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नमक आंदोलन


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नमक आंदोलन

कांग्रेस ने सन 1929 के लाहौर अधिवेशन पूर्ण स्वाधीनता को अपना लक्ष्य घोषित किया था. गांधी ने एक ग्यारह सूत्री मांग पत्र वायसराय इरविन के सामने रखा उन्होंने इरविन से निराश होने के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया. उन्होंने साबरमती आश्रम से 12 मार्च, 1930 को प्रातः काल कुच की. उनके साथ कुल 78 सत्याग्रही थे. 24 दिन में 200 मील की यह महान यात्रा पूरी कर अच्छे अप्रैल को दांडि के समुद्र तट पर पहुंचे. उन्होंने नियत समय पर दांडी नमक उठाकर सर्वशक्तिमान ब्रिटिश साम्राज्य में कानून को तोड़कर उसे खुली चुनौती दे डाली. इस अवसर पर दुनिया भर के प्रेस रिपोर्टर उपस्थित थे. इन 24 दिनों तक केवल भारत ही नहीं पूरे विश्व की नजर गांधी पर टिकी रही थी.

गांधी द्वारा नमक का उल्लंघन होते ही पूरे देश में बिजली सी कौध गई. लोग स्थान स्थान पर नमक बना कर यह कानून तोड़ने लगे. गांधी के अहिंसक सत्याग्रह ने एक क्रांतिकारी रूप धारण कर लिया. पुलिस का दमन चक्र भी बढ़ता चला गया. कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. 5 मई को गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया. गांधी सहित कांग्रेस के सभी नेता 25 फरवरी, 1931 से को रिहा कर दिए गए.

गांधी व इरविंन के मध्य 4 मार्च, 1931 को समझौता हो गया. तत्पश्चात कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कराची में 31 मार्च को अत्यंत कूटतापूर्ण माहौल से प्रारंभ हुआ. भगत सिंह, राजगुरु, व सुखदेव को फांसी के केवल 6 दिन बाद प्रारंभ होने वाले इस सम्मेलन में गांधी की स्वागत गांधी विरोधी नारों के साथ किया गया. लेकिन, इस अधिवेशन में गांधी-इरविन संधि पर अपनी मुहर लगा दी.

भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों तथा कांग्रेस की आर्थिक नीतियों के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान करना कराची अधिवेशन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान था. इरविन के स्थान पर लोर्ड विलिंगडन अप्रैल 1930 को वह सराय का पद ग्रहण किया. लंदन में आयोजित होने वाले गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए 29 अगस्त को गांधी भारत से रवाना हो गए. इसी मध्य जवाहरलाल नेहरू ने इलाहाबाद में कर बंदी आंदोलन, प्रारंभ करने का निर्णय ले लिया था. इस समय तक जयप्रकाश नारायण और लाल बहादुर शास्त्री भी नेहरू के साथ जुड़े हुए थे. हालांकि, गांधी ने उन्हें फिलहाल इंतजार करने की हिदायत दे रखी थी तथा वल्लभभाई पटेल ने भी गांधी के भारत वापसी तक ऐसा करने से रोका था.

गांधी के वापस लौटने के 1 दिन पूर्व ही 26 दिसंबर को हुए गिरफ्तार किए जा चुके थे. गांधी ने वायसराय को अपनी गिरफ्तारी के 1 दिन पूर्व आंदोलन प्रारंभ करने कि मजबूरी से अवगत करा दिया था. इस बार जो आंदोलन प्रारंभ किया गया उसने अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग स्वरूप ग्रहण कर लिया करबंदी का आंदोलन संयुक्त प्रांत सा बिहार में चलाया गया. इसी प्रकार अन्य कई प्रांतों में भी आंदोलन प्रारंभ हो गए.

प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने इसी बीच ब्रिटिश सरकार की तरफ से सांप्रदायिक अधिनिर्णय अर्थात कम्युनल अवार्ड की घोषणा कर दी. इस घोषणा में दलितों (अछूतों) के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था की गई थी. यरवदा जेल में बंदी गांधी ने 20 सितंबर से इसके विरूद्ध आमरण अनशन की घोषणा कर दी, परंतु उन्होंने पृथक निर्वाचन को मुद्दा नहीं बनाया. उनका कहना था कि हिंदू जाति अपनी कटरता से बाज आए.

हिंदू नेताओं ने एक सम्मेलन किया जिसमें लगभग 100 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जिन्हें प्रमुख सप्रू, जयकर, राजगोपाल चारी, राजेंद्र प्रसाद, एम. सी. राज, डॉ आंबेडकर, सीतलवाड़, एन. एस. एनी., डॉ मुजे, पी बालू, और ए. वी. ठक्कर आदि थे. इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि किसी भी कीमत पर गांधी के जीवन की रक्षा करनी थी तथा अस्पृर्श्यता के धब्बे को मिटा देना था. गांधी 20 सितम्बर को अपना अनशन प्रारंभ कर दिया गांधी हरिजनों के लिए पृथक निर्वाचन के क्षेत्रों के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन के क्षेत्रों में ही अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहे थे. इस बार के अनशन में बहुत सुधार गांधी की हालात तेजी से गिरने लगी थी. उनकी हालत छह दिनों में ही एक मरणासन्न जैसी हो गई. अंत: में गांधी की जान बचाने के लिए हरिजनों के प्रतिनिधियों डॉक्टर अंबेडकर ने अपने पृथक निर्वाचन मांग छोड़ दी. 24 सितंबर, 1932 को यरवदा जेल के अंदर ही गांधी-अंबेडकर समझौता हुआ और 26 सितंबर को ब्रिटिश सरकार की कैबिनेट ने भी इस समझौते को अपनी मंजूरी देते हुए सांप्रदायिक अधिनियम की घोषणा वापस ले ली. यह सूचना प्राप्त होने के बाद गांधी ने अपना अनशन तोड़ दिया. गांधी ने पूना पैक्ट  या यरवदा पैकेट के नाम से प्रसिद्ध इस समझौते के बाद हिंदू समाज में छुआछूत की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने के लिए मंदिर प्रवेश का आंदोलन प्रारंभ कर दिया. इस आंदोलन के कारण सनातनी हिंदू वर्ग गांधी से काफी नाराज हो गया. गांधी जेल से छूटने के बाद राजनीति से अलग हो गए तथा अछूतोंधार जैसे सामाजिक कार्यों में लग गए. उन्होंने अपना सविनय अवज्ञा आंदोलन भी वापस ले लिया. वास्तव में गांधी कांग्रेस के अंदर बन चुके दक्षिणपंथी गुटों की आपसी खींचतान से अत्यंत खिन्न हो चुके थे. अक्टूबर, 1934 में तो इन्होंने कांग्रेस छोड़ने तक की घोषणा कर दी थी.


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