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स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के किसानों का योगदान

आज इस आर्टिकल में हम आपको स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के किसानों का योगदान के बारे में बताने जा रहे है.

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स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के किसानों का योगदान

1917 में बिहार के नील उगाने वाले कृषकों की समस्याओं को लेकर महात्मा गांधी ने चंपारण में सत्याग्रह किया. बिहार में 1918 ई. के अंत तक लगभग  92% लोग अपने जीविकोपार्जन के लिए कृषि कार्य में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सलंग्न थे. उद्योग व व्यवसाय में लोगों का नियोजन अत्यंत कम था. कृषि की पद्धति भी पुरानी व्यवस्था पर आधारित थी और भू राजस्व व्यवस्था अत्यंत शोषणमुलक थी.

ब्रिटिश शासकों द्वारा खाद्यान्न उत्पादन के स्थान पर नील आदि व्यवसायिक फसलों के उत्पादन के लिए किसानों को बाध्य किया जाता था. नील की खेती कृषकों के लिए अत्यंत हानिकारक थी. आरम्भ में नील की खेती बिहार में चावल जाने वाले क्षेत्रों में ही सीमित रही. किंतु, बाद में यह अन्य क्षेत्रों में भी होने लगी. फलत: नील बागान मालिकों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था.

कतिपय कारणों से कृषि अर्थव्यवस्था अत्यंत हानिकारक हो गई और कृषक वर्ग निर्धन होता चला गया. अधिकांश किसान जमीन से बेदखल होने पर बटाई दार और भूमिहीन मजदूर बन गए तथा उनकी भूमि अधिकारों एवं जिम्मेदारों के पास चली गई. इन्हें परिस्थितियों में ब्रिटिश शासन एवं उनके सहयोगी के विरुद्ध विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की.

गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन के कारण ब्रिटिश सरकार को चंपारण कृषक अधिनियम 1918 पारित करना पड़ा. हालांकि इस अधिनियम में कृषकों को विशेष राहत नहीं मिली, परंतु कृषक एकता का प्रदर्शन अवश्य हुआ तथा कृषकों के समर्थक नेता के रूप में गांधी जी को प्रसिद्दी मिली.

भूमि संबंधी मौलिक मुद्दों को उठाने में स्वामी विद्यानंद का योगदान महत्वपूर्ण है. उन्होंने जमीदारी प्रथा की बुराइयों को उजागर किया और  कृषकों को जागृत किया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1920 के नागपुर अधिवेशन के कर नहीं दो नारा के आलोक में बिहार की कुछ स्थानों पर जमींदारों को लगान नहीं दिया गया. उत्तर बिहार में अनेक देसी रियासतों तथा बागान मालिकों को लगान का भुगतान नहीं किया गया. सारण जिले की स्थिति ज्यादा गंभीर थी.

सविनय अवज्ञा आंदोलन में बिहार के किसानों ने बड़े उत्साह से भाग लिया. 1930 में समस्त बिहार में चौकीदारी कर नहीं दो अभियान चला, जो काफी सफल रहा. 1930 के दशक के आर्थिक मंदी ने बिहार के किसानों को भी प्रभावित किया. उनकी स्थिति और गंभीर हो गई थी.

गोपालगंज के भोरे और कौटया में स्थिति बड़ी गंभीर हो गई. यहां के किसानों ने पुलिस थानों पर आक्रमण भी किया. देवरिया अनुमंडल किसान सभा के अध्यक्ष सचिदानंद के नेतृत्व में इन स्थानों में आंदोलन हो रहा था. मई 1931 में जहानाबाद में हुए किसान सम्मेलन में जिले के जमींदारों द्वारा किसानों के दमन की निंदा की गई तथा किसानों की शिकायत की जांच के लिए एक समिति नियुक्त की गई.

उस समय शाहाबाद में स्वामी भवानी दयाल सन्यासी बहुत सक्रिय थे. बिहार में कांग्रेस ने राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में एक कृषक जांच समिति में नियुक्त की, अन्य सदस्य अब्दुल बारी, बलदेव सहाय तथा राजेंद्र मिश्र है. इस जांच समिति एक गहन प्रचार से कुछ जमींदारों ने डरकर लगान में काफी छूट भी दी.

1932 में दोबारा शुरू हुए सविनय अवज्ञा आंदोलन में किसान आंदोलन अधिक हिंसक हो गया और शिवहर, बेलसंड, बैरगनिया, तारापुर, मुंगेर स्थानों पर थानों में आक्रमण भी हुआ. बिहार में कृषकों के सबसे प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती थे.

सहजानंद सरस्वती एवं उनके सहयोगियों ने किसानों में राष्ट्रीयता की भावना को जीवित रखा और किसान आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की. 1933 के आरंभ में किसान सभा के विरोध के बावजूद परिषद में विधेयक पेश किया गया. इससे किसानों के मध्य रोस की लहर दौड़ गई और मुंगेर में किसानों ने एक सभा कर निश्चय किया कि वे आधे से अधिक लगान नहीं देंगे.

पटना की सभा में सहजानंद सरस्वती ने यह घोषणा कर दी कि कांग्रेस को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसान सभा का उपयोग करने नहीं दिया जाएगा. मधुबनी में मार्च 1933 के प्रांतीय किसान सभा में किसान सभा को एक औपचारिक स्वरूप देने का प्रयास किया गया. हालांकि दरभंगा के महाराजा ने ऐसा नहीं होने दिया, लेकिन इसके बावजूद बिहटा में 1 महीने के अंदर दूसरा प्रांतीय किसान सभा का आयोजन हुआ और इसके बाद सहजानंद सरस्वती किसानों के निर्वीवाद नेता बन गए.

1935 ई. तक किसान सभा के सदस्यों की संख्या 80,000 हो गई. किसान सभा ने धीरे-धीरे अपने को कांग्रेस से अलग कर लिया और इस प्रकार 1935 ई. तक किसान सभा बिहार का एक शक्तिशाली एवं वामपंथी संगठन बन चुकी थी. 1937 में अनंत: बकाश्त जमीन को लेकर वामपंथियों एवं कांग्रेस के मध्य संघर्ष उत्पन्न हो गया. यह सामाजिक वर्गों के मध्य स्म्पष्ट संघर्ष था, जिससे किसानों एवं ब्रिटिश सरकार के बीच भी संघर्ष उत्पन्न हो गया.

1938-39 तक कांग्रेस सरकार को किसान सभा से काफी संघर्ष करना पड़ा. परंतु द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ के समय कांग्रेसी सरकार के त्यागपत्र दे देने के कारण संघर्ष और तनाव कम हो गया. 1940 ई. के निर्वाचन में कांग्रेस ने अपनी चुनाव उद्घोषणा पत्र में भूमि स्थाई प्रबंध या जमींदारी पद्धति के उन्मूल की बात कही. इससे एक और जमींदारों को अपने काश्तकारी अधिकार से वंचित होने का भय हो गया तो दूसरी ओर ब्रिटिश शासकों को यह भय हो गया कि ब्रिटिश राज का उन्मूलन हो जाएगा.

1946 के पश्चात कांग्रेस पार्टी सरकार में आई. इससे किसानों को आशा हो गई की जमीनदारी प्रथा का उन्मूलन हो जाएगा. 1946 में बिहार के किसानों बकाश्त, मालगुजारी की दर की कमी के पुराने मुद्दों पर पुन: संगठित हो गए. बकाश्त के प्रश्न पर बिहार के विभिन्न भागों में बड़े पैमाने पर कृषक विद्रोह आरंभ हो गया.

इस समय किसानों का नेतृत्व स्वामी सहजानंद सरस्वती कर रहे थे और आंदोलन में वामपंथी दल सक्रिय भूमिका निभा रहे थे. किसान उत्साहित होकर जबरदस्ती फसल काटने लगे और जमीन जोतने लगे, जिसे आंदोलनों का स्वरूप हिसंक हो गया.

किसानों एवं जमींदारों के बीच संघर्ष का एक अन्य मुद्दा था- भोली (जींस में लगान भुगतान), भूमि का नकदी (नगर लगान भुगतान) तथा भूमि में परिवर्तन. किसानों ने इन जमीनों पर अवैध ढंग से कब्जा करना शुरू किया. इसके परिणाम स्वरूप पूरे बिहार में अनेक हिंसात्मक संघर्ष हुए.

कांग्रेसी सरकार ने 1947 में किसान आंदोलन पर काबू पाने के लिए बिहार सार्वजनिक व्यवस्था अनुरक्षण अधिनियम पारित किया. इस अधिनियम के उपलब्ध अत्यंत कठोर थे. एक उपबंध के अनुसार एक गांव का किसान दूसरे गांव में नहीं जा सकता था, जहां बकाशत संघर्ष चल रहा हो. दरभंगा और बेगूसराय में सबसे ज्यादा संख्या में किसान गिरफ्तार किए गए. इसके बावजूद किसानों ने हार नहीं मानी और संघसरत रहे.

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