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कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी


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कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी

इस समय पूरी दुनिया में समाजवाद का दौर चल रहा था. सन 1917 की रूसी क्रांति के बाद मार्क्सवाद तथा लेनिनवाद का प्रभाव यूरोप सहित उपनिवेशवाद से ग्रसित समस्त देशों में युवा वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा था. इसके प्रभाव में कांग्रेस भी अछूती नहीं बची थी. नेहरू भी इस समय समाजवाद के रोमांस में आप्लावित थे. वे ब्रूसलेस में अंतरराष्ट्रीय दमित राष्ट्रीयता के सम्मेलन में फरवरी 1927, में शामिल हुए थे. अपने क्रांतिकारी और वामपंथी विचारों के कारण वह कांग्रेस के अंदर समाजवाद से प्रभावित युवा वर्ग के नेता बन चुके थे. इस बीच जयप्रकाश नारायण, फूलन प्रसाद वर्मा, तथा राहुल सांकृत्यायन के द्वारा जुलाई 1931 में बिहार सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की गई. इसका उद्देश्य भारत में एक ऐसे समाजवादी राज्य की स्थापना करना था जिसमें निजी संपत्ति के लिए न कोई स्थान था न भूमि व पुंजी पर व्यक्ति के स्वामित्व का.

इसी तर्ज पर प्रांत में समाजवादी दिलों की स्थापना संपूर्णानंद, परिपूर्णानंद, कमल पति त्रिपाठी तथा तारक भट्टाचार्य जी ने और युसूफ मेहर अली, एम. आर मसानी, अच्युत पटवर्धन तथा कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने मुंबई में जेल में बंद कांग्रेस के कई युवा समाजवादी ने कांग्रेस के अंदर सन 1933 में एक अखिल भारतीय समाज वादी संगठन बनाने का विचार किया. जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, एम. आर. मसानी, एन. जी. गोरे, अशोक मेहता, एस. एम. दूषित का एम. एल. दांतवाला इस विचार को प्रारंभ करने वाले में प्रमुख थे.

अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य संपूर्णानंद ने बनारस में अप्रैल 1934 मैं एक पर्चा लिखा तथा भारत के लिए एक प्रयोगिक समाजवादी दल निर्मित करने की आवश्यकता पर बल दिया. यह कांग्रेस में प्रभावशाली हो चुके पूंजीवादी और सामंतवादी तत्वों को चुनौती देने के लिए आवश्यकता था. इसमें यह बात भी स्पष्ट रूप से उल्लेखित थी कि जब समाजवादियों के हाथ में सता आएगी, उद्योगों, बैंकों में भूमि का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाएगा तथा जमीदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया जाएगा. कांग्रेस में समाजवादियों ने सन 1934 में, कांग्रेस के एक समूह के द्वारा विधान परिषद में प्रवेश का समर्थन करने के बाद कांग्रेस अलग दल बनाने का मन बना लिया. आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में पटना में 17 मई, 1934 को समाजवादियों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया. कांग्रेस के अंदर नए समाजवादी दल की स्थापना की आलोचना करते हुए आचार्य जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कांग्रेस समाजवादी दल की प्रसंगिकता को स्पष्ट किया. इस दल के सचिव की हैसियत से जयप्रकाश नारायण में अन्य प्रांतों में भी इसके प्रचार के लिए देश का दौरा प्रारंभ कर दिया.

21-22 अक्टूबर, 1934 को संपूर्णानंद की अध्यक्षता में मुंबई में कांग्रेस समाजवादी दल का प्रथम वार्षिक सम्मेलन हुआ. इसमें 13 प्रांतों के 150 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जयप्रकाश नारायण (मुख्य सचिव) एस. आर. मसानी, मोहनलाल गौतम, एनजी गोरे तथा ई. एम. एस. नंबूद्रीपाद (सहायक सचिव), आचार्य नरेंद्र देव, संपूर्णानंद, श्रीमती कमला चट्टोपाध्याय, पुरुषोत्तम दास, त्रिकक दास, पी.वी. देशपांडे, राम मनोहर लोहिया, एम. एस. जोशी अमरेंद्र प्रसाद मिश्रा, चार्ल्स मस्करीनास, नवकृष्ण चौधरी तथा अच्युत पटवर्धन, (सदस्य) निर्वाचित किए गए. इस सम्मेलन में दल का संविधान तथा कार्यक्रम भी तय किया गया. यद्यपि जवाहरलाल नेहरू तथा सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना का समर्थन किया, परंतु दोनों में से किसी ने इसकी सदस्यता भी ग्रहण की. कांग्रेस के दक्षिणपंथी गुट इसका जमकर विरोध किया वल्लभ भाई पटेल ने इसे मूर्खतापूर्ण कार्य बताया.

कृषको मजदूरों और छात्रों को आकर्षण कांग्रेस समाजवादी आंदोलन के प्रति तेजी से बढ़ने लगा. लखनऊ में सन 1936 में, प्रो० एन. जी. रंगा, इंदूलाल याग्निक, स्वामी सहजानंद आदि के प्रयासों से अखिल भारतीय किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया. इस सम्मेलन में सामंतवाद के उन्मुलन तथा लगान और कर्ज के छुट की मांग रखी गई. इस प्रकार कांग्रेस के अंदर समाजवाद के प्रति आस्था रखने वालों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी. इसके साथ ही स्पष्ट रूप से कांग्रेस वामपंथी और दक्षिणपंथी गुटों में लामबंद होने लगी. वामपंथियों का नेतृत्व यदि  नेहरू कर रहे थे तो दक्षिणपंथीयों का पटेल. गांधी यद्यपि समाजवादियों की मार्क्सवादी और लेनिनवादी रुझान के कारण उनकी आलोचना कर रहे थे, परंतु वह दक्षिणपंथियों के साथ भी नहीं थे. यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दे देना ही उचित समझा था.

ब्रिटिश संसद ने इसी बीच 2 अगस्त, 1935 को अधिनियम को मंजूरी दे दी. यद्यपि कांग्रेस ने सर्वसम्मति से इस अधिनियम को खारिज कर दिया, परंतु अब यह स्पष्ट हो चुका था कि कांग्रेस का दक्षिणपंथी गुट इसके अंतर्गत पदों को स्वीकार करने का मन बना बैठा था. जबकि कांग्रेस का वामपंथी गुट समाजवादियों के नेतृत्व में इस अधिनियम के विरोध आंदोलन चलाने तक ही बात कर रहा था. इसका वार्षिक सम्मेलन कांग्रेस के इसी गुट बंदी के दौर में अप्रैल, 1936 में लखनऊ में हुआ यद्यपि सन 1935 के अधिनियम में की जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में संपन्न इस सम्मेलन में कड़ी आलोचना की गई, परंतु इसके अंतर्गत चुनाव में हिस्सा लेने के बाद को भी इस ने स्वीकार कर लिया. कांग्रेस के अंदर समाजवादियों की यह एक करारी हार थी.


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