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मध्य प्रदेश की भौगोलिक संरचना

मध्य प्रदेश की भूवैज्ञानिक बनावट महाकल्प शैल संघ के चारों और बनी है। राज्य का लगभग संपूर्ण पूर्वी भाग इन्हीं चट्टानों का बना है। पश्चिम की ओर यह प्राचीन शैल संघ जैसे विंध्यन शैल समूह तथा दक्कन ट्रैप से आवृत है।बुंदेलखंड में गुलाबी ग्रेनाइट है जिसमें फोलिएशन बहुत सीमित है, ऐसा लगता है कि प्राचीन देश में ज्वालामुखी विभेदन व्यापक पैमाने पर हुआ, जो कि कि सतह बुंदेलखंड नीस के रूप में मिलती।  

इस प्रदेश में सिल तथा डाइक भी बड़ी संख्या में मिलते हैं जो कि लंबी पहाड़ियों में दिखते हैं। बालघाट का मैग्नीज तथा जबलपुर का संगमरमर इसी शैल समूह में मिलता है. पर्वत निर्माण क्रिया से भी यह चट्टाने प्रभावित हुई है। अत: मोड तथा भ्रंश साधारणत पाए जाते हैं। छिंदवाड़ा में धारवाड़ शैल समूह सौसर सीरीज के नाम से पुकारे जाते हैं, जिनमें मैग्नीज खनिज के निक्षेपण मिलते है।

जबलपुर में इसी शैल समूह का दावेदार डोलराइट चुने का पत्थर अथवा संगमरमर मिलता है जिनको काटकर नर्मदा नदी ने संकरी और गहरे कंदरा बनाई है। बस्तर में पाए जाने वाले लोहे निक्षेपण भी धारवाड़ शैल समूह में ही मिलते हैं जिसमें नीस, हेमेटाइट तथा क्वार्टस प्रमुख है। नीचले कडप्पा शैल समूह की तहे बिजावर सीरीज नाम से पुकारी जाती है, जिनमें चूने के पत्थर, बालू के पत्थर, क्वार्टजाइट की तहे मिलती है। इस समूह की चट्टानें बिजावर, ग्वालियर तथा पन्ना के निकट मिलती है। इनमें कुछ ज्वालामुखी भी वेदों में हीरे पाए जाते हैं. पन्ना की प्रसिद्ध खाने इन्हीं स्थानों में है।

विंध्यन शैल समूह की जलज चट्टाने अंतरभौमिक क्रियाओं के प्रभाव से बची हुई है। लगभग 4200 मीटर की मोटाई की ये चट्टानें उतरी मध्यप्रदेश में समतल बिछी हुई है।

धारवाड़ शैल समूह की दक्षिणी मध्यप्रदेश के बालाघाट तथा छिंदवाड़ा जिलों में मिलती है तथा पूर्व की ओर यह पेटी महाराष्ट्र राज्य में चली गई है। सोन नदी के दक्षिण में उसके समांतर इन चट्टानों की एक लंबी संकरी पेटी मिलती है तथा बुंदेलखंड नीस व विंध्यन चट्टानों के बीच बिजावर के चारों ओर एक अन्य छोटा प्रदेश मिलता है। धारवाड़ शैल समूह महा आद्य-क्लप की चट्टानों के अपरदन से निकले पदार्थों से निर्मित है। मध्यप्रदेश में गोंडवाना युग की चढ़ाने दो क्षेत्रों में मिलती है- सतपुड़ा क्षेत्र तथा बघेलखंड का पठार जहां यह शैल समूह एक अर्धवृत्त में उत्तर में सीधी तक विस्तृत है।

क्रीटेशस क्लप में दक्कन के पठार में विभिन्न प्रतिक्रियाएं हुई इनके चिन्ह मध्य प्रदेश के भू-विज्ञान में मिलते हैं। नर्मदा की घाटी में कुछ बागों में नदी तथा एश्चुरी के निक्षेपण से बने सेल्स में मिलते हैं इन्हें बाघ सीरीज के नाम से पुकारा जाता है। प्रदेश के अन्य भागों में बिखरे हुए अन्य निक्षेपण लमेटा सीरीज के नाम से जाने जाते हैं।

बाघ तथा लमेटा सत्रों के निक्षेपण के पश्चात दक्कन के पठार पर बड़े पैमाने पर दरारी ज्वालामुखी क्रियाएं हुई जिसके कारण बेसाल्ट की कई हजार मोटी तहों से तत्कालीन भौतिक स्वरूप आवृत हो गया। इस निक्षेपण के दक्कन ट्रैप के नाम से पुकारते हैं। ट्रैप का सामान्य अर्थ है सीडी नुमा ढलान से लगाया जाता है। प्रदेश का दक्षिणी पश्चिमी भाग इसी का है। जहां इंदौर भोपाल तथा जबलपुर डिविजन के भाग इन्हीं चट्टानों के बने हैं।

भौतिक संरचना के इतिहास में तृतीय काल का बहुत महत्व है। इस काल में ही गोंडवाना महाद्वीप टूटकर छोटे-छोटे भागों में विभक्त हो गया तथा उसके बीच का भाग सागर में डूब गया। इसी समय दक्कन के पठार को वर्तमान आकार मिला तथा टेथिस सागर का विशाल निक्षेपण मोड़दार पर्वत के रूप में ऊपर उठा जो आज का हिमालय के नाम से जाना जाता है।


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