलब्ध) होती है जिसे धातु की सतह पर आसानी से फैला दिया जाता है। यह जल्दी ही सूख जाती है। इस पर मार्किंग बहुत साफ-सुथरी होती है। ले- आउट डाई लगाने से पहले से सतह को साफ कर लेना चाहिए। यह मार्किंग मीडिया भी परिष्कृत सतहों पर प्रयोग किया जाता है।

विभिन्न मार्किंग टूल्स

मार्किंग करना एक जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए विभिन्न प्रकार के औजारों का प्रयोग किया जाता है। यह औजार निम्नलिखित है –

  • मार्किंग ऑफ टेबल
  • सरफेस प्लेट
  • एंगल प्लेट
  • बी ब्लॉक
  • स्क्राइबर
  • ट्रेमल
  • जेनी केलीपर्स
  • स्क्रेच गेज
  • सर्फेस गेज
  • कंबीनेशन सेट
  • पंच
  • पेरेलल ब्लॉक

सर्फेस प्लेट

यह मार्किंग टेबल की तरह कास्ट आयरन की ढली हुई प्लेट होती है जिसे किसी मेज पर रखकर प्रयोग किया जाता है। सर्फेस प्लेट कई साइजों में उपलब्ध रहती है परंतु साधारणत: 50 X 50 सेमी2  तथा 100 X 100 सेमी2 की प्लेटें प्रयोग में लाई जाती है। इसकी मोटाई 2.5 से 7.5 तक हो सकती है। कई अधातुओ से बनी सर्फेस प्लेट भी प्रयोग की जाती है। सर्फेस प्ले स्टोर को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-

  • सर्फेस प्लेट के पदार्थ के आधार पर।
  • सर्फेस प्लेट की उपयोगिता के आधार पर।

सर्फेस प्लेट के पदार्थ के आधार पर

सर्फेस प्लेट में प्रयोग किए गए पदार्थ के अनुसार यह तीन प्रकार की होती है-

  • कास्ट आयरन की सर्फेस प्लेट
  • ग्रेनाइट की सर्फेस प्लेट
  • ग्लास सर्फेस प्लेट

सर्फेस प्लेट की उपयोगिता

सर्फेस प्लेट को निम्न कार्यों के लिए प्रयोग में लाया जाता है।

  • सर्फेस प्लेट पर जॉब रखकर, हाइट गेज, या मार्किंग ब्लॉक की सहायता से विभिन्न ऊंचाइयों पर समांतर लाइन खींच सकते हैं।
  • सर्फेस प्लेट पर दो V ब्लॉक रखकर उन पर किसी, बेलना कार जॉब को रखकर उसका केंद्र ज्ञात किया जा सकता है।
  • सर्फेस प्लेट पर जॉब को रखकर डायल इंडिकेटर के द्वारा ट्रेलर होबसन टेलीसर्फ के द्वारा सतह परिष्कृतता की जांच की जा सकती है।
  • साइन बार के द्वारा जॉब के किसी कोण को सही जांच करने के लिए सर्फेस प्लेट का प्रयोग किया जाता है।
  • समतलता कि परख करने के लिए सर्फेस प्लेट पर पार्शियन ब्लू या सिंदूर की पतली सी परत लगाकर उस पर जॉब की जांच करने वाली सतह को हल्के से रगड़ा जाता है। जहां पर रंग लगता है वह भाग ऊंचा होता है जहां पर रंग नहीं लगता, वह भाग नीचा होता है। क्षमता बढ़ाने के लिए स्क्रैप द्वारा ऊंचे भाग को छीलकर स्क्रैप कर दिया जाता है तथा पुनः रंग का निशान लिया जाता है।

सावधानियां

  • सर्फेस प्लेट को हमेशा साफ व ढक कर रखना चाहिए।
  • सर्फेस प्लेट पर अनावश्यक औजार वगैरह नहीं रखनी चाहिए।
  • कार्य प्रारंभ करने से पहले प्लेट पर लगे तेल को साफ कर देना चाहिए।
  • कार्य समाप्त करने पर पुनः तेल लगाकर ढक कर रख देना चाहिए।
  • जहां तक संभव हो सर्फेस प्लेट पर पंच द्वारा पक्की मार्किंग नहीं करनी चाहिए।
  • गरम जॉब को सर्फेस प्लेट पर नहीं रखना चाहिए।

एंगील प्लेट

जॉब को किसी विशेष एगिलों पर सहारा देने के लिए बनाई गई कास्ट आयरन की प्लेट होती है। इसकी बाहर की दो सतहों को अच्छी परिष्कृतता देकर तैयार किया जाता है। जॉब को इन पर सहराने के लिए आयताकार खान से बनाए गए होते हैं। जॉब को नट बोल्ट की सहायता से एंगील प्लेट पर क्लैम्प किया जाता है। इसका साइज लंबाई x चौड़ाई x मोटाई से दिया जाता है। एंगिल प्लेट तीन प्रकार की होती है-

  • फिक्सड एंगील प्लेट
  • एडजेस्टेबल एंगिल प्लेट
  • बॉक्स एंगिल प्लेट

डिवाइडर

माइल्ड स्टील या हाई कार्बन स्टील का प्रकार के समान दो टांगों वाला मार्किंग इंस्ट्रूमेंट है। इसकी दोनो टांगे समान लंबाई की तथा नुकीली होती है। हाई कार्बन स्टील को क्मपास हार्ड तथा टेंपर किया आता है जबकि माइल्ड स्टील के कंपास को केस हार्ड किया जाता है। इसका साइज दोनों टांगों के जोड़े से नुकीले पॉइंट तक की लंबाई द्वारा किया जाता है। बाजार में यह 100 से 150 सर 200 मिमी की लंबाई में उपलब्ध है। विशेष कार्यो के लिए यह अधिक लंबाई के भी बनाए जा सकते हैं। इसका प्रयोग स्टील रूल में कोई माप लेने के लिए किया जाता है। मार्किंग करते समय दूरी का विभाजन करने के लिए भी डिवाइडर का उपयोग किया जाता है। डिवाइडर को नुकीला बनाने के लिए आयल स्टोन का उपयोग में लाना चाहिए। ग्राइंडर पर नुकीला बनाने से गर्म होने के कारण इनकी हार्डनेस समाप्त हो जाती है.

  • रीबिट टाइप डिवाइडर
  • सपरिंग टाइप डिवाइडर

सावधानियां

  • कार्य के पश्चात इसको हल्का का तेल लगा कर रखना चाहिए।
  • ट्मल को अन्य माप यंत्रों के साथ रखना चाहिए।
  • नीचे गिरने से बचाना चाहिए।
  • एक स्लाइडिंग हेड को एक स्थान पर स्थित करके दूसरे को खिसकाकर ट्रेमल में दूरी भरनी चाहिए।
  • इसको कठोर सतहों पर प्रयोग नहीं करना चाहिए।

जैनी कैलिपर्स

जैनी कैलिपर्स समांतर लाइनें खींचने या बेलनाकर वस्तुओं के सेंटर ज्ञात करने के काम में लाया जाता है। इसको ओड लेग हर्माफ्रोडाइड के नाम से भी जाना जाता है। यह डिवाइडर के समान ही एक यंत्र होता है जिसकी एक टांग सीधी होती है तथा वह मारकर का कार्य करती है। इसकी दूसरी टांग लगभग 5 मिमी अंदर की ओर मोड़ दी जाती है। यह टांग किसी सतह का अनुसरण करती है। यह दो प्रकार के होते हैं-

  • बैंट लेग टाइप जैनी कैलिपर्स
  • हिल टाइप जेनी कैलिपर्स

पंच

स्क्राइबर से खींची गई लाइनें जॉब से मिल सकती है इसलिए लाइनों पर 2.5 मिमी की दूरी पर पंच की सहायता से बिंदु लगा दिए जाते हैं। इस प्रकार पात्र द्वारा लगाए गए बिंदुओं से बनी लाइन को सताई मार्किंग कहते हैं। यह मार्किंग जॉब को बार बार छूने या विभिन्न यांत्रिक क्रियाओं से मिट नहीं पाती। आस्थाई मार्किंग को स्थाई बनाने के लिए जो टूल प्रयोग किया जाता है उसे पंच कहते हैं। तथा इस प्रक्रिया को पंचिंग कहते हैं। पंच साधारणत: का हाई कार्बन स्टील के बनाए जाते हैं। इसके 3 भाग होते हैं- जहां हैमरे चोट मारते हैं, उसे हेड कहते हैं, यह फ्लैट होता है। जिस भाग से बिंदु बनाते हैं, उसे पॉइंट कहते हैं। यह भाग 9 किला तथा हार्डवेयर टेंपर किया गया होता है। बीच के भाग को बॉडी कहते हैं, यह भाग नर्लिंग किया हुआ बेलना कार या षट्भुजकार होता है।पंच नों प्रकार के होते हैं।

  • डांट पंच
  • सेंटर पंच
  • प्रीक पंच
  • पिन  पंच
  • ड्रिफ्ट पंच
  • बेल पंच
  • ऑटोमेटिक पंच
  • सॉलिड पंच
  • होलो पंच

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