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मध्य प्रदेश में पंचायत राज से जुडी जानकारी


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73वें संविधान संशोधन के अनुरूप 29 दिसंबर 1993 को मध्यप्रदेश विधानसभा में मध्य प्रदेश विधानसभा में मध्य प्रदेश पंचायत राज 1993 विधेयक प्रस्तुत किया गया 30 दिसंबर 1993 को मध्य प्रदेश विधानसभा ने इस विधेयक को पारित कर दिया.  19 जनवरी 1993 को मध्य प्रदेश निर्वाचन आयोग का गठन किया गया.  25 जनवरी 1994 को मध्यप्रदेश पंचायत राज अधिनियम स्थापित किया गया.

मध्यप्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत आम निर्वाचन 2009-10 की निर्वाचन प्रक्रिया 26 दिसंबर 2009 से आरंभ की गई है. यह निर्वाचन 18 जनवरी, 21 जनवरी तथा 24 जनवरी 2010 को संपन्न कराया गया.  राज्य में 13 जनपद पंचायत तथा 2,306 ग्राम पंचायतें हैं. पंचायतों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति पिछड़ा वर्ग तथा महिलाओं के आरक्षण की व्यवस्था है. इसके अनुसार पंचायत संस्थाओं में अनुसूचित वर्गों के लिए 50% या उससे कम सीटें तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 25% सीटें आरक्षित हैं.

राज्य में कुल 51 जिला पंचायतें हैं पंच, सरपंच, जनपद, ऐसे में जिला पंचायत सदस्य के लिए सीधा चुनाव किया जाता है, किन्तु ग्राम पंचायत के उप-सरपंच एवं जनपद तथा जिला पंचायत के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष निर्वाचित सदस्यों में से उन्हीं के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव किया जाता है.  प्रत्येक ग्राम सभा के लिए पंचायत जिसमें आबादी के अनुसार कम से कम 10 और अधिक से अधिक 20 सदस्य होंगे।

जनपद पंचायत विकासखंड स्तर पर जिसमें कम से कम और अधिक से आबादी होने पर 25 सदस्य तक हो सकते हैं। जिला छतरपुर जिला पंचायत के अंतर्गत सदस्य संख्या आबादी के अनुसार 10 से 35 हो सकती है। लोकसभा तथा राज्यसभा के सदस्य जनपद पंचायत और जिला पंचायतों के सदस्य होंगे। प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष होगा। पंचायत भी घटित होने की स्थिति में शेष कार्यकाल के लिए नई पंचायत का गठन आवश्यक है। 2 अक्टूबर 1993 के नवीन पंचायत राज व्यवस्था को व्यापक अधिकारों सहित लागू कर दिया गया है।

ग्राम पंचायतें अपने क्षेत्र के सर्वागीण विकास के लिए जिम्मेदार रहेगी, ग्रामीण रोजगार की सभी योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी रखने के उत्तरदायित्व भी ग्राम पंचायत का है. कृषि विभाग व् बागवानी के विकास की योजनाओं के द्वारा अपने क्षेत्र उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ाने की जिम्मेदारी भी पंचायतों को सौंपी गई है।

जनपद पंचायतों से यह अपेक्षा की गई है कि वह अपने क्षेत्र के सर्वागीण विकास के लिए संबंधित योजनाएं ग्रामपंचायती के माध्यम से बनाकर उसका क्रियान्वयन कराएगी। एकीकृत ग्रामीण विकास योजना, ट्राईसेम तथा ग्रामीण रोजगार की योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी की जिम्मेदारी भी जनपद पंचायतों की ही है।

जिला पंचायतों को अधिकार संपन्न हुए यह अपेक्षा की गई है कि जिला सत्र प्रशासन की इकाई के रूप में कार्य करेगी। जनपद पंचायतों की योजनाओं को समन्वित तथा समेकित कर पूरे जिले के सर्वागीण विकास व उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि करने का उत्तरदायित्व भी जिला पंचायतों का है। विभिन्न प्रभावी विकास योजनाओं का क्रियान्वयन भी जिला पंचायतों के माध्यम से किया जाएगा।

मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में 15 जुलाई से 30 जुलाई 1998 तक शिक्षा पंचायतों का आयोजन किया गया। यह शिक्षा पंचायती प्रदेश में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे हैं महिला शिक्षा अभियान के दूसरे चरण के अंतर्गत आयोजित की गई है। नरसिंहपुर जिले की इमलिया बाँसादेही ग्राम पंचायत की सरपंच अनुसूचित जाति की जीजा बाई सरपंच बनते ही सबसे पहले गांव का स्कूल बनाने के बारे में छोटा गांव के लोगों को श्रमदान के लिए प्रेरित कर और करीब ₹1,00,000 की लागत लगाकर उन्होंने स्कूल के तीन कमरे और एक बरामदा बनवा दिया।

पंचायती राज अधिनियम के संबंध में पारित 73वें संविधान संशोधन विधेयक अनुच्छेद 243 झ में प्रत्येक 5 वर्ष में पंचायतों की आर्थिक स्थिति की समीक्षा के लिए 1 वित्त आयोग की स्थापना का प्रावधान है। जुलाई 1994 में राज्य वित्त आयोग का गठन किया गया।  मध्य प्रदेश में जिला पंचायतों की अध्यक्ष पद हेतु विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण का कार्य भोपाल में 4 नवंबर 2004 को किया गया। विभिन्न दलों के जनप्रतिनिधियों में आयोजित पंचायत एवं सामाजिक न्याय की उपस्थिति में संपन्न इस प्रक्रिया में जिला पंचायतों के 7 पद अनुसूचित जाति के 12 अनुसूचित जनजाति के 12 पद अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित किए गए।

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