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उत्तर प्रदेश 1937 का प्रांतीय मंत्री मंडल


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उत्तर प्रदेश 1937 का प्रांतीय मंत्री मंडल

27-28 दिसंबर, 1936 को फैजपुर (महाराष्ट्र) में कांग्रेस का 50 वां वार्षिक अधिवेशन संपन्न हुआ. एक बार फिर जवाहरलाल नेहरू को ही इस अधिवेशन के लिए अध्यक्ष निर्वाचित किया गया. इसमें कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र स्वीकार किया गया. लखनऊ के सम्मेलन के बाद ही चुनाव प्रचार प्रारंभ हो गया था. कांग्रेस को जनवरी, 1937 में संपन्न प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव में भारी सफलता हाथ लगी. कांग्रेस ने सभी प्रांतों के कुल 1,585 स्थानों में से 714 पर विजय प्राप्त कर ली. कांग्रेस को संयुक्त प्रांत के कुल 228 में से 134 स्थानों पर सफलता हाथ लगी. इन 228 स्थानों में 64 मुस्लिम और 164 सामान्य (24 विशेष) स्थान थे.

भारतीय प्रांतों में सन 1935 के अधिनियम के अंतर्गत संवैधानिक योजना को 1 अप्रैल 1937 तक लागू कर देना था. तत्कालीन संवैधानिक प्रावधानों में शामिल गवर्नर के अपार अधिकारों का विरोध कर रही कांग्रेस से सरकार बनाने को तैयार नहीं थी. इसलिए 1 अप्रैल को ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेसी बहुमत वाले प्रांतों में अल्पमत की सरकारों का गठन कर दिया. नवाब छतारी के नेतृत्व में संयुक्त प्रांत के राज्यपाल सर हैरी हेग यहां भी एक अल्पमत की सरकार का गठन कर दिया. सलेमपुर के राजा भी इस मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री के रूप में शामिल थे. अंत में गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनालिथगो ने 22 जून को एक समझौतापरक, परंतु अस्पष्ट वक्तत्य देकर कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए राजी कर लिया.

चुनाव के पूर्व से ही संयुक्त प्रांत में इस प्रकार की संभावना बनने लगी थी कि यहां कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग की मिली-जुली सरकार बन सकती है. हालांकि औपचारिक रूप से ऐसा कुछ तय नहीं हुआ था, परंतु कांग्रेस ने किसी भी प्रकार के गठबंधन की संभावना को चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद पूरी तरह नकार दिया. यद्यपि संयुक्त प्रांत में मोहनलाल सकसेना जैसे कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता अभी भी मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन के पक्षधर थे, परंतु जवाहरलाल नेहरू इसके बिलकुल विरुद्ध थे. संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग के सुप्रसिद्ध के प्रभावशाली नेता चौधरी खलीकुजमा नेहरू से मिलने 12 मई 1937 को इलाहाबाद भी गए. भारत के हिंदू मुस्लिम समस्या के पीछे चंद पढ़े-लिखे सामंती मुसलमानों का हाथ बताते हुए नेहरू ने मुसलमानों के लिए किसी अन्य दल की आवश्यकता को पूरी तरह नकार दिया था. इस मध्य जून 1937 में झांसी से निर्वाचित के. बी. हबीबुल्ला की मृत्यु के बाद वहां जो उप-चुनाव हुआ, उसमें जमीयत-उल-उलेमा के विरोध के बावजूद मुस्लिम लीग के मध्य दूरी और अधिक बढ़ गई थी.

कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक 22 जून को गवर्नर जनरल द्वारा दिए गए वक्तव्य के बाद जुलाई को वर्धा में संपन्न हुई, जिस में कांग्रेस ने सरकार बनाने का निर्णय कर लिया. गोविंद बल्लभ पंत ने इस बैठक में जाते समय लखनऊ में रुककर चौधरी खलीकुजमा से मुलाकात की तथा यह पूछा कि यदि कांग्रेस मुस्लिम लीग के गठबंधन से सरकार बनाती है तो वह कैबिनेट में कितने स्थान का दावा करेंगे, चौधरी ने जवाब दिया 9 में से 3 या 6 में से दो अर्थ और कुल संख्या का एक तिहाई.

मौलाना आजाद वर्धा में कार्यकारिणी की बैठक के बाद लखनऊ आए और 12 जुलाई के चौधरी खलीकुजमा से मिले. उन्होंने चौधरी से गठबंधन सरकार शामिल होने वाले दूसरे सदस्य के बारे में बात की. चौधरी ने बताया कि वह नवाब इस्माइल खां होंगे. 15 जुलाई को मौलाना और गोविंद बल्लभ पंत दोनों चौधरी से मिले, उन्होंने चौधरी से इस वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने को कहा, जिसमें लिखा था कि सयुंक्त प्रांत विधानसभा में मुस्लिम लीग एक अलग गुट के रूप में कार्य करेगा. चौधरी ने उस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य पड़ी इस दरार ने आगे चलकर एक विकराल रूप ले लिया, जिसका परिणाम बाद में भारत विभाजन के रूप में सामने आया.

अंत में संयुक्त प्रांत में कांग्रेस ने अकेले ही सरकार बनाई. इस सरकार में प्रधानमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के साथ रफी अहमद किदवई, कैलाश नाथ काटजू, श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित, प्यारे लाल शर्मा तथा मोहम्मद, इब्राहिम शामिल थे. लक्ष्मीनारायण को संसदीय सचिव बनाया गया. इस प्रकार कांग्रेस की सरकार ने संयुक्त प्रांत में जुलाई के दूसरे सप्ताह में कार्य करना प्रारंभ कर दिया. कांग्रेस कार्यसमिति ने अपनी वर्धा बैठक 23 फरवरी से 1 मार्च, 1937 में कांग्रेस मंत्री मंडलों के लिए एक 14 सूत्री कार्य प्रचार संहिता का निर्माण किया था इसके साथ ही गांधी, हरिजन में अपने कर्तव्यों के द्वारा समय-समय पर इन्हें निर्देश दिया करते थे.

सन 1935 के अधिनियम के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करना कांग्रेस सरकारों का सबसे पहला उत्तरदायित्व था. जिनके अंतर्गत सौरभ इन सरकारों की स्थापना हुई थी. यह प्रस्ताव संयुक्त प्रांत में स्थानीय निकाय मंत्री समिति विजयलक्ष्मी ने 2 दिसंबर, 1033 को विधानसभा को रखा. प्रधानमंत्री पंत ने 2 अक्टूबर को इस विषय पर होने वाली बहस से सभी संशोधनों का जवाब दिया, जिसमें एक संशोधन मुस्लिम लीग ने भी रखा था. अपने मूल रूप से यह प्रस्ताव उसी दिन पारित हो गया. कोलकाता में संपन्न 29-31 अक्टूबर, 1937 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में यह प्रस्ताव पारित किया गया था. की सभी कांग्रेस प्रांतों में 1935 के अधिनियम में प्रस्तावित संज्ञा योजना के विरुद्ध प्रस्ताव पारित होना चाहिए. संयुक्त प्रांत में भी इस प्रस्ताव के अनुरूप 20 फरवरी, 1938 से को एक प्रस्ताव पारित किया गया.

कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र के अनुरूप राजनीतिक बंदियों की रिहाई प्रारंभ की गई परंतु इस प्रश्न को लेकर संयुक्त प्रांत तथा बिहार में समस्या उत्पन्न हो गई. फरवरी, 1938 तक संयुक्त प्रांत में अभी भी फरवरी 1938 तक 15 राजनीतिक बंदियों का मामला विचाराधीन था. इनकी रिहाई के पूर्व इन दोनों प्रांतों के राज्यपाल यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि प्रांत की शांति व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा. 1935 के अधिनियम की धारा 126 के अंतर्गत गवर्नर जनरल ने भी राज्यपालों को निर्देश दिया कि वह किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे आत्मसमर्पण ना करें, सभी बंदियों को एक साथ ही रिहा करने के अपने अधिकार इन दोनों प्रांतों के प्रधानमंत्रियों ने जो दिया जिसे राज्यपालों ने नहीं माना और इन दोनों ही मंत्री मंडलों ने त्यागपत्र दे दिया.

जब 19-21 फरवरी, 1938 को हरिपुरा में कांग्रेस का 51 वां अधिवेशन चल रहा था. उस समय यह संकट सामने आया. इन दोनों ही मंत्रिमंडल के निर्णय को कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया. सरकार के इस रवैए के विरुद्ध गांधी ने एक वक्तव्य भी जारी किया. गवर्नर ने 22 फरवरी को अपनी स्थिति साफ करते हुए एक वक्तव्य जारी किया, जिसके बाद संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री 23-24 फरवरी को राज्यपाल से मिलकर इस संकट के समय समझौतापरक पर विचार किया. दोनों पक्षों ने मिलजुल कर एक स्वस्थ परंपरा निर्मित करने की आवश्यकता पर जोर दिया. इस प्रकार यह संकट किसी प्रकार टल सका और अंत में मार्च 1938 तक सभी राजनीति के बंदी रिहा कर दिए गए.

अक्टूबर 1939 में संयुक्त प्रांत की सरकार ने एक विस्तृत अधिनियम के द्वारा काश्तकारों की समस्याओं के समाधान का प्रयास किया. आगरा और अवध क्षेत्रों के भूमि धारी अधिकारों में इस अधिनियम के द्वारा समरूपता लाने का प्रयास किया गया. प्रांत में कुटीर उद्योग के विकास की नीवं रखने के लिए भी इस सरकार ने कुछ कदम उठाया ये गांधी के घोषित आदेशों के अनुरूप प्रांत में मध्य निषेध लागू करने के लिए सर्वप्रथम 1 अप्रैल, 1938 को एटा व मैनपुरी जिलों को चुना गया. इसके साथ ही जौनपुर, बिजनौर, इलाहाबाद का लखनऊ में आबकारी विभाग के अंतर्गत कर दिया गया. हालांकि मध-निषेध की यह नीति पूरी तरह असफल सिद्ध हुई तथा बेसिक शिक्षा के क्षेत्र में किए जाने वाले तंत्र प्रयास भी सफल ना हो सके. इस सरकार ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काशी विद्यापीठ है तथा जामिया मिलिया की उपाधियों को अन्य विश्वविद्यालय के स्नातक उपाधि के समकक्ष मान्यता प्रदान कर.

कांग्रेस के दो वार्षिक अधिवेशन सन 1937 से 1939 के मध्य कांग्रेस प्रशासन के दौरान हरिपुरा (गुजरात) तथा त्रिपुरी (मध्य प्रांत) में हुए. सुभाष चंद्र बोस ने 19 से 21 फरवरी, 1938 को संपन्न हरिपुरा के 51 वे अधिवेशन की अध्यक्षता की थी. कांग्रेस के लिए मार्च, 1939 में होने वाले अगले अधिवेशन के लिए अध्यक्ष का चुनाव करना एक बहुत बड़े संकट के रूप में सामने आया. कांग्रेस का दक्षिणपंथी सुभाष चंद्र बोस के पुननिर्वाचन का विरोधी था. इस गुट ने पटाभी सीतारमैया को अपना प्रत्याशी बनाया था, जबकि बोस इस पद पर किसी ऐसे व्यक्ति को चाहते थे जो 2 सन 1935 के अधिनियम में प्रस्तावित संज्ञा योजना का विरोधी हो. अपने पुननिर्वाचन का विरोध होने पर उन्होंने आचार्य नरेंद्र देव का नाम इस पद के लिए सुझाया था, परंतु नेहरू ने अपनी तरफ से मौलाना आजाद का नाम गांधी को सुझाव दिया था. बाद में मौलाना ने अपना नाम वापस ले लिया तो बोस व पट्टाभी सीतारमैया के मध्य चुनाव हुआ.

29 जनवरी. 1939 के चुनाव में बोस को 1850 तथा पट्टाभी सीतारमैया को को 1270 मत प्राप्त हुए. कार्य समिति के 15 में से 12 सदस्यों ने बोस के निर्वाचित होने के बाद त्याग पत्र दे दिया. नेहरू ने अपना त्यागपत्र अलग से दे दिया. त्रिपुरी में 10 मार्च 1939 को अधिवेशन प्रारंभ हुआ. गांधी राजकोट के आंदोलन में व्यस्त होने के कारण यहां नहीं आ सके थे. अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस बीमार थे. ऐसे में गांधी की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर तथा बिना उन्हें बताएं यह प्रस्ताव पारित कर दिया गया कि वह अपनी कार्य समिति के सदस्यों का चुनाव गांधी की इच्छा अनुसार ही करें. इस प्रस्ताव ने ही बोस द्वारा कांग्रेस को त्यागने की भूमिका लिखी. संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री पनत ने यह प्रस्ताव रखा था. बोस अपनी कार्य समिति का चुनाव करने में असमर्थ रहे क्योंकि गांधी ने उन पर अपनी राय देने से मना कर दिया था. फलस्वरुप बोस के पास त्यागपत्र के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा था.

जर्मनी ने 1 सितंबर, 1939 को पोलैंड पर आक्रमण कर दिया. इसके साथ ही जर्मनी के विरुद्ध ब्रिटेन ने युद्ध की घोषणा कर दी. राय लीनलीथिगो ने एक उद्घोषणा में यूरोप में युद्ध प्रारंभ होते ही भारत को भी इसमें शामिल कर लिया. उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल से इस घोषणा के पूर्व कोई सलाह तक नहीं ली थी. वायसराय ने 5 सितंबर को गांधी से मुलाकात की. गांधी ने व्यक्तिगत रूप से मित्र राष्ट्रों के प्रति अपनी सहानुभूति दिखाई, परंतु कांग्रेस की तरफ से कुछ भी कहने से मना कर दिया.

कांग्रेस कार्यसमिति ने फासीवाद तथा नात्सीवाद की भर्त्सना तो की लेकिन साथ में यह भी कहा कि ब्रिटिश सरकार युद्ध के उद्देश्य को स्पष्ट करें. 17 अक्टूबर को अपने श्वेत पत्र में एक परामर्शदाई गुट की स्थापना तथा भविष्य में कभी औपनिवेशिक दर्जा देने की बात कही. साथ ही साथ सन 1935 के संविधान को निरस्त कर दिया गया. भारत में एक व्यक्ति का शासन लागू हो गया. कांग्रेस ने इसके जवाब में 29 अक्टूबर को सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रस्ताव पारित कर दिया. इसके साथ ही साथ कांग्रेस की सभी आठों सरकारों ने त्यागपत्र दे दिया. सरकार ने इन विधान सभाओं को भंग नहीं किया क्योंकि इस अवसर पर चुनाव का खतरा नहीं मोल लेना चाहते थे. उन्होंने उन्हें सिर्फ बर्खास्त कर दिया तथा समस्त अधिकार अपने हाथों में ले लिए.


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